अट्ठाईस अक्टूबर से ग्रेटर नोएडा में शुरू होकर लगातार तीन दिनों तक बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट (बीआइसी) में गुक्की के बस्ते लटकाए और डायने फ्रस्टनबर्ग के कपड़ों में लकदक सुंदर चेहरे कभी फूलेंगे और कभी खिलखिलाएंगे.
भारत की धरती पर पहली बार होने वाले एक बड़े नजारे-अपना खुद का ग्रां प्री-में मैदान पर ये लोग मोएत ऐंड शेंडोन और डॉम पेरिगनॉन शैंपैन की चुस्कियां लगाकर जश्न मनाते हर्मीज स्कार्फ में बेसब्री के साथ गांठ लगाते नजर आएंगे.
ये 'वो', यानी बीवियां और महबूबाएं, जैसे कि दो बार के विश्व चैंपियन सिबेस्टियन वेटल की महबूबा हाना प्रेटर, या सर्किट में लंबे समय से देखी जा रही निकोल शेरजिंगर, जो लुइस हैमिल्टन की लंबे समय से संगिनी हैं और पूसीकैट डॉल की पूर्व स्टार हैं, सितारों से भरे रफ्तार के शौकीनों के लिए पिट (रेसिंग में रिफ्यूलिंग की खातिर रुकने का क्षेत्र) में बिजली गिराने के लिए तन कर खड़ी हो चुकी हैं.
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चर्चा यह है कि शेरजिंगर और 2009 के विश्व चैंपियन जेसन बटन की जापानी महबूबा जेसिका मिचिबाता, दोनों भारत आने के विचार से मुग्ध होने के लिए अब और इंतजार करने को तैयार नहीं हैं. इनके साथ जोड़ दीजिए 12 बेहद खूबसूरत लंबी-चौड़ी ग्रिड गर्ल्स को, जिनका चयन एक जूरी ने जूम पर हुए एक रियल्टी शो में मतदान के आधार पर किया था. सबको मिलाने पर वहां का समां इतना मादक हो जाएगा कि उसे नजरअंदाज करना मुश्किल होगा.
भारत में होने वाली अब तक की सबसे जबरदस्त रेस के लिए, सबसे नई फव्रारी से लेकर रेड बुल चार्जर तक, दुनिया की 24 सबसे खौफनाक मशीनें सड़क पर कतार में खड़ी होंगी. बहरे होने के लिए तैयार हो जाइए, क्योंकि कोई भी फॉर्मूला वन कार जब पूरी ताकत झेंकती है, तो 110 डेसिबल की आवाज पैदा होती है. और जब 24 कारें एक साथ शुरू होंगी, तो शोर का स्तर कान के परदे फाड़कर रख देगा.
इसे ऐसे समझिए, टेक ऑफ के दौरान एक बोइंग 747 की आवाज का स्तर लगभग 120 डेसिबल होता है. लिहाजा कानों में ठूंसने के प्लग लेकर तैयार हो जाइए, और पीछे की सीट पर बैठिएगा, क्योंकि खेल के एक लाख दीवानों के पास बैठने पर आवाज का स्तर और बढ़ सकता है, क्योंकि वे 90 मिनट से कुछ कम समय तक चलने वाली इस रेस में अपने पसंदीदा खिलाड़ियों की जमकर हौसला अफजाई करेंगे.
एफ-1 रेसिंग के सम्राट और इस खेल को एक वैश्विक शौक में बदलने के लिए जिम्मेदार व्यक्ति बर्नी एक्लेस्टॉन किनारे पर खड़े होंगे और वे 19वें सर्किट को साकार होता देखेंगे.
26 अक्टूबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
एक ग्रांडस्टैंड सीट, जिसकी कीमत 35,000 रु. है (और सारी सीटें बिक चुकी हैं) आपको उद्घाटन समारोह, रेस की शुरुआत, फिनिश, मंच के जश्न और इसके साथ ही पिट पर रुकने की कार्रवाई का सबसे अभूतपूर्व नजारा पेश करेगी, जब हर घटते लैप के साथ तनाव और रोमांच बढ़ता जाएगा. क्या आप अपने अनुभव को एक नए स्तर तक ले जाना चाहते हैं?
तो लैप लाउंज पर प्रैक्टिस के दो दिनों के लिए तीन लाख रु. में और ऐन रेस के दिन के लिए 5 लाख रु. में एक ग्रांडस्टैंड टेबल (जिसमें चार लोग बैठ सकते हैं) बुक करा लीजिए. वहां मोएत ऐंड शैंपेन और प्रीमियम वोड्का और टेकिला के जाम मुफ्त में मिलेंगे. सारे स्पॉट में सबसे ज्यादा ईर्ष्या करने लायक है एक्सक्लूसिव पैडॉक क्लब, जो दुनियाभर में फार्मूला वन रेसिंग की मेहमाननवाजी के मामले में पहली और आखिरी चीज है.
वहां बैठकर आप दुनिया के सर्वश्रेष्ठ स्पिन आर्टिस्ट की गई धुन सुनते हुए, मम शैंपेन के जाम पर जाम गटकते जाइए (ठीक वही शैंपेन जिसे रेस जीतने वाला छिड़कता है), और हॉलीवुड, बॉलीवुड और उन सारे लोगों के साथ कंधा लड़ाइए जो इनके बीच होते हैं.
इस शानदार मेहमाननवाजी के अलावा, यह कार और मोटर रेसिंग की दुनिया के दिग्गजों को करीब से देखने और उनसे निजी तौर पर मिलने का मौका है. 1994 से 2006 तक रेस पर सीजन दर सीजन दबदबा कायम रखने वाले माइकल शुमाकर मर्सिडीज की तरफ से रेस लगाएंगे, मैकलारेन के लुइस हैमिल्टन, मौजूदा चैंपियन वेटल और साथ ही रेसिंग के बाकी महारथी इस आयोजन को रफ्तार का पर्याय बना देंगे.
प्रायोजकों का ब्रांडवैगन
यह ट्रैक 1,700 करोड़ रु. की लागत से बनाया गया है. आयोजन जेपी ग्रुप को उम्मीद है कि 150 करोड़ रु. तो वे सिर्फ टिकट बिक्री से ही जुटा लेंगे. प्रायोजक कुछ बता नहीं रहे हैं, लेकिन अनाधिकारिक अनुमानों के मुताबिक, हर ग्रां प्री में करीब 1.20 करोड़ डॉलर सिर्फ विज्ञापन और प्रायोजन पर खर्च कर दिए जाते हैं.
भारत के सबसे बड़े टेलीकॉम सेवा प्रदाता एयरटेल ने ग्रां प्री के टाइटल प्रायोक का तीन साल का करार करने के लिए कथित तौर पर 150 करोड़ रु. खर्च किए हैं. 20 करोड़ ग्राहकों वाला एयरटेल तमाम शहरों के युवा भारतीयों को आकर्षित करने का प्रभावी माध्यम होगा.
एक अन्य आधिकारिक प्रायोजक महिंद्रा ऐंड महिंद्रा ने बीआइसी के साथ पांच साल का करार किया है. एक गैर-नकद किस्म के प्रतीत होने वाले प्रायोजन के तहत, कंपनी 25 स्कॉर्पियो एसयूवी उपलब्ध कराएगी, जो रेस ट्रैक पर सुरक्षा और देखभाल की गाड़ियों के तौर पर इस्तेमाल की जाएंगी.
इसके एवज में बीआइसी महिंद्रा के एडवेंचर इनिशिएटिव को वर्ष भर सहायता देगी. ब्रांडिंग विशेषज्ञों का कहना है कि आधिकारिक प्रायोजक मर्सिडीज और प्यूमा ने 50 करोड़ से 100 करोड़ रु. के बीच की रकम भारतीय ग्रां प्री की अपनी कई वर्षों की सदस्यता के लिए दी है. जहां मर्सिडीज भारतीय रेस के दौरान विज्ञापन करेगी, वहीं प्यूमा ने ड्राइवरों के लिए फायर ह्ढूफ रेस वियर तैयार किया है.
इसके बाद इसमें शामिल होते हैं टीम प्रायोजक. मिसाल के तौर पर पिछले वर्षों में अलग-अलग टीमों के साथ एक रेस के सौदे 50 लाख से 2 करोड़ डॉलर के बीच हुए थे. इस वर्ष के एक टीम के प्रायोजकों में अमूल शामिल है, जो सौबर का टाइटल प्रायोजक है, और हीरो मोटरकॉर्प है, जो नारायण कार्तिकेयन की हिस्पानिया रेसिंग टीम को प्रायोजित कर रहा है.
हीरो मोटर्स के प्रबंध निदेशक पंकज मुंजाल कहते हैं, ''किसी भारतीय ड्राइवर को एफ-1 में रेस लगाते हुए देखना हमें काफी गौरवान्वित करता है और हम स्थानीय प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करके इस खेल के साथ भारत का जुड़ाव पैदा करने के प्रति आशान्वित हैं.''
अमूल भी भारतीय ग्रां प्री में सौबर को प्रायोजित करने कूद पड़ा है. अमूल का लोगो न केवल टीम के ड्राइवरों के हेल्मेट पर दिखाया जाएगा, बल्कि पिछले विंग पर भी होगा. हालांकि न तो सौबर और न ही अमूल ने सौदे की रकम बताई है, लेकिन पिछले वर्षों में ऐसे प्रायोजन की लागत 50 लाख से 2 करोड़ डॉलर के बीच रही है.
अमूल के स्वामित्व वाले गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फव्डरेशन के प्रबंध निदेशक एस. सोढ़ी कहते हैं, ''सफलता के लिए टीमवर्क, तकनीक, गति और नए प्रयोगों की अमूल की दृष्टि एफ1 के मूल्यों से मेल खाती है.'' टीम का कुल बजट 9 करोड़ से 30 करोड़ डॉलर के बीच बैठ सकता है, जिसका 50 प्रतिशत इंजन की लागत पर चला जाता है.
टाइटल प्रायोजकों के अलावा कई कंपनियों में कार और ड्राइवर के जंप सूट्स पर अपने ब्रांड को दर्ज करवाने की होड़ लगी हुई है. वे सालाना करार के लिए निर्माताओं को 60 लाख से लेकर 1 करोड़ 20 लाख डॉलर तक चुकाने के लिए तैयार हैं.
जो खेल दो दशकों से ज्यादा समय से टीवी पर दिखाया जाता रहा है और जिसने कई इच्छुक रेसर्स का कॅरिअर बना दिया है, उसके दर्शकों की संख्या भी इतनी ही चौंका देने वाली है. ईएसपीएन स्टार स्पोर्ट्स के प्रबंध निदेशक मनु साहनी बताते हैं, ''एफ1 का 2010 सीजन भारत में 2.47 करोड़ दर्शकों तक पहुंचा था और इस वर्ष यह पहले ही शुरुआती 15 रेसों के लिए 2.39 करोड़ दर्शकों तक पहुंच चुका है.
अभी चार रेस बाकी हैं, ऐसे में आंकड़ा निश्चित तौर पर और आगे जाएगा. हम विज्ञापनों की बिक्री के दृष्टिकोण से एफ1 का पूरा सीजन पहले ही बेच चुके हैं. हमारे प्रायोजकों में सोनी, सैमसंग, वोडाफोन और पेट्रोनास शामिल हैं. इसके अलावा एमआरएफ, शेल, बीपीसीएल, टाटा मोटर्स और भारती सेलुलर ने स्पॉट खरीदारों के तौर पर करार किए हैं.'' मजबूत ब्रांडों की एक प्रभावशाली सूची इस पहली रेस को मार्केटिंग के मुकम्मल मौके के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए उत्सुक है.
जेपी का एफ1 दांव
जेपी ग्रुप के मालिक गौड़ परिवार के लिए यह स्पष्ट तौर पर एक चोखा धंधा साबित हुआ है. वह दुनियाभर में एफ1 को नियंत्रित करने वाले फेडरेशन इंटरनेशनेल डि ला'आटोमोबाइस (एफआइए) के साथ सौदा करके एफ1 के नक्शे पर भारत को लाने के लिए जिम्मेदार है. इससे जेपी को एक दशक तक भारत में सालाना रेसिंग प्रतियोगिता कराने की इजाजत मिल गई है.
कंपनी के लिए ऐसा सर्किट तैयार करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था जो पैसा कमा सके. फॉर्मूला वन आज जिस तरह का मर्दाना वैश्विक चस्का है, उसे वैसा बनाने वाले ब्रिटेन के दिग्गज व्यवसायी एक्लेस्टोन ने फॉर्मूला वन के एक गड़गड़ाता धंधा बनने के काफी पहले ही अपना सारा हिसाब-किताब पूरा कर लिया था.
जेपी ग्रुप के लिए इसका अर्थ है कि उसे फार्मूला वन मैनेजमेंट (एफओएम) को, जिसके प्रमुख एक्लेस्टोन हैं, 3.35 करोड़ डॉलर से ज्यादा की रकम सालाना लाइसेंस फीस के तौर पर चुकानी होगी. सर्किट पर डेढ़ से दो करोड़ डॉलर के बीच संचालन खर्च भी आएगा, जिसमें प्रबंधन और दौड़-धूप के खर्च शामिल हैं.
टीवी और इंटरनेट अधिकारों, ट्रैक और ईवेंट के प्रायोजनों और बेहद बुर्जुआ पैडडॉक क्लब का विचार बेचकर मिलने वाली सदस्यता की रकम समेत हर तरह का सारा मुनाफा भी एफओएम को मिलेगा. तो फिर गौड़ परिवार के लिए क्या बचा?
नोएडा स्थित यह कंपनी ट्रैक को अपने उस व्यवसाय को बढ़ाने के एक अवसर के रूप में देखती है, जिसमें वह माहिर है-रियल एस्टेट. ग्रुप ने 5,000 एकड़ की एक समेकित टाउनशिप एफ वन सर्किट के इर्दगिर्द बनाई है, जिसमें ऊंचे दाम वाले अपार्टमेंट, वित्तीय, मनोरंजन और वाणज्यिक केंद्र, चिकित्सा सुविधाएं, स्कूल, 1,00,000 सीटों वाला क्रिकेट स्टेडियम, हॉकी का मैदान, प्रशिक्षण अकादमी, गोल्फ कोर्स और अन्य खेल सुविधाएं हैं. जेपी कई ऊंचे अपार्टमेंट, ऑफिस कॉम्पलेक्स और मॉल्स में स्थान बेचेगा. इस टाउनशिप में एक स्टुडियो फ्लैट की कीमत 20 लाख रु. से 2 करोड़ रु. तक हो सकती है.
जाहिर तौर पर जेपी ग्रुप का इरादा लंबे अरसे में इस 5,000 एकड़ के शहर में खेल सुविधाओं से कमाई करना है. कंपनी उत्तर प्रदेश सरकार के साथ 15 साल का यह समझैता पहले ही कर चुकी है, जिससे उसे राज्य में होने वाले सारे टी-20 मैच करवाने की अनुमति मिल गई है.
रेस के दौरान जेपी सबसे ज्यादा मुनाफा लेगा टिकटों की बिक्री से, जिनकी कीमत छह स्तरों पर तय की गई हैं, जो 2,500 रु. से शुरू होकर 40,000 रु. तक है. सर्किट में एक लाख से ज्यादा दर्शक बैठ सकते हैं और इसमें 55 कॉर्पोरेट बॉक्स हैं, जिनमें हरेक की कीमत 30 लाख रु. है.
जेपी स्पोर्ट्स इंटरनेशनल के प्रबंध निदेशक और सीईओ समीर गौड़ कहते हैं, ''भारत विकास कर रहा है और कंपनियों के पास इस तरह के खेल आयोजनों के जरिए खुद को स्थापित करने की और गुंजाइश है, चाहे वह उनकी विज्ञापनकारी गतिविधियां हों, बिक्री हो या आयोजन के बाद के मौके हों.''
इसी तरह टाइटल प्रायोजक एयरटेल को उम्मीद है कि इस खेल के साथ उसका जुड़ाव पैसा वसूल करवा देगा. भारती एयरटेल के भारत व दक्षिण एशिया के सीईओ संजय कपूर के मुताबिक, ''एयरटेल अपने 20 करोड़ से ज्यादा ग्राहकों के साथ, जो खास तौर पर युवा व जोशीली आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं, एफ1 के साथ जुड़कर और इस अंतरराष्ट्रीय खेल को पहली बार भारत में लाकर बेहद खुश है.
अपने विकास के रास्ते पर बढ़ता एयरटेल रफ्तार, परफॉर्मेंस, नपे-तुले जोखिम और उत्तेजना से जुड़ा हुआ है, यह सारे शब्द दिमाग में तब कौंधते हैं, जब आप फॉर्मूला वन रेस के बारे में सोचते हैं.'' लेकिन इन सबसे एयरटेल के पुराने प्रतिद्वंद्वी वोडाफोन को पसीने नहीं छूट रहे हैं. वह 2007 से फॉर्मूला वन से करीब से जुड़ा हुआ है.
वह सालाना 7.50 करोड़ डॉलर खर्च करके मैकलारेन मर्सिडीज टीम के प्रायोजकों में से एक बना था. ब्रांड कम्युनिकेशन की वाइस प्रेसिडेंट अनुराधा अग्रवाल कहती हैं, ''भारत में रेसिंग जोर पकड़ती जा रही है. यह पहल हमें अपने वैश्विक संबंधों का फायदा उठाने और अपने ग्राहकों से बात करने और उन्हें शानदार अनुभव देने की पेशकश करने का एक जबरदस्त मौका पेश करती है.''
लपकने के लिए लालायित
फॉर्मूला वन की तड़क-भड़क उपभोग की उस संस्कृति में निहित है, जिसे वह बढ़ावा देती है. असमान ढंग से उठे हुए रास्तों पर कारों को उड़ते हुए देखने का आनंद शैंपेन पार्टियों के जोरदार दौर, ठाठबाट वाले लाउंज और हाइ फैशन के बिना पूरा नहीं होता. जेपी ग्रुप ने ग्रेटर नोएडा में अपने गोल्फ एंड स्पा रिजॉर्ट में एक लाउंज बनाने के लिए दिल्ली के नाइट क्लब एलएपी के साथ गठजोड़ किया है.
अभिनेता अर्जुन रामपाल और रेस्तरां चलाने वाले ए.डी. सिंह के संयुक्त स्वामित्व वाला एलएपी लाउंज ग्रां प्री के लिए पिट-स्टॉप और पार्टी का एकमात्र अड्डा होगा और वहां लेडी गागा, एडवर्ड माया और टॉम नॉवी जैसी अंतरराष्ट्रीय हस्तियां अपना प्रदर्शन करेंगी. रामपाल कहते हैं, ''यह भारत के लिए बड़ा मौका है. जब हवा में उड़ने वाली अंतरराष्ट्रीय हस्तियां हमारे क्लब में प्रदर्शन करेंगी तब इससे हमें अपने क्लब को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में मदद मिलेगी.''
आधिकारिक मर्चेंडाइज प्रायोजक प्यूमा के अलावा फॉर्मूला वन से छोटी कंपनियों के लिए भी भारी गुंजाइश पैदा होती है. दिल्ली स्थित फैशन डिजाइनर मंदिरा विर्क ने एयरटेल के साथ उनकी ग्रिड गर्ल्स के लिए मर्चेंडाइज और पोशाकें डिजाइन करने का समझैता किया है. वे कहती हैं, ''फैशन की बिरादरी के बाहर के लोगों तक पहुंचने का विचार बेहद संतोषजनक है.''
यह खेल भारतीय कंपनियों के लिए भी अपने आपको पेश करने के रोचक अवसर देता है. शराब के सुल्तान विजय माल्या की युनाइटेड ब्रुअरीज अंतरराष्ट्रीय फॉर्मूला वन के साथ 2007 से करीब से जुड़ी हुई है. इस कंपनी ने स्पाइकर एफ1 के निदेशक माइकल मॉल के साथ मिलकर पूर्व स्पाइकर एफ वन टीम 11 करोड़ 70 लाख डॉलर में खरीद ली थी और अपनी फोर्स इंडिया एफ1 टीम बनाई थी. इस साल में सहारा परिवार ने इस टीम में 42.5 प्रतिशत हिस्सेदारी 10 करोड़ डॉलर में खरीद ली थी.
इस सत्र में वे अपनी टीम सहारा फोर्स इंडिया का प्रचार एनडीटीवी गुड टाइम्स शो फोर्स इंडिया फास्ट ऐंड गॉर्जस 2 के जरिए कर रहे हैं. इस कार्यक्रम के जरिए रफ्तार की शौकीन बालाओं की खोज की जाएगी.
ब्रांडिंग के मौके चौंकाने वाले हैं और मार्केटिंग का तूफानी हमला निश्चित तौर पर इस बात का संकेत है कि इस खेल में अपने प्रायोजकों को ढेर सारे अवसर देने की संभावना है. ऐशो-आराम के अपने सारे तामझाम के साथ फॉर्मूला वन उन भारतीय ब्रांडों के लिए सारा नक्शा बदल देने वाला भी हो सकता है, जो प्रयोगधर्मी और प्रगतिशील नजर आना चाहते हैं.
राष्ट्रमंडल खेलों ने 2010 में भारत के लिए मानक का स्तर ऊंचा कर दिया था और पहला ग्रां प्री भारत को एक योग्य खेल स्थल के तौर पर पेश करने में एक कदम और आगे ले जाने वाला है. अब रेस शुरू होने दीजिए.

