भारतीय कॉर्पोरेट जगत की शीर्ष कंपनियां भारत की जगह विदेशों में बड़े निवेश की ओर रुख कर रही हैं. पिछले 12 माह में मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज अफ्रीका और अमेरिका में 5 अरब डॉलर का निवेश कर चुकी है. उम्मीद है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज अगले चार साल में अपने विदेशी निवेश को दोगुना कर लेगी. अनिल अंबानी की रिलायंस-एडीएजी ने 2011 में दुनिया भर में 3 अरब डॉलर का निवेश किया है, जिसमें 2011 में इंडोनेशिया में खनन संबंधी परियोजनाएं भी शामिल हैं.
माना जा रहा है कि 2015 तक वे इसे 7 अरब डॉलर यानी दोगुना से ज्यादा कर देंगे. रतन टाटा ने, जिनके समूह की 65 फीसदी आय विदेशों से ही है, इस साल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अरब डॉलर का निवेश अंजाम दिया है.
अनुमान है कि रूइया का एस्सार समूह भी 2015 तक विदेश में 6 अरब डॉलर का निवेश कर सकता है. सुनील मित्तल की भारती एयरटेल ने मध्य-पूर्व आधारित दूरसंचार कंपनी .जायन के अफ्रीकी कारोबार को हासिल करने के लिए पिछले साल 8.2 अरब डॉलर खर्च किए, जबकि भारत में उनके प्रतिद्वंद्वी 2जी घोटाले से उपजी परिस्थितियों से निबटने में उलझे हुए हैं.
अप्रैल, 2010 और मार्च, 2011 के 12 महीनों में भारतीय कंपनियों ने विदेश में 44 अरब डॉलर का विशाल निवेश किया है, जो उसके पहले के 12 महीनों के 18 अरब डॉलर के मुकाबले 150 फीसदी की अप्रत्याशित वृद्धि है.
अगर अप्रैल, 2010 और मार्च, 2011 के बीच भारत में विदेशी कंपनियों के निवेश को देखें तो यह 27 अरब डॉलर का रहा है, जो पिछले साल की अपेक्षा 25 फीसदी कम है. तेजी से विकास करती किसी अर्थव्यवस्था-भारत चीन के बाद अब भी दुनिया की सबसे तेजी के साथ उभरती अर्थव्यवस्था है-के लिए यह असामान्य बात है कि पूंजी देश में आने के मुकाबले विदेश की ओर ज्यादा जा रही है.
क्या रतन टाटा के उस कथन का आशय यही था जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत राजनैतिक रूप से अस्थिर देश बन गया है? बेशक, टाटा अस्थिर परिवेश में निवेश नहीं कर रहे हैं.
अर्थशास्त्री और उद्योग जगत की शीर्ष संस्था फिक्की के महासचिव राजीव कुमार का मानना है कि वैश्विक विस्तार कारोबार के रोजमर्रा के विस्तार से कहीं आगे की बात है. वे कहते हैं, ''मैं कहूंगा कि विदेश के बजाए भारत में होने वाले निवेश पर लाभ की दर ऊंची रहती है. और अगर निवेश विदेश का रुख कर रहा है, तो इसके कारण कुछ और भी हो सकते हैं.''
एचडीएफसी के चेयरमैन दीपक पारेख भारतीय कंपनियों द्वारा विदेश में किए जाने वाले निवेश में एकाएक हुई बढ़ोतरी के कुछ और कारणों की ओर संकेत करते हैं. उनका कहना है, ''पहले, विदेश में हो रहे निवेश को जोखिम को कई जगह बांटने के रूप में देखा जाता रहा, लेकिन (शासन में) मौजूदा गतिरोध ने कंपनियों के लिए यह अनिवार्य बना दिया है कि वे दूसरी जगह भी अवसर तलाशें.''
भारत में निवेशकों के संकोच को पिछले 12 माह में हुए ताजा निवेशों की संख्या से जोड़कर बखूबी देखा जा सकता है. प्रोजेक्ट्स टुडे की ओर से संकलित किए गए आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल और जून, 2010 के बीच की अवधि में 1,97,000 करोड़ रु. के नए निवेश भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए निर्धारित थे. एक साल बाद अप्रैल और जून 2011 के बीच यह आंकड़ा 70 फीसदी की गिरावट लेकर 57,000 करोड़ रु. पर आ गया.
प्रमुख अर्थशास्त्री और एक्सिस बैंक के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सौगत भट्टाचार्य कहते हैं, ''इसमें कोई संदेह नहीं है कि निवेश के मामले में मंदी आ गई है.''
यूपीए सरकार को निवेशकों के अनुकूल माहौल बनाने में नाकाम रहने की जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए. 2009 के आम चुनावों में यूपीए के मजबूती के साथ सत्ता में लौटने से उद्योग जगत को सरकार से बहुत ऊंची उम्मीदें थीं. यही नहीं, भारत की जनता ने यूपीए सरकार को वाम दलों के चंगुल से भी आजाद कराया था.
चुनाव के बाद यूपीए को सत्ता में वापस आए दो साल गुजर चुके हैं, लेकिन उसके दोस्तों के लिए अत्यधिक आघात और दुश्मनों के लिए अचंभे की बात है कि वह उद्योगों के अनुकूल कोई सुधारवादी विधेयक पारित कराने तक में नाकाम रही है.
अहम आठ आर्थिक विधेयकों का खाका तैयार किया गया है और वे संसद में रखे जाने के लिए एकदम तैयार हैं. इनमें से अधिकतर विधेयकों को लेकर भाजपा जैसी विपक्षी पार्टी से नहीं बल्कि यूपीए के भीतर से विरोध के स्वर उठ रहे हैं.
यूपीए के प्रबंधकों ने इस मामले में अभी तक विपक्ष से संपर्क नहीं साधा है. मन से अभी भी पुराने तर्ज के समाजवाद की समर्थक कांग्रेस पार्टी शायद इन विधेयकों को पारित नहीं करवाना चाहती.
इसके बजाए सरकार पंगुता की स्थिति में है. एक के बाद एक घोटालों के सामने आने से वह अपनी विश्वसनीयता ही खो बैठी है. घोटालों को कथित रूप से अंजाम देने वालों को दबोचने के उसके भद्दे प्रयासों ने संदिग्धों की खोज की अवधारणा को जन्म दिया है.
इससे सामान्य अफसर और कारोबारी रोजमर्रा के फैसले लेने के प्रति भी विमुख हुए हैं, क्योंकि सरकार की विभिन्न एजेंसियां-सीबीआइ, सीवीसी, सीएजी, ईडी-ऐसे किसी भी फैसले पर उंगली उठा सकती हैं. बिना जमानत के जेल की संभावना ने भी कॉर्पोरेट जगत में बेचैनी पैदा की है. बात सिर्फ घोटालों तक ही सीमित नहीं है. प्रधानमंत्री की शक्ति को मानने के अनिच्छुक आपस में भिड़ रहे मंत्री अहम नीतिगत फैसलों की बखिया उधेड़ रहे हैं. प्रधानमंत्री इसे बदलने के इच्छुक नजर नहीं आते हैं.
अगर च'हूं ओर से घिरे मनमोहन सिंह किसी ह्ढेरणा की तलाश में हैं तो उन्हें 20 साल पीछे मुड़कर देखने की जरूरत है. 24 जुलाई, 1991 की शाम को पांच बजे वित्त मंत्री मनमोहन सिंह, जो राजनीति में महज एक माह पहले आए थे, संसद में अपना पहला बजट भाषण देने के लिए खड़े हुए.
एक घंटे बाद वे संकटग्रस्त अर्थ-व्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए अत्यधिक सुधारवादी खाका पेश कर चुके थे. अपने भाषण के अंत में उन्होंने उदारवाद से भारत के आर्थिक पॉवर हाउस के रूप में उभरने की अपरिहार्यता का हवाला देते हुए विक्टर ह्यूगो के इस कथन को उद्घृत किया, ''जिस विचार का समय आ गया हो, उसे कोई नहीं रोक सकता.''
अत्यधिक विनम्र मनमोहन सिंह ने अपने सुधार कार्यक्रम के विरोधियों को सख्त चेतावनी दी थी. उनमें से अधिकतर कांग्रेस में थे. अगले पांच साल तक वे अपनी राह पर आगे बढ़ते रहे. 2011 में, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह में, जो सात साल इस पद पर गुजार चुके हैं, 1991 जैसा जुनून नजर नहीं आता. अगर मनमोहन के लिए विक्टर ह्यूगो की उन प्रसिद्ध पंक्तियों को याद करने और तेज आवाज में दोहराने की कभी सबसे र्अधिक जरूरत है तो वह अभी ही है. 1991 का वादा 2011 में अपने आपमें कहीं खोता हुआ नजर आता है.
साल भर पहले तक विकास को लेकर चीन के दोहरे अंक के करीब पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही थी. लेकिन अब मायूसी का आलम है. भारत की दास्तान में ठहराव का सबसे मुखर संकेत संकटग्रस्त दूरसंचार क्षेत्र है, जिसने 2000 वाले दशक में भारत की वृद्धि को बल प्रदान किया था, उसी तरह जैसे दशक भर पहले आइटी और फार्मास्यूटिकल्स ने किया था.
दूरसंचार क्षेत्र यूपीए के 'समग्र विकास' के नारे का सबसे शक्तिशाली प्रतीक था. आज देश में 70 करोड़ से ज्यादा मोबाइल फोन उपभोक्ता हैं, जबकि 2000 में यह आंकड़ा 20 लाख हुआ करता था. ज्यादातर भारतीयों के पास बैंक खातों की तुलना में मोबाइल ज्यादा हैं. यह दास्तान अब कटुता की ओर बढ़ने लगी है.
भारत के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में से तीन-टाटा, रिलायंस-एडीएजी और एस्सार-उस गड़बड़ी से सीधे प्रभावित हुए हैं, जो सरकार ने दूरसंचार क्षेत्र में पैदा की है. भारत में अपने कारोबार में विस्तार करने के बजाए-जो पहले से ही स्थानीय गलाकाट प्रतिस्पर्धा के दबाव में हैं-वे अपने समय और संसाधनों का इस्तेमाल जांचों से निबटने में कर रहे हैं.
एक समय तेजी से उभरते इस क्षेत्र के बाकी खिलाड़ी ठंडे पड़ गए हैं या फिर भारती-एअरटेल की तरह अपनी ऊर्जा को विदेशों में केंद्रित कर रहे हैं. जब भारती-एअरटेल ने .जायन के अफ्रीकी ऑपरेशंस को खरीदा तो मित्तल ने भारत में अपने खास मनोज कोहली को अफ्रीका में प्रमुख बनाकर भेजा, इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि उनकी प्राथमिकताएं कहां ज्यादा निहित हैं. यह एक विलक्षण बदलाव है और भारत के विकास के लड़खड़ाने का संकेत भी.
सुनील मित्तल अकेले उद्योगपति नहीं हैं जो विदेशी निवेश के बारे में सोच रहे हैं. हफ्ते भर में, एस्सार सम की एस्सार एनर्जी पीएलसी ब्रिटेन में सूचीबद्ध स्टेनलो ऑयल रिफाइनरी के अपने 35 करोड़ डॉलर के अधिग्रहण को पूरा कर लेगी. रॉयल डच शेल पीएलसी से रिफाइनरी के अधिग्रहण की शुरुआत में घोषणा मार्च में कर दी गई थी.
जेपी मॉर्गन स्टेनले और ड्यूश बैंक के एक अधिकारी से पखवाड़े भर पहले बातचीत में एस्सार के रूइया बंधुओं ने ब्रिटेन सरकार के साथ सौदे की प्रक्रिया की गति की तुलना मध्य प्रदेश के सिंगरौली में महान कोल ब्लॉक के करीब पड़ने वाले बिजली संयंत्र की नियति से की थी.
कोल ब्लॉक के लिए अभी तक मंजूरी नहीं मिली है, जिसमें 15 करोड़ टन ताप कोयले का भंडार होने का अंदाज है, जो एस्सार और हिंडाल्को बिजली संयंत्रों के लिए काफी है. ये दोनों ही आदित्य बिरला समूह की प्रमुख सहायक कंपनियां हैं. दोनों भाई शशि और रवि रूइया ने पूछा, ''तो हम क्या करें?'' बैंकरों ने उन्हें एकदम से एक रिपोर्ट दिखाई जिसमें कहा गया था कि अगर कोयला ऑस्ट्रेलिया से आयात किया गया तो बिजली 15 रु. प्रति यूनिट से 150 रु. पर पहुंच जाएगी.
भारतीय बाजार से दूर अपने परिसंपत्ति आधार में विविधता लाने की समूह की योजना बताते हुए शशि का कहना था, ''हम विदेशों का रुख करेंगे.'' शेल रिफाइनरी के अलावा समूह ने पिछले साल अमेरिका के मिनेसोटा में एक लौह अयस्क खान, अमेरिका के वेस्ट वर्जिनिया में एक कोयले की खान और जिंबाब्वे में एक इस्पात संयंत्र का अधिग्रहण किया है.
रतन टाटा की टाटा स्टील पहले ही 2011 में सिंगापुर में अपने संपूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी में एक अरब डॉलर का निवेश कर चुकी है. दीपक पारेख इसकी वजह बता सकते हैं. वे कहते हैं, ''टाटा जैसे समूहों ने भारत में नया इस्पात संयंत्र स्थापित करने में हमेशा अपनी दिलचस्पी जाहिर की है, लेकिन किसी न किसी वजह से उनकी परियोजनाएं आकार नहीं ले पाती हैं.
ऐसे में वे अपने निवेश को विदेशों की ओर ले जा रहे हैं.'' भारत में जो हो रहा है, रतन टाटा उसे लेकर बहुत खफा हैं. हाल ही में अपने एक दोस्त के साथ एक मुलाकात में टाटा को 2जी घोटाले में चल रही सीबीआइ जांच की याद दिलाई गई, और यह भी याद दिलाया गया कि उनके समूह की दूरसंचार विभाग के ठीक से काम न करने की शिकायतों की किस तरह प्रमुख जांच एजेंसी पुष्टि कर रही है.
टाटा 10 सेकंड के लिए खामोश रहे और फिर बताया जाता है कि उन्होंने कहा, ''क्या वजह है कि हम जो भी अच्छा करते हैं, कोई उसे बुरे में तब्दील कर देता है? क्या देश में सभी सम्मानीय उद्योगपतियों का यही हश्र होगा?'' इसके बाद बातचीत एकाएक खत्म हो गई. कुछ ही दूरी पर बैठे टाटा संस के बोर्ड के एक डायरेक्टर ने वही बात दोहराई जो उन्होंने कुछ समय पहले एक ब्रांड कंसल्टंट से कही थी, ''मैं शुरू से भारत के विचार से जुड़े होने को लेकर खुश हूं लेकिन कुछ समय से मैं चिंतित होने लगा हूं.''
भारत के साथ जुड़ना असंभव नहीं है. अगर प्रधानमंत्री एक ही क्षेत्र पर केंद्रित करना चाहते हैं तो यह आधारभूत ढांचा होना चाहिए. यह एक ऐसा क्षेत्र है जो 2010 के दशक में भारत की विकास गाथा में अगुआ का स्थान हासिल कर सकता है. सरकार 2012 और 2017 की अवधि में आधारभूत ढांचे पर दस खरब डॉलर खर्च करने को प्रतिबद्ध है.
निवेशकों को आकर्षित करने के लिए यह राशि पर्याप्त होनी चाहिए. लेकिन मुख्य मंत्रालयों में अक्षम मंत्रियों के आसीन होने से भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण संबंधी मंजूरी से जुड़ी अनिश्चितता तथा लाल फीताशाही की लंबी राह जैसी वजहें संभावित निवेशकों को आने से रोक रही हैं.
एस्सार समूह के सीईओ प्रशांत रूइया कहते हैं, ''विदेशों में मंजूरी बहुत जल्दी मिल जाती है.'' रिलायंस इंडस्ट्री के चेयरमैन मुकेश अंबानी अपने अनुभव के चलते निस्संदेह इससे सहमत होंगे. हाल ही में उन्होंने दिल्ली में एक दोस्त को फोन करके यह जानना चाहा कि फरवरी में घोषित किए गए ब्रिटिश पेट्रोलियम के साथ 7 अरब डॉलर के उनके करार का क्या हुआ है. भारत के इस सबसे अमीर व्यक्ति को बताया गया कि मंजूरी मिलने के बावजूद, सौदे को आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति के पास भेजा गया है. सौदा सिरे तो चढ़ जाएगा. पर सवाल यह है कि कब.
बाधाएं डालने के लिए कुख्यात जयराम रमेश को पर्यावरण मंत्रालय से हटाना अनावश्यक लाल फीताशाही का सफाया करने की दिशा में शुरुआत मानी जा सकती है. इसके बावजूद आधारभूत ढांचे से जुड़े महत्वपूर्ण मंत्रालयों में अच्छा प्रदर्शन न करने वाले अन्य मंत्री कुर्सियों पर बने हुए हैं.
इनमें सड़क और राजमार्ग मंत्रालय में सी.पी. जोशी, जहाजरानी मंत्रालय में जी.के. वासन और ऊर्जा मंत्रालय में सुशील शिंदे प्रमुख हैं. प्रधानमंत्री ने कहा है कि वे 2014 तक बने रहेंगे. यह एक अच्छी खबर नहीं हो सकती. पर्यावरण मंत्रालय में नई आई जयंती नटराजन के लिए काम निर्धारित है. भारत के विकास के लिए महत्वपूर्ण ताप बिजली क्षेत्र 10 करोड़ टन कोयले की कमी की मार झेल रहा है, जिसके अगले पांच साल में दोगुना हो जाने की संभावना है.
खनन मंत्रालय में रमेश की मंजूरी न देने की नीति के चलते 60 करोड़ टन का कोयले का भंडार अछूता पड़ा है. अगर निवेशों को आकर्षित करना है और क्षमता संबंधी लक्ष्यों को हासिल करना है तो नई खानों को मंजूरी देनी होगी.
निराशाजनक कारोबारी माहौल का निचोड़़ निकालते हुए अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय कहते हैं, ''भारत हृास के चरण में प्रवेश कर रहा है. हम फिर से नियंत्रण के शासन की ओर जा रहे हैं. यहां करारों के कोई मायने नहीं हैं; पहले मिली मंजूरियों को बाद में रद्द किया जा सकता है. इस समय अत्यधिक सरकारी नियंत्रण का माहौल है.''
उच्च ब्याज दरों के कारण उद्योग जगत को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. पिछले साल भर में भारतीय रिजर्व बैंक ब्याज दरों में 10 गुना इजाफा कर चुका है, जिसकी वजह से ऋणों की लागत में 3 प्रतिशत अंक की वृद्धि होकर वह दोहरे आंकड़े में पहुंच गई है. इसके विपरीत, विदेश में पूंजी बहुत सस्ती बनी हुई है. सरकार ने कृषि अर्थव्यवस्था का इस कदर कुप्रंबधन कर दिया है कि शुरू में पैदा हुई खाद्य महंगाई की समस्या बाद में पूरी अर्थव्यवस्था पर हावी हो गई.
इस समय पूरी संभावना है कि 2011-12 में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि 8 फीसदी से नीचे रहेगी. देबरॉय कहते हैं, ''7.5 फीसदी की वृद्धि दर निराशाजनक है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करती है कि आपका बेंचमार्क क्या है.
ऐसा लगता है कि इस सरकार को 9.5-10 फीसदी के बजाए 7.5-8 फीसदी पर संतुष्ट होना होगा.'' अगर वे सही हैं तो यह मनमोहन सिंह का 1991 के वादे से पलटना होगा. निवेशक हमेशा ऐसे बाजार ढूंढ़ ही लेते हैं जहां उन्हें बेहतर लाभ मिल सकता है लेकिन ऐसे में करोड़ों आम भारतीय जो नई नौकरियों के लिए वृद्धि दर और नए निवेशों से आस लगाए रहते हैं, जरूर पीछे छूट जाएंगे.
-साथ में टी. सुरेंद्र और राजेश शर्मा
माहौल बदलने वाले विधेयक
''कुछ कंपनियों ने भारत से बाहर निवेश किया है. किसी इन विधेयकों को इस साल पारित कर देने से आर्थिक गतिविधियों को जबरदस्त गति मिल सकेगी और इससे निवेशकों के आत्मविश्वास को भी बनाए रखा जा सकेगा
खान (संशोधन) विधेयक
ऐसा प्रावधान लाकर जिसके अंतर्गत खनन कंपनियों के लिए प्रभावित आदिवासियों के साथ लाभ/रॉयल्टी साझा करना अनिवार्य होगा, यह विधेयक खनन गतिविधियों के विस्तार की राह में सबसे महत्वपूर्ण बाधा को दूर कर सकता है. लंबी चर्चा के बाद मंत्रियों के एक समूह ने इसे मंजूरी दे दी है और अब इसे कैबिनेट से हरी झ्ंडी मिलने का इंतजार है.
भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास विधेयक
पुराने भूमि अधिग्रहण कानून,1894 का स्थान लेने वाले इस सबसे जरूरी विधेयक में निजी क्षेत्र से अपेक्षा की जाएगी कि वह कुल भूमि के 70 फीसदी हिस्से को सीधे किसानों से खरीद सकेगा. इससे किसानों को बेहतर कीमत मिल सकेगी. पुनर्वास संबंधी प्रावधान उन विरोधों को शांत कर सकते हैं जिनके चलते जमीन को बेचने की राह में कई तरह की दिक्कतें पेश आती है.
बैंकिंग कानून (संशोधन) विधेयक
पहली बार 2005 मेंसंसद में पेश किए गए इस विधेयक के जरिए बंद माने जाने वाले भारतीय बैंकिंग क्षेत्र को मुक्त किया जा सकेगा. महत्वपूर्ण यह है कि यह विधेयक बैंकों के शेयरधारकों को उनके हिस्से के अनुपात में वोट देने का अधिकार प्रदान करेगा. अभी शेयरधारकों के पास सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में अपनी वास्तविक इक्विटी के एक फीसदी और निजी क्षेत्र के बैंक में 10 फीसदी वोट का अधिकार है.
बीमा कानून (संशोधन) विधेयक
2008 संसद में पेश किया गया यह विधेयक घरेलू बीमा कंपनियों में (26 फीसदी से बढ़कर) 49 फीसदी विदेशी निवेश की अनुमति प्रदान करेगा.
पेंशन फंड और विकास नियामक प्राधिकरण विधेयक
पहली बार 2005 में संसद में रखा गया, यह विधेयक पेंशन में 26 फीसदी एफडीआइ की इजाजत देगा. इसके साथ ही यह स्वतंत्र नियामक को वैधानिक दर्जा भी प्रदान करेगा.
कंपनी विधेयक
कंपनी विधेयक 1956 का बहुवांछित संशोधित रूप यह विधेयक शेयरधारकों को धोखेबाज प्रमोटरों के खिलाफ उचित कार्रवाई का मौका प्रदान करेगा. कंपनी कानून में यह बदलाव कोई दो साल से लंबित है जब पहले सत्यम घोटाले का पर्दाफाश हुआ था.
प्रत्यक्ष कर संहिता विधेयक
कॉर्पोरेट और इनकम टैक्स को कम करके जबकि अन्य सभी छूटों को खत्म करके यह अनुपालन और सरकार के लिए राजस्व में वृद्धि करेगा. इसके जरिए सरकार द्वारा छूट देने की ताकत को खत्म किया जा सकेगा, जिसका अक्सर अपने अनुसार फायदा उठाया जाता है. सरकार शेयरधारकों के बीच सर्वसम्मति बनाने में असफल रही है
संविधान (115वां संशोधन) विधेयक (जीएसटी विधेयक)
यह भारत के अप्रत्यक्ष कर तंत्र की पूरी मरम्मत करेगा जो अपने मौजूदा रूप में एक ही वस्तु या सेवा पर कई तरह के कर थोपता है. प्रत्यक कर संहिता की तरह, यह छूटों को खत्म कर देगा और दरें घटा देगा, अनुपाल और सरकार के लिए राजस्व में वृद्धि करेगा. सरकार सभी राज्यों को यह समझाने में विफल रही है कि यह उनके हित में ही है.
दशक में बदला दृश्य
1991 और 2001 में सरकार ने मुश्किल आर्थिक माहौल का बड़ी दिलेरी से सामना किया. 2011 में यह पंगु होने की स्थिति में है.
1991
पी.वी. नरसिंह राव और मनमोहन सिंह
सरकार ने एफडीआइ को मुक्त किया, वृद्धि को लगे पंख
1990-91 के दशक में आर्थिक विकास की दर घटकर 6 फीसदी पर आ गई. मुद्रास्फीति की दर 12 फीसदी से अधिक थी. सरकार का राजस्व घाटा विराट रूप ले चुका था और यही स्थिति विदेशी ऋण दायित्व की थी, यह सब 1980 के समूचे दशक में की गई फिजूलखर्ची का नतीजा था. खाड़ी युद्ध से तेल की कीमतें खासी बढ़ गई थीं. भारत के पास विदेशी मुद्रा का भी घोर संकट था. वह सिर्फ इतना ही था कि इससे पखवाड़े भर के लिए तेल का आयात किया जा सके. वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने स्वतंत्र भारत के सबसे प्रसिद्ध बजट भाषण के साथ इस समस्या का समाधान निकाला. उन्होंने निजी क्षेत्र की बंधी हुई ऊर्जा को पूरी तरह से मुक्त कर दिया. निर्यातों को प्रोत्साहित करने और विदेशी मुद्रा अर्जित करने के लिए रु. के अवमूल्यन को बजट से पहले अंजाम दे दिया गया. मनमोहन ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को भी मुक्त कर दिया. उन्होंने आयात पर शुल्क की दरों को घटाकर लगभग आधे पर ला दिया और भारतीय उद्योगों से और अधिक प्रतिस्पर्धी होने का आग्रह किया. महत्वाकांक्षी संस्थागत सुधारों के जरिए लाइसेंस-परमिट राज को खत्म करना भी इसी बजट से शुरू हुआ था. भारत के विकास की दर 1980 के दशक में 5-6 फीसदी के आंकड़े से बढ़कर 1990 के दशक में 6-7 फीसदी पर पहुंच गई. 1980 के दशक के विपरीत यह वृद्धि दीर्घकालिक थी.
2001
अटल बिहारी वाजपेयी और यशवंत सिन्हा
कर, श्रम कानूनों में बदलाव
2000-2001 में आर्थिक विकास दर घटकर 6 फीसदी पर आ गई. मुद्रास्फीति की दर 7.2 फीसदी के उच्च स्तर पर थी. विदेशी निवेश चार साल की अवधि के न्यूनतम स्तर पर था. वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने फरवरी 2001 में एक बेबाक बजट भाषण में इसका तोड़ निकाला. उन्होंने आय कर और कंपनी कर की उच्च दर में 5 प्रतिशत अंकों की कमी कर दी. ब्याज दरें भी 1.5 प्रतिशत अंक घटा दी गईं. उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र की 27 इकाइयों के निजीकरण को मंजूरी दे दी. उन्होंने कभी न छेड़े जाने वाले श्रम कानूनों में यह कहकर बदलावों की घोषणा की कि ऐसा करने की जरूरत है. इस बजट ने अगले दशक के लिए 8 फीसदी की वृद्धि दर की नींव तैयार कर दी.
2011
मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी
नदारद सुधारवादी उपाय
आर्थिक वृद्धि 2010-11 में 8 फीसदी पर आ गई. वित्त वर्ष 2010-11 की आखिरी तिमाही में वृद्धि 7.8 फीसदी थी, जो 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद की दो तिमाहियों में सबसे कम थी. मुद्रास्फीति लगातार बढ़ रही है, जो जून में 9.6 फीसदी आंकी गई है. विकसित अर्थव्यवस्थाओं में धीमी विकास दर और तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल पहुंचने के कारण अंतरराष्ट्रीय माहौल भी विपरीत रहा. वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का बजट किसी उग्र सुधारवादी कदम का खुलासा करने में नाकाम रहा. सरकार मुद्रास्फीति का प्रमुख कारण माने जाने वाले कृषि क्षेत्र की समस्याओं का समाधान करने में असफल रही.
शशि रूइया
विदेश में निवेश 1.2 अरब डॉलर (2010-2011)
भारत में निवेशः 20 करोड़ डॉलर (2010-2011)
मुकेश अंबानी
विदेश में निवेश 5 अरब डॉलर (2011)
भारत में निवेशः 2.7 अरब डॉलर (2010)
रतन टाटा
विदेश में निवेश 4 अरब डॉलर (2009-2010)
भारत में निवेशः 20 करोड़ डॉलर (2010-2011)
अनिल अंबानी
विदेश में निवेश 3 अरब डॉलर (2010-2011)
भारत में निवेशः 40 करोड़ डॉलर (2011)
सुनील मित्तल
विदेश में निवेश 16 अरब डॉलर (2010-2011)
भारत में निवेशः 2 अरब डॉलर (2011)
मनमोहन सिंह के सुधारों के बीस बरस बाद भारत की विकास गाथा पर विराम लगता नजर आ रहा है. सरकार के अर्थव्यवस्था का गला घोंटने पर कंपनी जगत का विदेशों की ओर रुख
5 काम जिनसे चमक लौट सकती है
सरकार नए कानून की जरूरत के बिना भी विदेश की ओर जाती पूंजी को रोकने के लिए काफी कुछ कर सकती है
1.मल्टी ब्रांड रिटेल में विदेश निवेश की इजाजात दें
सरकार खाद्यान्नों की बढ़ती महंगाई की गहराती समस्या पर लगाम लगाने में विफल रही है जिसका असर बाकी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है, और इसी वजह से भारतीय रिजर्व बैंक को ब्याज दरों में भी इजाफा करना पड़ा. इससे उद्योगों पर बोझ पड़ा है. बड़े खुदरा कारोबारियों के आने से किसान और उपभोक्ताओं के बीच की आपूर्ति श्रृंखला में आने वाले कई मध्यस्थों की संभावनाएं ही खत्म हो जाएंगी. विभिन्न मध्यवर्ती वर्गों का कमीशन खत्म होने से बड़ी खुदरा कंपनियां उपभोक्ताओं के लिए कम कीमतों पर चीजें मुहैया करा सकेंगी. इससे किसानों को भी बेहतर दाम उपलब्ध हो सकते हैं. यह स्थिति चिंतित विदेशी निवेशकों के लिए भी सकारात्मक संकेत का काम करेगी.
2.कृषि में सुधार करें
जहां खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश कुछ हद तक महंगाई को कम करेगा, वहीं इस समस्या के आमूल-चूल समाधान के लिए कृषि अर्थव्यवस्था में सुधारों की जरूरत है. यह क्षेत्र पिछले 20 साल में बदलाव से पूरी तरह से अछूता रहा है. जरूरत है कि सरकार राज्यों को तुरंत कृषि उत्पाद विपणन समिति कानून में सुधार करने के लिए मनाए, जिससे व्यापारियों के संघ बनने में प्रोत्साहन मिलेगा. अनाज की बर्बादी को रोकने के लिए जरूरी है कि सरकार कृषि संबंधी प्रचालन-तंत्र (भंडारण और परिवहन) में सुधार करे. ठेके पर खेती को कुछ हद तक इजाजत दी जा सकती है.
3.सड़क निर्माण में तेजी लाएं, लाल फीताशाही घटाएं
जरूरत है कि सरकार जल्द ही ऐसा तंत्र विकसित करे जो सड़क और राजमार्ग के निर्माण कार्य को तेजी दे सके. इस समय वे लाल फीताशाही के कारण अधर में लटके हैं. बिजली क्षेत्र कोयले की भारी कमी से जूझ्ता दिख रहा है. नए खनन को मंजूरी देनी ही होगी. बड़े बंदरगाहों के विकास की दिशा में भी बहुत कम काम हुआ है. भारतीय बंदरगाहों पर जहाजों पर सामान लादने और उतारने में लगने वाला समय सर्वश्रेष्ठ वैश्विक मानकों से कहीं ज्यादा है.
4.पैसा खर्च करें, पर जवाबदेह भी रहें
यूपीए एक बड़ी राशि जनता पर खर्च करने के लिए प्रतिबद्ध है, विशेष रूप से नरेगा और खाने का अधिकार सरीखे कल्याणकारी कार्यक्रमों पर. इसमें बदलाव की संभावना नहीं है. जब वृद्धि धीमी होती है और सरकार का राजस्व गिरता है तो राजस्व घाटे का जबरदस्त दबाव होता है. अगर यह काबू से बाहर हो जाता है तो इससे निवेशक दूर रहेंगे और विकास पर असर पड़ेगा. जरूरत इस बात की है कि सरकार जवाबदेही का बेहतर तंत्र लाए.
5. जांच करें, लेकिन अंधेरगर्दी नहीं
बिना जमानत के जेल में ठुंसे हुए उद्योगपतियों के आंकड़े को देखकर ही संभावित निवेशक डर जाते हैं. सरकारी जांच एजेंसियों के मनमाना फैसला लेने का भय अफसरशाहों को साधारण निर्णय लेने से भी रोकता है, जिससे परियोजनाएं अधूरी पड़ी हैं. सरकार को तत्काल यह पक्का कराना होगा कि भ्रष्टों के खिलाफ कार्रवाई ईमानदारों को निशाना बनाने की कवायद में तब्दील नहीं होगी.
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