अमेरिका में आइएसआइ के एजेंट गुलाम नबी फई की गिरफ्तारी ने न सिर्फ कश्मीर पर पाकिस्तान के बनावटी प्रचार युद्ध को उजागर कर दिया है बल्कि उसके सम्मेलनों में भाग लेने वाले कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी शर्मसार किया है. एफबीआइ ने कश्मीर में जन्मे और वाशिंगटन के एक एनजीओ कश्मीर अमेरिकन काउंसिल (केएसी) के मुखिया फई को 19 जुलाई को गिरफ्तार कर लिया. उस पर आरोप है कि उसने खुद को पाकिस्तानी एजेंट नहीं बताया था.
फई कम-से-कम पिछले 25 साल से आइएसआइ का एजेंट था. आइएसआइ दशक भर से भी ज्यादा समय से उसके एनजीओ को चोरी-छिपे मदद दे रही थी और उसे चला रही थी. उसे अमेरिकी सांसदों को अपने पक्ष में तैयार करने और कश्मीर पर दुनिया भर में दबाव बनाने का काम सौंपा गया था. फई ने वाशिंगटन में कई 'कश्मीर शांति सम्मेलन' किए जिनमें अमेरिकी विद्वानों और सांसदों के अलावा भारत और पाकिस्तान के विद्वानों, वरिष्ठ पत्रकारों, शिक्षाविदों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया.
पिछले साल जुलाई में ऐसे 11वें सम्मेलन में ब्रिटेन में भारत के पूर्व उच्चायुक्त कुलदीप नय्यर, पूर्व न्यायाधीश राजेंद्र सच्चर, मानव विज्ञानी अंगना चटर्जी और मानवाधिकार कार्यकर्ता रीता मनचंदा को खास तौर पर न्यौता गया था. सच्चर का कहना है, ''मैं फई को कुछ सालों से जानता हूं लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि वह आइएसआइ के लिए काम कर रहा है. मुझे पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के साथ काम करने की वजह से बुलाया गया, जो पिछले दो दशक से कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन का दस्तावेजीकरण कर रही है.'' केएसी के सेमिनार में जाने वालों में गौतम नवलखा भी थे.
एफबीआइ का कहना है कि पाकिस्तानी सरकार ने 1990 के मध्य से फई के संगठन को प्रायोजित करने के लिए कम-से-कम 40 लाख डॉलर (20 करोड़ रु.) खर्च किए. फई को हवाला कारोबार के जरिए हर साल करीब 500,000 डॉलर से 700,000 डॉलर मिलते थे. आइएसआइ इस पर वैध सहायता का मुलम्मा चढ़ाने के लिए कई नकली दानदाताओं का इस्तेमाल करती थी.
फई को पाकिस्तान से आइएसआइ के चार जने चलाते थेः इनमें से एक 'अब्दुल्ला' कहलाता था, बाकी लोगों में जावेद अज़ीज खान, लेफ्टिनेंट कर्नल तौकीर महमूद बट और सोहेल महमूद बट शामिल थे. बट तो आइएसआइ के लैटरहेड पर वीजा आवेदन करने के लिए 2009 में वाशिंगटन गया था.
फई को पांच साल की सजा हो सकती है. उसकी गिरफ्तारी से कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने की पाकिस्तान की कोशिशों को झ्टका लगा है. वर्जिनिया की एक जिला अदालत में दिए गए अपने हलफनामे में, एफ बीआइ ने पाकिस्तान से नियंत्रित किए जा रहे दो अन्य 'कश्मीर केंद्रों' का नाम लिया है. इसमें लंदन में नाज़िर अहमद शॉल का जस्टिस फाउंडेशन कश्मीर सेंटर और ब्रुसेल्स, बेल्जियम में अब्दुल मजीद ट्रेंबू का कश्मीर सेंटर यूरोपियन यूनियन शामिल है.
भारतीय सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि फई की गिरफ्तारी 27 जनवरी 2011 की घटना का बदला है जब पाकिस्तान ने सीआइए के जासूस रेमंड डेविस को लाहौर में दो लोगों की हत्या के लिए गिरफ्तार कर लिया था. इसके बाद पाकिस्तान की राजधानी के उत्तरी भाग ऐबटाबाद में 2 मई को ओसामा बिन लादेन को पकड़कर मार दिया गया.
आइएसआइ ने इसके बाद सीआइए के दो अधिकारियों के नाम उजागर कर दिए जिससे इनमें से एक को देश छोड़कर जाना पड़ा था. आइएसआइ प्रमुख अहमद शुजा पाशा जुलाई में एक शांति मिशन पर अमेरिका में थे. अधिकारियों का कहना है कि फई की गिरफ्तारी इस बात का सबूत है कि पाशा की यात्रा दो खुफिया एजेंसियों के बीच भरोसे की कमी को दूर नहीं कर सकी.
भारतीय खुफिया अधिकारियों का कहना है कि पाकिस्तानी प्रतिष्ठान के साथ फई के संपर्क सबको मालूम थे. गुप्तचर ब्यूरो के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ''एक दशक पहले हमने अमेरिका को बताया था कि उसके जमात-ए-इस्लामी से संबंध हैं लेकिन हमें जवाब मिला कि वह 'मानवाधिकार कार्यकर्ता' है. उन्होंने अब उसे गिरफ्तार कर लिया क्योंकि ऐसा करना उन्हें सुविधाजनक लगता है.''
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