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यीशु के पैरोकार बने 'स्वतंत्र चर्च'

पारंपरिक मिशनरी गतिविधि में दिक्कतों के कारण देश भर में स्वतंत्र चर्च कुकुरमुत्ते की तरह उगते जा रहे हैं, जिन्हें विदेशों से धन मिल रहा है और ये सभी धर्मों के लोगों की आस्था का केंद्र बन रहे हैं.

स्वतंत्र चर्च
स्वतंत्र चर्च
अपडेटेड 4 मई , 2011

अमृतसर (पंजाब) के गुराला गांव में छोटी-सी आबादी वाली सड़क से कुछ हट कर करनैल सिंह गिरजाघर जाने वाले अपने यजमानों के एक झुंड को अपने प्रवचन से उसी तरह मुग्ध किए हुए हैं जिस तरह कोई संगीतकार अपने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर लेता है.

वे जोर से कहते हैं, ''ईश्वर महान है.'' करीब 150 औरतों और पुरुषों का झुंड किसी कठपुतली की तरह उसे दोहराता है. पास में शोर मचाता जेनरेटर, एक मारुति वैन और दीवार पर ईसा मसीह का एक पोस्टर दिख रहा है. करनैल सिंह के गिरजाघर का नाम चर्च ऑफ जीसस लव है, जिसे पारंपरिक चर्च और हिंदुत्ववादी पार्टियां एकदम नापसंद करती हैं.

करनैल सिंह उन हजारों पादरियों में से एक हैं, जो पूरे देश में अवतरित हो गए हैं. वे बाइबिल के उपदेशों को अलग तरह से पेश कर रहे हैं. और धर्मांतरण कराने का उनका तरीका भी अलग है. ईश्वर के इन स्वतंत्र सेवकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जबकि मुख्यधारा के गिरजाघरों को अपनी मिशनरी गतिविधियां चलाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. जबकि हिंदुत्ववादी संगठन भारत में मिशनरी गतिविधियों के लिए 10,000 करोड़ रु. से ज्‍यादा के विदेशी धन की आवक को लेकर चिंता जाहिर कर रहे हैं, वहीं ये स्वतंत्र चर्च इस धन का सबसे ज्‍यादा लाभ उठा रहे हैं.

सिख धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाने वाले करनैल सिंह पिछले 10 साल से ईसाई धर्म का प्रचार कर रहे हैं. वे कहते हैं, ''पिछले एक साल से मेरे चर्च की तरफ आकर्षित होने वाले लोगों की संख्या बढ़ने लगी है.'' 58 वर्षीय करनैल सिंह, जो पहले खेतों में काम करते थे, अपने उपदेशों के साथ संगीत का मिश्रण करते हैं. उनकी बेटियों ने अभी हाल ही में बाइबिल के उपदेश देने का डिप्लोमा कोर्स पूरा किया है. उनकी ओर इशारा करते हुए करनैल सिंह कहते हैं, ''यह मेरी गायक मंडली है. मैं अपना चर्च चलाता हूं. मैं किसी मुख्यधारा के चर्च को रिपोर्ट करना नहीं चाहता. मैं सिर्फ ईश्वर को रिपोर्ट करता हूं.''

उनके चर्च से एक किमी दूर गुराला में ही बिलीवर्स चर्च है, जो पिछले साल दिसंबर में खुला था. यह 'चर्च प्लांटिंग मूवमेंट' (चर्च खड़ा करने के आंदोलन) की नई कड़ियों में से एक है. इस आंदोलन के तहत 10 से 20 श्रद्धालुओं की सदस्यता के साथ एक पादरी के अधीन एक नया चर्च बना दिया जाता है. इन चर्चों को आम तौर पर औपचारिक मिशनरी ढांचों से कोई आर्थिक सहायता नहीं मिलती लेकिन ये उनके नेटवर्क से जुड़े रहते हैं.

बिलीवर्स चर्च की स्थापना टेक्सस स्थित गास्पेल फॉर एशिया (जीएफए) ने की. यह 61 वर्षीय के.पी. योहानन द्वारा स्थापित संगठन है, जो धार्मिक कर्मकांड में विश्वास नहीं रखता और 'चर्च प्लांटिंग मूवमेंट' के अग्रणी संगठनों में से एक है. जीएफ का उद्देश्य ''ईसा मसीह के अनुयायियों को धर्मनिष्ठ बनाना और एशिया में अछूते रह गए लोगों को प्रशिक्षित करके उच्च उद्देश्य पूरा करना, भटके हुओं को राह पर लाने के लिए योग्य कर्मचारी भेजना और बॉडी ऑफ क्राइस्ट के साथ भागीदारी में स्थानीय गिरजाघरों की स्थापना करना है.

बिलीवर्स चर्च चलाने वाले तरसेम लाल कहते हैं, ''जब मैंने 20 बपतिस्मा (चर्च का विधिवत सदस्य बनाने का संस्कार) पूरा किया तो मैंने मुख्यालय को लिखा कि मैं अपना खुद का चर्च बना सकता हूं.'' वे रविवार की प्रार्थनाएं कराते हैं और अपने चर्च से जुड़े लोगों के घर नियमित रूप से जाते हैं. बहुत से नियमित सदस्यों को अपना चर्च शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जिसे वे किसी नई इमारत या सदस्यों के मकान में चलते हैं.

दरअसल, स्वतंत्र गिरजाघरों की संख्या में वृद्धि की एक वजह विदेशों से मिलने वाली आर्थिक सहायता भी है, जो चर्च स्थापना नेटवर्क के जरिए चर्च चलाने वाले तक पहुंचती है. जीएफए भारत में चर्च स्थापना आंदोलन के तहत विभिन्न गिरजाघरों को 596 करोड़ रु. का दान दे चुका है. अमेरिका में ईसाई धर्म का प्रचार करने वाले अग्रणी आंदोलनों में से एक, 'मिशन इंडिया' भारत में चर्च स्थापना कार्यक्रम के लिए अमेरिकी नागरिकों से दान लेता है.

अमेरिका में दान का अनुरोध करने वाली इसकी एक परिचय पुस्तिका में लिखा है- ''भारत में एक अरब से ज्‍यादा लोग दुखी हैं...उन्हें मदद की दरकार है... और वे बड़ी संख्या में ईसा मसीह की ओर आकर्षित हो रहे हैं. राष्ट्रों का यह राष्ट्र अछूते रह गए लाखों लोगों के लिए गुड न्यूज (सहायता देने) लाने का अवसर देता है.''

भारत में ईसाई धर्म के प्रसार की गतिविधियों के विरोध के कारण पुराने मिशनरी ढांचे की जगह अलगअलग धर्मोपदेशकों को आगे बढ़ाने की जरूरत महसूस की गई. अमेरिका में दान का अनुरोध करने वाले 'मिशन इंडिया' की परिचय पुस्तिका में कहा गया हैः ''भारत के ईसाई अपना समुदायों में बाइबिल का प्रचार करने में सक्षम हैं और प्रतिबद्ध हैं. वे भाषा और रीतिरिवाज से परिचित हैं और उन अहम इलाकों में प्रभावीढंग से काम कर सकते हैं जहां एक पश्चिमी मिशनरी कदम भी नहीं रख सकता.''

ज्‍यादातर नए धर्मोपदेशक कोई विशेष औपचारिक प्रशिक्षण के बिना अनुयायियों के बीच से चुने जाते हैं. अमृतसर के पास वांजावाला में प्रकाश मेस्सी, जो नलकूप मैकेनिक से धर्मोपदेशक बने हैं, रविवार को एक श्रद्धालु के घर के कमरे में नियमित तौर पर प्रार्थनाएं कराते हैं. वे 25 लोगों के समूह से कहते हैं, ''शराब पाप है. पाप का क्या फल मिलेगा?'' सब एक साथ उत्तर देते हैं: ''मौत.'' उपदेश एकदम सरल है. ईश्वर से गुजारिशें भी सीधी-सादी हैं. मेस्सी की प्रार्थना हैः ''वर्जिन मेरी के पुत्र, हे ईसा मसीह साइकिल और मोटरसाइकिल से हमारी यात्रा को सुरक्षित बनाना.'' प्रार्थना करने वाले इस झुंड में पूर्व कैथॅलिकों के अलावा वे हिंदू और सिख भी हैं जिन्होंने अपना धर्मांतरण करवा लिया है.

मेस्सी के प्रार्थना कक्ष से सड़क घूम कर गेहूं के खेत के पार जाती है. थोड़ी दूर पर एक और चर्च नजर आता है- सेंट जेम्स कैथॅलिक चर्च. इसे जालंधर के पूर्व बिशप साइफोरियन कीरॉथ ने 1994 में बनवाया था. कीरॉथइलाके में कई कैथॅलिक स्कूल और अस्पताल बनवाने के लिए जाने जाते हैं. लेकिन यह चर्च अब बंद हो चुका है. यहां आने वाले कई श्रद्धालु अब मेस्सी के चर्च में शामिल हो गए हैं और बचे हुए श्रद्धालु रविवार की प्रार्थना के लिए पास के अजनाला कस्बे में जाते हैं.

कैथॅलिक चर्च इससे खुश नहीं हैं. अजनाला में ऑल सेंट्‌स कॉन्वेंट स्कूल की प्रिंसिपल सिस्टर एनी, जो 1984 से पंजाब में काम कर रही हैं, कहती हैं, ''इन धर्मोपदेशकों को धर्मशास्त्र के बारे में प्रशिक्षित नहीं किया गया है. ये आम तौर पर लोगों की भावनाओं से खेलते हैं और कुछ लालच देकर उन्हें अपनी ओर खींचते हैं. वे सांप्रदायिक तनाव पैदा करते हैं. उनके उपदेश के गलत तरीकों के लिए हमें जिम्मेदार होना पड़ता है.''

मेस्सी जवाब देते हैं, ''अगर आप अपने दरवाजे बंद कर लेंगे तो आपका चर्च भी बंद हो जाएगा. हम लोगों के बीच जाते हैं और नियमित रूप से अपने श्रद्धालुओं के घरों का दौरा करते हैं. कैथॅलिक मिशनरियों के पास गरीब और जरूरतमंदों के लिए समय ही नहीं है.'' ज्‍यादातर नए धर्म प्रचारक इलाके के दलितों के बीच काम करतेहैं. वे आस्था पैदा करने वाले तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, जो कि मुख्यधारा के गिरजाघरों में नहीं किया जाता. कांग्रेस और अकाली दल जैसी राजनैतिक पार्टियों ने धर्मपरिवर्तन को विवाद का मुद्दा बनाने से इनकार कर दिया है और विहिप व बजरंग दल ने दोनों पार्टियों पर ईसाई वोट बैंक का खेल खेलने का आरोप लगाया है.

दिल्ली के बाहरी इलाके में महावीर एन्क्लेव में एक और चर्च स्थापना मिशन 'मोड ऑफ डेलीवरेंस' अपने पैर पसार रहा है. रॉड्रिक गिलबर्ट और उनकी पत्नी द्वारा चलाई जा रही मिनिस्ट्री की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया हैः ''2009 में चर्च स्थापना के हमारे लक्ष्य में 2,000 नए चर्च शुरू करना था. लेकिन ईश्वर की कृपा से हम 3,496 नए चर्च बनाने में सफल रहे. इस तरह मिनिस्ट्री के दायरे में कुल मिलाकर 11,564 चर्च और प्रकोष्ठ हो गए हैं. हमने साल के दौरान 20,000 लोगों को धर्म में दीक्षित करने के लिए ईश्वर पर भरोसा किया. लेकिन ईश्वर की असीम कृपा से  हम 33,574 नए लोगों को ईसाई बनाने में सफल रहे.''

ओडीसा में, जहां माओवादी अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं, चर्च भीवामपंथ की ओर झुक रहे हैं. पादरी तिरुपति राव एक कुवी आदिवासी से, जो उनके बैठने के लिए कुर्सी लेकर आया था, कहते हैं, ''तुम नियम तोड़ रहे हो. जब तुम जमीन पर बैठोगे तो मैं भी नीचे बैठूंगा.'' उनका समूह, जो 'एसिस्ट' नाम के स्वयंसेवी संगठन के अधीन बना है, रायगडा जिले में मुक्ति के धर्म का उपदेश देता है और गरीबों तथा दबेकुचलों के बारे में बाइबिल के अंशों का उल्लेख करता है. वे आदिवासियों की झोंपड़ियों के बीच बैठे 50 लोगों के झुंड को उपदेश देते हैं, ''ईश्वर ने सभी इंसानों को बराबर बनाया है. किसी को भी दूसरे इंसान पर जुल्म करने का अधिकार नहीं है. हम सभी को सम्मान के साथ जीने का समान अधिकार है.''

अगस्त, 2008 में कंधमाल में ईसाइयों पर हिंदुओं के हमलों के बाद ओडीसा में बड़ी संख्या में नए, स्वतंत्र चर्च खड़े हो गए हैं. दंगों के बाद माओवादियों ने कहा कि वे अल्पसंख्यकों की जिंदगी और रोजीरोटी की रक्षा करने के लिए तैयार हैं. ओडीसा में हिंसा के कारण बहुत-सी ईसाई मिशनरियां राज्‍य छोड़ने के लिए मजबूर हो गईं. कैथॅलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया के प्रवक्ता बाबू जोसेफ कहते हैं, ''ओडीसा में हिंसा के कारण कई ईसाई मिशनरियों को राज्‍य छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा. ननों और पादरियों के जीवन व सुरक्षा से ज्‍यादा कीमती कुछ भी नहीं है.''

लेकिन मुक्ति के धर्मशास्त्रियों को इन इलाकों में पैर जमाने का मौका मिल गया है. माओवादियों ने आदिवासी जिलों में तंबाकू और मसाले के व्यापार से बिचौलियों को भगा दिया है और 'एसिस्ट' संगठन ने आदिवासियों के बीच स्वयंसेवी संगठन बना दिए हैं ताकि वे अपना उत्पाद खुद बेच सकें.

'एसिस्ट' के साथ जुड़े एक पादरी युनेश मंदाग्नि कहते हैं, ''जिमिदिपेटा और केशिंगापुर में हमारे पास ऐसे तीन संगठन हैं, जहां हम उत्पादों को इकट्ठा करते हैं, भंडारण करते हैं और जब दाम चढ़ जाते हैं तो बेचते हैं. बिक्री से होने वाली आमदनी का इस्तेमाल आदिवासियों के कल्याण के लिए किया जाता है. उन्हें आसान शर्तों पर कर्ज दिया जाता है और आपातकालीन चिकित्सा या विवाह के समय पैसों से उनकी मदद की जाती है.''

ये संगठन कभी भी आदिवासियों का बपतिस्मा नहीं करते बल्कि जमीनी संगठन के तौर परकाम करते हैं जिन्हें मुक्ति के धर्मशास्त्र में ''आधार समुदाय'' कहा जाता है. वे मानते हैं कि चर्च का काम लोगों को सिर्फ ईश्वर के संपर्क में लाना नहीं है, बल्कि अन्याय के खिलाफ लोगों को सामूहिक रूप से तैयार करना भी है. लेकिन कैथॅलिक चर्च ऐसे विचार का विरोध करता रहा है. उसने पोप बेनेडिक्ट के अधीन लातीनी अमेरिका में ऐसे आंदोलनों का विरोध किया और मुक्ति के धर्मशास्त्र को ''ठेठ अपधर्म'' कहा.

दक्षिण भारत में नए चर्चों का नेतृत्व आकर्षक वक्ताओं के हाथों में है. तमिलनाडु में विदेशी आर्थिक मदद के कारण सबसे ज्‍यादा स्वतंत्र गिरजाघर बने हैं. 2002-03 के दौरान करीब 775 करोड़ रु. विदेशी पैसे के रूप में आए, जो 2006-07 में बढ़कर 2,244 करोड़ रु. हो गए. विदेशी मदद पाने वाले शहरों में चेन्नै सबसे ऊपर है, जिसे 2002-03 में 363 करोड़ रु. मिले और 2006-07 में 929 करोड़ रु.. तमिलनाडु में पॉल दिनाकरन और मोहन सी. ला.जारस बड़े धर्मप्रचारक हैं.

माना जाता है कि ला.जारस के उपदेशों के कारण ही अभिनेत्री नगमा ने ईसाई धर्म अपनाया. राज्‍य के थूतुकुडी, कन्याकुमारी और तिरुनेलवेलि, जैसे दक्षिणी जिलों में, जहां सबसे ज्‍यादा धर्म परिवर्तन होता रहता है, उनके उपदेश बहुत लोकप्रिय हैं. आंध्र प्रदेश में भी कई स्वतंत्र चर्च खुल गए हैं. दिवंगत मुख्यमंत्री वाइ.एस.आर. रेड्डी के दामाद अनिल कुमार का चर्च अनिल वर्ल्ड इवांजेलिज्‍म राज्‍य के अलग-अलग हिस्सों में खूब फला-फूला है.

केरल में धर्मांतरणों पर हिंदुत्ववादी संगठन हो-हल्ला मचाते रहे हैं लेकिन हाल में धर्मांतरणों का विरोध करने में पारंपरिक चर्च ही सबसे आगे रहे हैं. इंजील के अनुयायी और करिश्माई गिरजाघर, जो 'बाइबिल के उपदेशों को ही मानते' हैं और बीमारियों के चमत्कारी इलाज के लिए भावनात्मक आयोजन करते हैं या सामूहिक प्रार्थनासभाएं और कुशल पादरियों से भावुक भाषण करवाते हैं, वे दूसरे धर्मों के लोगों से ज्‍यादा पारंपरिक गिरजाघरों के ईसाइयों को आकर्षित करते हैं.

केरल की पेंटेकोस्टल काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआइ) से संबद्ध गिरजाघरों की संख्या 1996 में 700 से बढ़कर अब करीब 3,000 हो गई है, और यह संख्या बढ़ ही रही है. पीसीआइ के मुताबिक, संबद्धता के लिए1,000 से ज्‍यादा आवेदन अभी लंबित पड़े हैं. इन गिरजाघरों के सदस्यों की संख्या 25,000 से बढ़कर 10 लाख हो गई है.

एक कैथॅलिक पादरी फादर जॉन इसाक कहते हैं, ''पारंपरिक गिरजाघरों की दौलत में इजाफा और पदानुक्रम ने उन्हें साधारण श्रद्धालुओं से दूर कर दिया है, जो निजी और भावनात्मक अपील के कारण नए चर्च की ओर आकर्षित हो रहे हैं.'' केरल के कोट्टायम में एक नए चर्च डिवाइन फीस्ट ने अपने गठन के तीन साल के भीतर 8,000 से ज्‍यादा सदस्य बनाए. सदस्यों की लगातार घटती संख्या से राज्‍य के पारंपरिक गिरजाघरों को भारी झटका लगा है, जिनके पास 60 लाख से ज्‍यादा सदस्य हैं.

यह संख्या केरल की आबादी का 19 प्रतिशत है. कैथॅलिक चर्च के बिशपों की सर्वोच्च संस्था द केरल कैथॅलिक बिशप्स काउंसिल (केसीबीसी) ने अपने सदस्यों से जोरदार अपील की है कि वे नए गिरजाघरों और प्रार्थना संगठनों से दूर रहें. केसीबीसी ने एक पत्र में नए संगठनों द्वारा भारतीय परंपराओं पर हमलों, जैसे ईसाई महिलाओं के मंगलसूत्र पहनने पर उन्हें गैर ईसाई करार देने की निंदा की. केसीबीसी ने चेतावनी दी किइस तरह के संदेश सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ेंगे.

भारत में स्वतंत्र गिरजाघरों की गिनती कठिन है. भारत में इवांजेलिकल संगठनों के छत्र संगठन इवांजेलिकल फेलोशिप ऑफ इंडिया (ईएफआइ) के पास करीब 35,000 स्वतंत्र चर्च हैं. ईएफआइ के महासचिव रिचर्ड हॉवेल कहते हैं, ''ये चर्च परिपक्वता के निश्चित स्तर के साथ पंजीकृत हैं और पिछले पांच साल में ऐसे 5,000 चर्च हो गए हैं. लेकिन बहुत से स्वतंत्र चर्च ऐसे हैं जो पंजीकृत नहीं हैं और वे हमारा हिस्सा नहीं हैं.''

इन नए गिरजाघरों का लचीलापन विरोधी हिंदुत्ववादी संगठनों और मुख्यधारा के चर्चों को चुनौती दे रहा है. जमीन से जुड़ाव देश भर में उन्हें काम करने में मदद दे रहा है. केरल, जहां ईसाई धर्म ने बहुत पहले पैर जमाए थे, के विपरीत पंजाब के चर्चों में स्थानीय भाषा और परंपराओं का इस्तेमाल किया जा रहा है.
 
प्रचारकों पादरियों को अपना हिंदू या सिख नाम बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. वे एकदूसरे को 'जय मेस्सी की' बोल कर अभिवादन करते हैं. करनैल सिंह की बेटियां भजन सुनाती हैं तो वे कहते हैं, ''इस भजन को सुनें जोगुरबानी की तरह लगता है.'' फिर वे अपनी पत्नी को ठेठ पंजाबी लहजे में पुकारते हैं, ''पास्टरनी... पास्टरनी...'' आखिर उनकी पत्नी भी तो पादरी हैं.

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