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लॉकडाउन डायरीः लंदन में कोरोना और भारतवंशी

कोरोना का असर देखिए कि ब्रिटेन के प्रिंस, प्रधानमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री तीनों संक्रमित हैं. ऐसे में, ब्रिटेन गृहमंत्री प्रीति पटेल सबसे वरिष्ठ मंत्री है और ऋषि सुनक हैं देश के वित्त मन्त्री यानि कि प्रधानमन्त्री के बाद सबसे शक्तिशाली मंत्रालय के मुखिया. भारतवंशियों के लिये यह गर्व और गौरव का पल है कि जिस देश ने दो सौ साल भारत पर राज किया आज भारतवंशी इस आपात स्थिति में ब्रिटेन को संभाले हुए हैं. लॉकडाउन डायरी की दूसरी किस्त लंदन से लेखक तेजेन्द्र शर्मा की कलम से

फोटोः इंडिया टुडे
फोटोः इंडिया टुडे
अपडेटेड 2 अप्रैल , 2020

तेजेन्द्र शर्मा एम.बी.ई./ लॉकडाउन डायरीः दो

पिछले तीन दिन में तीन डरावनी ख़बरें सुनने और देखने को मिलीं. पहली ख़बर की प्रिंस चार्ल्स भी कोरोनाग्रसित, यानि कि राजघराना भी इस वायरस से अछूता नहीं. फिर समाचार मिला कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बॉरिस जॉन्सन का टेस्ट भी पॉज़िटिव निकला, यानि कि अब बॉरिस भी घर में क़ैद हो कर वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग से ही काम कर पाएंगे. फिर ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री मैट हैन्कॉक ने शुक्रवार को कहा कि जांच में उनके कोरोना वायरस (Corona virus) से संक्रमित होने की पुष्टि हुई है.

यानि कि इस समय ब्रिटेन के सबसे वरिष्ठ मंत्री है प्रीति पटेल जो कि गृह मन्त्री हैं और ऋषि सुनक हैं देश के वित्त मन्त्री यानि कि प्रधानमन्त्री के बाद सबसे शक्तिशाली मंत्रालय के मुखिया. भारतवंशियों के लिये यह गर्व और गौरव का पल है कि जिस देश ने दो सौ साल भारत पर राज किया आज भारतवंशी इस आपात स्थिति में ब्रिटेन को संभाले हुए हैं.

तीन साल पहले के आंकड़ों पर नज़र डालें तो 2017 में 25,281 ऐसे भारतीय मूल के डॉक्टर ब्रिटेन में रजिस्टर्ड थे जिनकी पढ़ाई लिखाई भारत में हुई थी. जो भारतीय ब्रिटेन में पढ़ कर डॉक्टर बने हैं, उनकी गिनती अलग से हैं. यानि कम से कम पैंतीस हज़ार भारतीय मूल के डॉक्टर कोरोना वायरस से लड़ने में ब्रिटेन की सहायता कर रहे हैं. नर्सों की भी एक बड़ी तादाद भारतीय मूल की ही है. यह कहना ग़लत नहीं होगा कि भारतीय मूल के डॉक्टर और नर्सें ही ब्रिटेन की एन.एच.एस. यानि कि नेशनल हेल्थ सर्विस की रीढ़ की हड्डी हैं.

इसी तरह फ़ार्मेसी, अकाउन्ट्स, और लीगल सिस्टम में भारतीयों की उपस्थिति एक बड़ी संख्या में है. यानि कि आप जब बूट्स, लॉयड या किसी निजी केमिस्ट के यहां दवा लेने जाएंगे तो वहां आपको अधिकतर भारतीय मूल के फ़ार्मेसिस्ट ही दिखाई देंगे. इसमें एक बहुत बड़ा हाथ उन गुजराती प्रवासियों का भी है जिन्हें इदी अमीन ने युगान्डा से निकाल बाहर किया था और वे लुट-पिट कर लंदन, लेस्टर और ब्रिटेन के अन्य शहरों में आ बसे थे. उन्होंने यहां कॉर्नर शॉप कल्चर को संभाल लिया था और उनकी अगली पीढ़ी नें मेडिकल, फ़ार्मेसी और लीगल सिस्टम को.

ब्रिटिश रेल भी इससे अछूती नहीं है. एक ज़माना था जब भारत में ट्रेन ड्राइवर केवल एंग्लो-इंडियन ही हुआ करते थे. यदि पुरानी फ़िल्म जूली (1975) आपको याद हो तो उसमें ओम प्रकाश एक ट्रेन ड्राइवर का रोल करते हैं और वे एंग्लो-इंडियन दिखाये गये हैं. नादिरा ने उनकी पत्नी का किरदार निभाया था और जूली बनी थीं लक्ष्मी. ठीक वैसे ही ब्रिटेन में यह माना जाता था कि ट्रेन ड्राइवर बनने के लिये गोरा होना पहली शर्त है. काम ज़िम्मेदारी है और काले या भूरे लोगों को ज़िम्मेदारी का काम नहीं सौंपा जा सकता.

मगर समय का चक्र बदल गया और अब रेलवे में ड्राइविंग के साथ-साथ अन्य विभागों में भी भारतीय और भारतीय उपमहाद्वीप के लोग दिखाई देते हैं. आज जबकि तमाम दफ़्तरों को लॉक-आउट कर दिया गया है लंदन ओवरग्राउण्ड और अंडरग्राउण्ड रेलवे की सेवा जारी है. ध्यान देने लायक बात यह है कि लंदन में डॉक्टर, नर्सें, पुलिस अधिकारी सभी बसों या मेट्रो में ही यात्रा करते हैं. ऐसे में यदि रेलवे और बसों को बन्द कर दिया जाए तो वे अपने गंत्वय तक पहुंच ही नहीं पाएंगे. भारतीय मूल और भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों का बसों और रेलवे के चलाने में एक बहुत बड़ा योगदान है.

मैं स्वयं एक ट्रेन ड्राइवर रह चुका हूं और अभी ओवरग्राउण्ड रेलवे में कार्यरत हूं. मैं अनुभव से कह सकता हूं कि ज़रूरी सेवा करने वाले कर्मचारियों को उनके कार्यस्थल तक पहुंचाने का काम हम पूरी निष्ठा एवं क्षमता से कर रहे हैं.

हाँ भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ ऐसे दुकानदार हैं जो इस संकट की स्थिति का लाभ उठा रहे हैं और ज़रूरी चीज़ों एवं खाद्यसामग्री के औन-पौन दाम लगा रहे हैं. उन्हें सीखना होगा कि यह मानव धर्म के विरुद्ध है. लाशों पर कमाया गया लाभ आसानी से पचता नहीं है.

(तेजेंद्र शर्मा मशहूर लेखक हैं और यह लॉकडाउन डायरी उन्होंने लंदन से हमारे लिए भेजी है. यहां व्यक्त विचार उनके अपने हैं और उससे इंडिया टुडे की सहमति आवश्यक नहीं है)

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