पर्यावरण और खनन को एक-दूसरे का विरोधी माना जाता है. खनन की बड़ी गतिविधि हमेशा ही स्थानीय पर्यावरण को उजाड़ देने वाली मानी जाती है. लगता है बिहार की नीतीश कुमार सरकार इसी पर यकीन करती है. पत्थर की खदानों के लिए पट्टा न देने या उनका नवीनीकरण न करने के सरकारी कदम ने यह साफ कर दिया है कि बेखौफ खनन ऑपरेटरों ने बिहार की भूसंपदा को किस कदर लूटा होगा. फैसला दरअसल 2010 का है पर उसका असर अब धीरे-धीरे महसूस हो रहा है.
पत्थर की खदानों के पट्टे के नवीनीकरण की जब तक अनुमति थी, जिले के वरिष्ठ अधिकारियों ने मौके पर यह जांचने की कभी कोई जरूरत नहीं समझी कि जिस इलाके की खुदाई की गई है, वह वास्तव में पट्टे पर दिए गए इलाके से मेल भी खाता है या नहीं. अकसर नौकरशाही की लापरवाही की वजह से या कभी-कभी मिलीभगत से होता था.
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जनवरी
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खनन ऑपरेटरों को पट्टे पर दिए इलाके से बाहर जाकर भी खुदाई का मौका मिल जाता था. खनन कंपनियों ने अच्छी क्वालिटी के पत्थरों की तलाश में पहाड़ों के तमाम शिखरों को विस्फोटकों वगैरह से ढहा दिया. अब खनन पट्टों की अवधि समाप्त करने के बाद से हालात बदल गए हैं. खनन की अवैध गतिविधियां ज्यादा साफ ढंग से नजर आने लगी हैं.
नतीजाः राज्य भर में लगातार छापेमारी. पर शेखपुरा जिला इस बात की मिसाल है कि नौकरशाही सही दखल दे तो किस तरह चोरी-छिपे चल रहे घोटाले खुलकर सामने लाए जा सकते हैं. इस जिले में 74 स्टोन क्रशिंग प्लांट ध्वस्त हो चुके हैं. जिलाधिकारी वीरेंद्र प्रसाद यादव कहते हैं, ''ये प्लांट उचित लाइसेंस के बिना चल रहे थे. कई मामलों में यह भी पाया गया कि इन लोगों ने खदानों से पत्थर निकाले थे, जबकि उनके पास कोई पट्टा नहीं था.''
बिहार में पत्थर की पट्टे वाली खदानों में से करीब 40 फीसदी शेखपुरा में ही हैं. अवैध खनन के खिलाफ अभियान छेड़ने वाले यादव कहते हैं, ''अब तक हम कानून तोड़ने वाले 250 से ज्यादा लोगों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कर चुके हैं. कइयों को गिरफ्तार किया जा चुका है.''
इस कार्रवाई ने जैसे बर्र का छत्ता छेड़ दिया है. इससे पता चला है कि किस तरह खनन विभाग के मठाधीश बरसों से बिहार में अवैध खनन को फलने-फूलने का मौका देते आ रहे थे. बिहार को स्थिति की गंभीरता का एहसास नवंबर, 2000 में राज्य के विभाजन के बाद हुआ.
खनन विभाग के एक अधिकारी कहते हैं, ''झारखंड के निर्माण के बाद, बिहार में बहुत कम पहाड़ियां बची थीं. राज्य के नेताओं को यह समझने में थोड़ा समय लगा कि अंधाधुंध खनन बिहार में बची पहाड़ियों के इक्का-दुक्का शिखरों को हमेशा के लिए समतल कर चुका है.'' यह भी पता चला कि पट्टे पर दी गई हर एक मीटर जमीन के मामले में बेपरवाह खनन ऑपरेटर जमीन से एक मीटर और पत्थर खोद लेते थे, जिसका खामियाजा सरकार के राजस्व को और पर्यावरण को भुगतना पड़ता था.
पुलिस मुख्यालय के सूत्र बताते हैं कि और बड़े मसले भी इससे जुड़े रहे हैं. माओवाद प्रभावित जिलों में चल रही अवैध स्टोन क्रशिंग इकाइयों की माओवादियों के साथ प्रायः गहरी सांठ-गांठ रहती थी. ऐसे सुराग भी मिले कि माओवादियों को राज्य के नक्सलवाद प्रभावित इलाकों में चल रही स्टोन क्रशिंग इकाइयों के जरिए विस्फोटक सप्लाई किए जा रहे थे.
पत्थर की खदानों के लिए पट्टा न देने या उनका नवीनीकरण न करने के फैसले को बड़ा साहसिक फैसला कहा जा रहा है. यह तब लिया गया जब राज्य अपने बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण कर रहा है और निर्माण का काम भी जोर-शोर से चल रहा है. पर बिहार को ज्यादा चिंता पर्यावरण की है क्योंकि खनन उद्योग ने पहाड़ियों को छलनी कर डाला है.
सरकार को उम्मीद है कि खनन रोकने से राजस्व पर असर नहीं पड़ेगा क्योंकि रेत और ईंट-भट्ठों जैसे अन्य संसाधन बिहार में भरपूर हैं. एक अधिकारी कहते हैं, ''अपने पर्यावरण, पारिस्थितिकी, पौधों और जंतुओं को बचाने के लिए अब बिहार खुदाई और खनन की गतिविधियों पर रोक लगा रहा है.''
खनन विभाग ने एक बड़ी शर्त यह लगा दी है कि पत्थरों की खुदाई के लिए कोई लीज नहीं दी जाएगी. पहले की लीज मान्य होंगी लेकिन उनका नवीनीकरण नहीं होगा. सारी मौजूदा लीज 2014 में समाप्त होने की संभावना है. यानी बिहार जल्द ही खदान मुक्त राज्य हो जाएगा. पक्ष-विपक्ष में लॉबियां तैयार हैं पर यह तय है कि नीतीश सरकार इस पर पुनर्विचार नहीं करने वाली. खनन के पर कतरे जाने से इन गरीब जिलों में काम-धंधे का स्वरूप बदलेगा. वरना ये शहर पत्थरों की खदानों के लिए ही जीते-मरते थे.
जो भी होना था, हो चुका है. अब बिहार के अधिकारियों को भेड़ की खाल लपेटे उन नौकरशाहों को तलाशना चाहिए, जो इतने बरसों तक अवैध खनन को अपने पैसों की खदान बनाते रहे. जिन लोगों ने यह सब होते रहने दिया, वे अभी भी कानून के दायरे से बाहर हैं.

