के.के. मोदी व्यावसायिक साम्राज्य के युवराज ललित मोदी ने संदीप बामज़ई के साथ लंबे और दुर्लभ साक्षात्कार में खुद को 'देशभक्त' बताया, जो 'अपने देश को याद करता है.'
जब सुभाष चंद्रा के आइसीएल ने बीसीसीआइ को चुनौती दी थी, तो उसका जवाब देने के लिए आपको आगे किया गया. इसके बाद उन्होंने आपको खतरनाक चीज की तरह झटक दिया. बोर्ड के भीतर आखिर ऐसा क्या बदला?
लोगों में एक बड़ी गलतफहमी है कि आइपीएल आइसीएल के जन्म की प्रतिक्रिया में उपजा है. मैंने लीग पर अपना काम 1996 में ही शुरू कर दिया था और दरअसल इसे 50/50 के फॉर्मेट में लांच करने की घोषणा भी की थी. 11 साल से भी ज्यादा समय तक मैं परदे के पीछे अपने इस विचार को तराशने में लगा रहा.
2005 के उत्तरार्ध में जब मैं और मेरे सहयोगी बोर्ड के पास पहुंचे तो हमारे हाथ में पहले से ही एक आकर्षक योजना थी. लेकिन हमारी पहली चुनौती बीसीसीआइ के माली हालात और मार्केटिंग को पटरी पर लाने की थी. इसके बाद मैंने लीग पर काम शुरू किया.
बीसीसीआइ के उपाध्यक्ष और मार्केटिंग सेल के प्रमुख की हैसियत से मैंने इस योजना का सुझाव दिया. तब तक मैं संगठन के लिए 1 अरब डॉलर (500 करोड़ रुपए) से ज्यादा जुटा चुका था, योजना को हरी झंडी मिली और आइपीएल का जन्म हुआ. जहां तक बदलाव का सवाल है, जिस तरह मैंने योजना बनाई और इसे लागू किया, पूरी दुनिया में आइपीएल छा गया. मुझे लगता है कि कुछ लोग इसे अपना बनाने के लिए तड़प रहे थे.
आपने आइपीएल को बनाया, सरकार से भी भिडे़ और टूर्नामेंट को लेकर दक्षिण अफ्रीका पहुंच गए. जब मुसीबत आई तो फ्रेंचाइजी आपके साथ नहीं आए?
पहले साल के बाद हमें आइपीएल को डूबने से बचाना था और सभी मालिकों ने मुझे सहयोग दिया. लेकिन इससे ज्यादा कुछ कर पाना उनके वश में नहीं था और अधिकतर खेल संघों की तरह चंद लोगों ने, जो खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे थे, गिरोह बना लिया. उन्हें सरकार के भीतर भी एक सहज सहयोगी मिल गया.
क्या आपको सोने का अंडा देने वाली मुर्गी की याद नहीं आती?
आइपीएल एक शानदार टूर्नामेंट था और है. मैं इसका हिस्सा था, इस बात का मुझे फख्र है. इसलिए, बेशक मुझे इससे बाहर निकल जाने का अफसोस है, मगर इसके साथ जुड़े विवादों पर मेरी जगह पर बैठा दूसरा व्यक्ति भी वही करता. मैं कोई अलग नहीं हूं.
श्रीनिवासन के साथ आखिर कुछ दिनों और घंटों में क्या हुआ? स्थितियां क्यों इस कदर हाथ से निकल गईं कि उन्हें एक ईमेल के जरिए आपको आइपीएल कमिश्नर के पद से बेदखल करना पड़ा?
यह ऐसा सवाल है जिसे आपको दूसरों से पूछना चाहिए. मेरी विदाई के बाद बीसीसीआइ ने खासतौर पर श्रीनिवासन की गतिविधियों के जरिए हद दर्जे के गैर-जिम्मेदाराना ढंग से मेरी ओर अनगिनत झूठे और बेबुनियाद आरोप उछाले. अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए मैंने सख्ती से उन सब आरोपों को ठोस सबूतों की बिना पर झूठा साबित किया. लेकिन यह मामला हालांकि अचानक और निहायत गैर-वाजिब ढंग से खत्म कर दिया गया, मैं इस बात पर ज्यादा जोर देना चाहूंगा कि सबसे पहले टूर्नामेंट को जीवन देकर मैंने क्या हासिल किया.
क्या आपने क्रिकेट की दुनिया में जरूरत से ज्यादा मोर्चे नहीं खोल दिए थे-संजय दीक्षित से श्रीनिवासन तक?
हां, मैं समझता हूं वह एक मुद्दा जरूर था. आइपीएल सफलता का इतिहास रच रहा था और मैं सबकी निगाहों में था. शायद कुछ की आंखों में खटक भी रहा था. हमने एक सफल उत्पाद को तैयार किया था और वे आगे का हिस्सा चाहते थे. यकीनन कुछ लोग ऐसे भी थे, जो अपनी हैसियत का इस्तेमाल कर जीवन को उस वक्त मुश्किल बना रहे थे, जिस वक्त इसके बजाए वह उन क्षणों का आनंद ले सकते थे.
श्रीनिवासन आपसे क्यों खफा हैं?
मैं फिर कहुंगा कि यह बात आपको उनसे पूछनी चाहिए. लेकिन इतना जरूर था कि वे अपने ढंग से चीजों को सजाना चाहते थे. मैंने कुछ जरूरी मुद्दों पर जोर दिया क्योंकि श्रीनिवासन चेन्नै सुपर किंग्स के मालिक थे और आज भी हैं. और मैंने समझा कि कुछ मांगें जैसे 2010 में अंपायरों को अपनी मर्जी से छांटना, सीधे-सीधे हितों के टकराव का मामला है और यह कुल मिलाकर लीग के फायदे में नहीं है.
क्या आपको भारत की याद आती है? क्या आपको इस बात का अफसोस है कि आप लौट नहीं सकते?
मैं एक देशभक्त भारतीय हूं और मुझे अपने देश की बहुत याद आती है. मैं उस दिन की राह देख रहा हूं जब मैं लौट सकूंगा और मुझे उम्मीद है कि वह क्षण बहुत दूर नहीं होगा.
क्रिस कैर्न्स मामले का क्या हुआ, जिसमें आप हाल ही में हार गए हैं?
हमने फैसले के खिलाफ अपील की है. इसलिए इस पर टिप्पणी करना मेरे लिए ठीक नहीं होगा.
आइपीएल का क्या भविष्य देखते हैं? सीजन 4 तो पूरी तरह सफाचट था. इस साल भी प्रायोजक और विज्ञापनदाता भाग रहे हैं? कहां गड़बड़ है?
आइपीएल की अवधारणा के दमदार तत्वों में एक था-इसमें नयापन बनाए रखना, ताकि चाहने वालों, प्रसारकों और प्रायोजकों में इसके लिए अपील बनी रहे. लेकिन आप नएपन को तभी बनाए रख सकते हैं जब आप कुछ नया करेंगे. इसलिए हम अपने उत्पाद पर लगातार निगरानी रखते थे और विश्लेषण करते थे कि कैसे बेहतर करें और चीजों को आगे बढ़ाएं. हमने यह सुनिश्चित किया कि अपने सभी फ्रैंचाइजी और साझीदारों के साथ काम करें. मुझे पूरा यकीन है कि कोच्चि और सहारा टीमों के साथ हाल ही में हुए विवादों से आइपीएल की तैयारियों में जरूर असर पड़ा होगा.
अपने आइपीएल/बीसीसीआइ अनुभव से क्या सीख लेना चाहेंगे?
यही कि हम एक समाज में रहते हैं जहां कारनामे और सफलता हमेशा आपका साथ नहीं देते. कई बार निहित स्वार्थ अच्छों को पीछे छोड़ देते हैं और मैं इस बात को आसानी से मान लेने वाला नहीं हूं.
क्या उन फ्रैंचाइजी मालिकों से आपका अब भी संपर्क है, जो कभी आपके हमप्याला हुआ करते थे?
मैं उन सभी लोगों के संपर्क में रहता हूं. वे हमेशा अच्छे दोस्त थे और रहेंगे. मैं यह देखने के लिए टीवी से चिपका रहूंगा कि उनकी टीमें कैसा प्रदर्शन करती हैं.

