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झारखंड: ये ओहदे की दादागीरी है

झारखंड के लोक उपक्रमों की जमीन और मकानों पर अवैध कब्जा जमाने के लिए न्यूनतम योग्यता यह है कि आप को रसूखदार नेता, पदाधिकारी या फिर ऐसा ही कुछ होना चाहिए.

हेमंत सोरेन
हेमंत सोरेन
अपडेटेड 2 जुलाई , 2011

झारखंड के लोक उपक्रमों की जमीन और मकानों पर अवैध कब्जा जमाने के लिए न्यूनतम योग्यता यह है कि आप को रसूखदार नेता, पदाधिकारी या फिर ऐसा ही कुछ होना चाहिए.

ऐसे में आप को बहुत सारे क्यों और कैसे, जैसे परेशानी भरे सवालों का जबाब खोजना नहीं पड़ेगा. जैसे झारखंड सरकार के उप-मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनके भाई बसंत सोरेन.

पिछले 10 सालों से बोकारो स्टील लिमिटेड (बीएसएल) के सेक्टर 5-बी के क्वार्टर संख्या 3029 और 3030 पर कब्जा जमाए बैठे हैं, जबकि बीएसएल से उनका कोई संबंध नहीं है. यही नहीं थोड़ा और आगे बढ़े तो देखेंगे कि उनके ही कैबिनेट सहयोगी और आजसू नेता चंद्रप्रकाश चौधरी पिछले कई सालों से भारत सरकार के लोक उपक्रम सेंट्रल कोल लिमिटेड (सीसीएल) के क्वार्टर पर कब्जा किए हुए हैं.

अगर इन उपक्रमों ने खानापूर्ति के नाम पर अवैध कब्जों को खाली कराने का इन्हें नोटिस थमाया तो उन्होंने कभी भी इसे गंभीरता से नहीं लिया. इनके अलावा सदन में मुख्य विपक्षी दल के नेता राजेंद्र सिंह, बात-बात पर सरकार के खिलाफ खड़े हाने वाले झारखंड विकास मोर्चा के विधायक समरेश सिंह सहित सभी दलों के नेताओं, पुलिस और प्रशासनिक पदाधिकारियों के नाम भी इस फेहरिस्त में शामिल हैं.

झारखंड में भारत सरकार के चार लोक उपक्रमों की भूमि और मकानों पर झारखंड के ऐसे महानुभावों के अवैध कब्जे पर जब सीबीआइ ने अपनी रिपोर्ट झारखंड हाइकोर्ट को सौंपी तो यह देखने में आया कि इन लोक उपक्रमों के करीब 744 आवासों और भू-खंडों पर करीब 178 रसूखदारों ने सालों से कब्जा जमा रखा है. बीएसएल में ऐसे अवैध कब्जों की संख्या 18 है, सीसीएल में 148, हेवी  इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन में 6 जबकि भारत कोकिंग कोल लिमिटेड के करीब 572 आवास अवैध कब्जे में हैं.

यह बात हाइकोर्ट के माननीय जजों के अलावा रांची, धनबाद, जमशेदपुर, बोकारो सहित झारखंड के अन्य इलाकों के उन हजारों लोगों को उद्वेलित करने के लिए काफी है जिनके अवैध घरों को झारखंड सरकार ने हाइकोर्ट के आदेश से हाल के महीने में गिरा दिया.

लेकिन जिन्हें पता है वे जानते हैं कि यह खेल कैसे हुआ, किसी ने जबरन कब्जा जमाया तो किसी की ऊंची पहुंच काम आई तो किसी को सरकार के कोटे से एक निश्चित समय के लिए आवास आवंटित हुआ जिसे उन्होंने अपनी पैतृक संपत्ति मान लिया.

बहरहाल लोक उपक्रमों पर रसूखदारों के अवैध कब्जे की स्वतः संज्ञान सुनवाई करने वाली कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश प्रकाश टाटिया और पी.पी. भट्ट की खंडपीठ की तल्ख टिप्पणी चीजों को समझ्ने के लिए काफी है. खंडपीठ का साफ मानना था कि सरकार द्वारा लोक उपक्रमों सहित अन्य अतिक्रमण हटाने में दोहरे मानदंड अपनाए गए.

आम जन को हटाने में तो तेजी दिखाई गई लेकिन रसूखदारों को बचाने में सरकारों ने कानूनी पेंच का सहारा लिया. जब भारी उद्योग मंत्रालय के वकील ने कोर्ट को सूचित किया कि झारखंड राज्‍य सरकार को इन अतिक्रमणों को हटाने के लिए उपयुक्त बल उपलब्ध कराने के लिए लिखा गया है तो कोर्ट ने धीरे से एक जोर का झ्टका दिया, ''खाली पत्राचार से कुछ नहीं होता है. इन अतिक्रमणों को हटाने के लिए क्या कर रहे हैं ये बताएं और दस दिन के भीतर इन रसूखदार लोगों की सूची समाचार पत्रों में प्रकाशित करें.''

शायद कुछ और प्रभावशाली लोगों के नाम आएं लेकिन ये जानकर कोई हैरानी नहीं होती है कि कांग्रेस विधायक चंद्रशेखर दुबे बीएसएल के चार आवासों पर पिछले कई सालों से जमे बैठे हैं.

दुबे को धनबाद से सांसद होने के नाते ये क्वार्टर आवंटित हुए थे लेकिन 2009 में चुनाव हारने के बाद भी वे जमे हैं. समरेश सिंह तो बाकायदा कई सालों तक बीएसएल की एक पूरी इमारत में अपने निजी इंजीनियरिंग संस्थान, बोकारो इंजीनियरिंग कॉलेज चलाते रहे. आजसू विधायक और पूर्व मंत्री उमाकांत रजक भी इस सूची में हैं. इन नामों पर भी गौर कीजिए, धनबाद की पूर्व भाजपा सांसद रीता वर्मा, पूर्व विधायक और राज्‍य जनता दल (यू) के मुखिया जलेश्वर महतो, पूर्व विधायक उदय कुमार सिंह, खूंटी पुलिस कप्तान मनोज कौशिक आदि के नाम सीबीआइ की सूची में हैं.

कोर्ट के कड़े रुख के बाद कुछ नेताओं के तेवर बदले हैं. समरेश कहते हैं, ''आवास कंधे पर थोड़े न ढोकर ले जाएंगे. पहले ही बीएसएल को लिखकर दे चुके हैं कि हम आवास खाली करने को तैयार हैं.'' गलती से सही झारखंड के नेताओं से अच्छा काम यह हो गया कि अतिक्रमण पर आरोप-प्रत्यारोप और एक-दूसरे को नीचा दिखाने के खेल में इस घोटाले की पोल खुल गई, वरना सब सही चल रहा था.

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