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रोना-धोना छोड़ो, फटाफट बदलो टीम

ढहती बल्लेबाजी और मोहल्ला छाप गेंदबाजी के चलते भारतीय क्रिकेट टीम की ऑस्ट्रेलिया में जो बुरी गत बनी, उसका सबक यही है कि अब टीम में नए चेहरों को जगह देने का वक्त आ गया है.

क्रिकेट
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अपडेटेड 7 फ़रवरी , 2012

आठ साल पहले स्टीव वॉ के फेयरवेल टेस्ट मैच में भारत ने जब ऑस्ट्रेलिया को ड्रॉ के लिए मजबूर कर दिया था, तो मैथ्यू एंजेल ने गार्डियन में लिखा, ‘क्रिकेट के आसमान पर कुछ नए सितारे चमक रहे हैं. भारत के मध्य क्रम में खुली आंखों से इस तारामंडल को देखा जा सकता है-राहुल द्रविड़, मैन ऑफ द सीरीज, सचिन तेंडुलकर, वी.वी.एस. लक्ष्मण और सौरव गांगुली. ऐसा लगता है कि आने वाले वर्षों में ये ही टेस्ट क्रिकेट को रोशन करेंगे.’

और ऐसा ही हुआ. इन सब ने मिलकर भारत को एक दशक के भीतर क्रिकेट का सरताज बना दिया. लेकिन इन सर्दियों में जब इनकी वापसी ऑस्ट्रेलिया में हुई, तो समूचा देश इन्हें देखकर सदमे में था. नए जोश से तरोताजा ऑस्ट्रेलियाई टीम ने भारतीय सितारों की चमक को अंधेरे में बदल डाला.

कुछ लोगों का मानना है कि तेंडुलकर, द्रविड़ और लक्ष्मण को लेकर भारतीयों की सराहना सनक की हद तक चली जाती है. इसमें कोई दो राय नहीं कि लोगों की भावनाएं अब इनके पतन की आहट दे रही हैं. इसके बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इन्होंने एक ऐसी टीम की किस्मत ही पलट दी थी जिसने आजीवन छिटपुट कामयाबी के अलावा कुछ भी हासिल नहीं किया था.

मसलन, कुछ तथ्यों पर गौर करें: नवंबर 1996 में लक्ष्मण के अंतरराष्ट्रीय टेस्ट में प्रवेश से पहले भारत ने 299 मैच खेले, 55 जीते और 98 हारे. तब से लेकर अब तक 163 मैच हुए हैं जिनमें भारतीय टीम को 57 में जीत मिली है और 49 में हार. यदि इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में हार नहीं होती, तो शायद यह आंकड़ा और असरदार होता.

जिन टेस्ट मैचों में ये तीनों मिलकर खेले, इस तिकड़ी ने 67 शतक बनाए, जिनमें अधिकतर ने पिछले दशक में हुई जीत में केंद्रीय भूमिका निभाई और दूसरे देशों में भारतीय टीम पर खराब प्रदर्शन के ठप्पे को धोने में मदद की. चिंता की बात है कि पुराने बुरे दिन लौट रहे हैं और बल्लेबाजी लड़खड़ा रही है. वे सारी कमजोरियां अब इस टीम में नजर आ रही हैं जिनसे कभी भारत को पहचाना जाता था. फिर आगे का रास्ता क्या है? जाहिर है, टीम में ताजगी लाने के लिए नए चेहरों को लाया जाना निर्णायक होगा. तेंडुलकर, द्रविड़ और लक्ष्मण भले कभी संन्यास लेने की घोषणा करें, उनकी जगह लेने वाले खिलाड़ियों की पहचान करके उन्हें खुद को इस टीम का हिस्सा मानने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए.

चूंकि अब दर्शक से लेकर विशेषज्ञ सभी, टेस्ट मैचों में धोनी की कप्तानी पर सवाल खड़े कर रहे हैं, लिहाजा दूसरों की नेतृत्व क्षमता को भी परखना होगा. कुछ हलकों में उप-कप्तान वीरेंद्र सहवाग का नाम लिया जा रहा है, लेकिन एक ऐसे व्यक्ति को कप्तानी देने का कोई मतलब नहीं जो 33 साल का हो और मौजूदा कप्तान से तीन साल बड़ा हो. इसके अलावा, सहवाग ने हाल के महीनों में कोई खास प्रदर्शन भी नहीं किया है जिससे यह माना जा सके कि पांच दिवसीय मैचों में वे इस जिम्मेदारी को निभा पाएंगे.

अगर कुछ महीने पहले यह बात उठती तो स्वाभाविक पसंद गौतम गंभीर होते, लेकिन एक तो खराब फॉर्म और ऊपर से घरेलू मैदान पर मिलने वाले फायदे से जुड़े कुछ अराजक बयानों के चलते उनका पत्ता कमजोर है. अगर बदलाव करना ही है तो गंभीर इसके बावजूद सबसे बेहतर विकल्प होंगे, जिनके साथ अंडर-19 की अभूतपूर्व कप्तानी करने वाले 23 साल के विराट कोहली खड़े हैं, हालांकि वह अब भी अपनी जगह बनाने में लगे हुए हैं. जो भी हो, शीर्ष क्रम में बदलाव तो करना ही होगा. पिछले 12 माह में गंभीर और सहवाग का प्रदर्शन खास नहीं रहा है और सहवाग ने वैसे भी मध्म क्रम में आने की अपनी इच्छा जता दी है बशर्ते कोई जगह वहां खाली होती है. छठवें नंबर पर पुरानी गेंद के साथ वह वैसा ही बरताव कर सकते हैं जैसा नई गेंद के साथ करते आए हैं. मत भूलिए कि 2001 में दक्षिण अफ्रीका के ब्लोएमफोंटीन में अपना पहला शतक उन्होंने छठवें क्रम पर बल्लेबाजी करते हुए ही ठोका था.

गंभीर का साथ देने के लिए कोहली के अलावा कई अन्य उम्मीदवार दिखते हैं. मुंबई के 23 वर्षीय ओपनर अजिंक्य रहाणे का प्रथम श्रेणी क्रिकेट में 68.47 का औसत है और वे अपनी जिम्मेदारी निभा ले जाएंगे. इंग्लैंड में सीमित ओवरों के दौरान उन्हें परखा गया था और जिन्होंने भी उन्हें देखा, उनका मानना है कि यह लंबी रेस का घोड़ा है. रहाणे ने उस मैच में कुछ बेहद आकर्षक स्ट्रोक्स जमाए थे.

टीम का दिल होता है मध्य क्रम और ऑस्ट्रेलिया में अचानक इस दिल की धड़कन रुक गई थी. इस क्रम में हर जगह पर विशिष्ट क्षमता वाले खिलाड़ियों की जरूरत होती है और खिलाड़ियों को इस क्रम में मौका दिया जाना चाहिए. फिलहाल, तीसरे नंबर पर ऐसा आदमी चाहिए जो पारी को संभाल सके और साथ ही तेजी से रन बटोर सके. एकदिवसीय क्रिकेट में कोहली ने यह काम अच्छे से किया है और ऑस्ट्रेलिया टेस्ट में भी मजबूत प्रदर्शन के चलते इस नंबर पर उनकी दावेदारी मजबूत हुई है.

चौथे नंबर पर तेंडुलकर की जगह जब भी जो आएगा उसमें मजबूत स्ट्रोक लगाने की क्षमता होनी चाहिए. मुंबई के 24 वर्षीय रोहित शर्मा को आज का सबसे हुनरमंद बल्लेबाज मानने वाले अकेले इयान चैपल ही नहीं हैं. उनकी क्षमता पर किसी को भी शक नहीं. उन्हें पिछले साल विश्व कप में जगह नहीं मिल पाई, हालांकि तब से लेकर अब तक एकदिवसीय क्रिकेट में उनकी राह में जितने भी मौके आए हैं, उन्होंने उसमें खुद को साबित किया है. टेस्ट टीम में उन्हें लिए जाने में की गई देरी पूरे भारतीय क्रिकेट के लिए नुकसानदायक होगी. इसके अलावा एक और निर्णायक जगह छठवां नंबर है, जहां लक्ष्मण ने कई बार अपनी वीरता दिखाई है. निचले क्रम में बल्लेबाजी करना सबसे मुश्किल काम है. इस स्थान पर आग उगलने वाली गेंदबाजी के खिलाफ बल्लेबाज को एक तो ढाल चाहिए होती है, दूसरे उन्हें आत्मविश्वास भी दिलाना होता है ताकि वे अपना स्वाभाविक प्रदर्शन कर सकें, जैसा कि लक्ष्मण ने 23 वर्षीय ईशांत शर्मा के साथ अक्तूबर 2010 में मोहाली में किया था. इस भूमिका को निभाने के लिए खिलाड़ी को शांतचित्त होना चाहिए. इसके उदाहरण के तौर पर सवा साल पहले ऑस्ट्रेलिया टेस्ट में मध्य क्रम के सौराष्ट्र से आने वाले 24 साल के बल्लेबाज चेतेश्वर पुजारा की पारी याद की जा सकती है.

पांचवें स्थान पर एक और बाएं हाथ का बल्लेबाज चाहिए. अगले सत्र की शुरुआत तक यदि युवराज सिंह खेलने लायक हो जाते हैं तो उन्हें इस स्थान पर दावा जताने का आखिरी मौका देना होगा. यदि ऐसा नहीं होता तो उत्तर प्रदेश के 25 वर्षीय सुरेश रैना पहले से तैयार बैठे हैं. शॉर्ट बॉल के खिलाफ रैना असहज रहते हैं, इस पर उनकी काफी आलोचना भी हुई है, लेकिन उनसे बेहतर खिलाड़ियों को भी ऐसी दिक्कतें झेलनी पड़ी हैं. खासकर भारत की फील्डिंग में रैना केंद्रीय भूमिका में रहते हैं और किसी ने आज तक मेहनत करने की उनकी क्षमता पर सवाल नहीं खड़ा किया.

एक अन्य दिलचस्प विकल्प तमिलनाडु के ओपनर 22 वर्षीय अभिनव मुकुंद हैं. विदेशी मैदानों पर उनका अनुभव अच्छा है और घरेलू रिकॉर्ड भी जबरदस्त है. परिचित परिस्थितियों में एकाध सीरीज खेलने के बाद वे भारतीय टेस्ट टीम के लिए तैयार माने जा सकते हैं.

ऑस्ट्रेलिया में हुई हार पर कोहली के अलावा अगर कोई सांत्वना देने वाला है तो वे हैं 27 साल के ऋद्धिमान साहा. मुश्किल हालात में वे बल्लेबाजी भी कर सकते हैं, ऐसा उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में साबित कर दिया. यदि धोनी भविष्य में कभी हटते हैं, तो इसमें कोई शक नहीं कि विकेटकीपर बल्लेबाज के तौर पर साहा का बेहतर विकल्प हो सकते हैं.

वापसी की राह हरभजन सिंह भी देख रहे हैं, लेकिन चयनकर्ताओं को गंभीरता से दाएं हाथ के ऑफ ब्रेक गेंदबाज 25 वर्षीय आर. अश्विन के बारे में सोचना होगा. ऑस्ट्रेलिया में 62.77 की दर से 9 विकेट का उनका रिकॉर्ड भले ही बहुत प्रभावशाली न हो, लेकिन तब आपको मुथैया मुरलीधरन के बारे में भी सोचना चाहिए कि उन्होंने कैसे वहां की परिस्थितियों से संघर्ष किया (पांच टेस्ट में 75.41 की दर से 12 विकेट). ऑफ -स्पिनरों के लिए वहां हालात हमेशा ऐसे ही रहे हैं, हालांकि घरेलू मैदान पर अश्विन को भारत की ओर से फिरकी आक्रमण की कमान दे दी जानी चाहिए क्योंकि वे उसके लायक हैं.

जहां तक तेज गेंदबाजी का सवाल है, हालात और मुश्किल हैं. जहीर खान ने पहली बार ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट खेला, लेकिन उनकी रेस अब बहुत लंबी नहीं रह गई है. ईशांत शर्मा उम्मीद के मुताबिक सुधार नहीं कर सके हैं. 24 साल के उमेश यादव ने भी खुद में कोई भरोसा नहीं जगाया. उन्हें और 22 वर्षीय वरुण ऐरोन को तेज गेंदबाजी पर ध्यान लगाने के लिए कहा जाना चाहिए जबकि 25 वर्षीय प्रवीण कुमार और 27 वर्षीय इरफान पठान जरूरत पड़ने पर स्विंग आजमा सकते हैं.

कुल मिलाकर कह सकते हैं कि अभी ज्‍यादा उम्मीदें लगाने की जरूरत नहीं. चीजें बेहतर होने से पहले और लड़खड़ाएंगी और एक बात तय है कि नौजवानों की उपेक्षा कर के भारतीय क्रिकेट कहीं का नहीं रह जाएगा. टेस्ट क्रिकेट में अपने पैर जमाने में लक्ष्मण को 20 मैच लग गए, जाहिर है उनके बाद आने वालों को भी तो उतना वक्त और मौका देना होगा ताकि वे उसमें रम सकें.
(दिलीप प्रेमचंद्रन विज्‍ड़न इंडिया के एडिटर-इन-चीफ हैं.)

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