जब 14 मार्च की शाम महारतपुर का चंदन ठाकुर टहलने के लिए घर से निकला तो उसे यह नहीं पता था कि वह एक लंबे सफर पर निकलने वाला है. चंदन के देर तक घर न लौटने पर उसके पिता उमेशकांत ठाकुर ने अगले ही दिन अपने इकलौते बेटे के अपहरण की शिकायत दर्ज कराई.
उनकी सूचना पर सिंघौल पुलिस ने मतसकपुर के अमित झा को चंदन की पकरौआ शादी करवाने के आरोप में जेल भेज दिया. उमेशकांत को भी यकीन था कि पकरौआ शादी को लोग सवा महीने तक गुमनाम रखते हैं. लेकिन 9 जून को पड़ोस की पूजा कुमारी के बेगूसराय कोर्ट में दिए बयान से चंदन के लौटने का इंतजार खत्म हो गया. पूजा ने बताया कि चंदन की उसी रात हत्या हो गई थी.
पूजा के मुताबिक, ''चंदन उसके कमरे में था, तभी उसका भाई चंदन झा घर आया. जिसने चंदन को उसके साथ देखा. वह गुस्से में मारपीट करने लगा. इस बीच परिवार के दूसरे लोग भी आ गए.'' पूजा ने आगे बताया कि उसने भाई से चंदन को न मारने का आग्रह किया तो उसने छोड़ दिया लेकिन चाचा अमर शंकर झा, संजीव झा और ललन झा उसे बराबर पीटते रहे जिससे उसकी मौत हो गई.
फिर लाश को घर में ही गाड़ दिया गया. लेकिन सप्ताह भर में ही दुर्गंध आने लगी तब शव को दोबारा बासबाड़ी में गाड़ा गया.
पुलिस को इस रहस्य तक पहुंचने में 86 दिन का समय लगा. पुलिस शुरुआत में पकरौआ विवाह के विभिन्न पहलुओं की जांच करती रही. नतीजा सिफर रहने के कारण उसने दूसरी दिशा में जांच शुरू की. सिंघौल की थानाध्यक्ष पूनम सिन्हा ने बताया, ''पूजा घटना के बाद से गायब थी. इस सूचना पर उसके भाई चंदन झा और पिता टुनटुन झा से पूछताछ पर रहस्य सामने आया, जिस आधार पर बासबाड़ी से चंदन के कंकाल को बरामद किया गया.'' इस सिलसिले में लड़की के भाई, पिता और चाचा समेत पांच लोगों को जेल भेजा गया है.
राज्य में 'प्रतिष्ठा' के नाम पर कत्ल करने की यह पहली घटना नहीं है. इससे पूर्व, 21 अप्रैल को अररिया जिले के नरपतगंज थाना के झ्रकाहा गांव के पिंटू यादव को फांसी लगाकर मौत के घाट उतार दिया गया और शव को ट्रैक्टर पर लादकर उसके परिजनों को भेज दिया गया था.
पिंटू गांव के ही बालेश्वर यादव की बेटी डेजी से प्रेम करता था. डेजी भागकर पंजाब चली गई, जहां पिंटू काम करता था. पिता के बुलाने पर पिंटू जब गांव आया तो उसकी हत्या कर दी गई. पिंटू के पिता की शिकायत पर बालेश्वर समेत 13 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है.
पर लड़के ही नहीं, परिवार की इज्जत के नाम पर लड़कियां भी भेंट चढ़ती रही हैं. नवादा के कुटरी गांव की अर्चना की हत्या इसका ताजा उदाहरण है. मुरलाचक के सुमन कुमार ने 3 जून को अर्चना की हत्या का खुलासा पुलिस के समक्ष किया, जिसके आधार पर उसके पिता अशोक सिंह और भाई अश्विनी कुमार के खिलाफ वारिसलीगंज थाने में एफआइआर दर्ज हुई है.
थानाध्यक्ष महेंद्र प्रसाद भी अर्चना की हत्या को ऑनर किलिंग मानते हैं. वे बताते हैं, ''जांच से पता चला कि अर्चना और सुमन एक दूसरे को चाहते थे. लेकिन लड़की वालों को यह मंजूर नहीं था, जिस कारण अर्चना की हत्या कर दी गई.
हालांकि लड़की के परिजन डायरिया से मौत होने की बात कह रहे हैं.'' लेकिन बीए पार्ट-टू के छात्र सुमन ने पुलिस को बताया है कि वारिसलीगंज कॉलेज में इंटर में पढ़ाई के समय से उसे प्रेम था. दोनों शादी करना चाहते थे पर आर्थिक हैसियत कम रहने के कारण लड़की वाले तैयार नहीं थे. 7 मई की रात मोबाइल से बात करने के दौरान अश्विनी ने अर्चना को पकड़ लिया और मारपीट करने लगा. इस घटनाक्रम की ऑडियो रिकॉर्डिंग भी उसके मोबाइल में है.
कैमूर के कुढ़नी थाना के गुड़िया गांव के सेवानिवृत फौजी सुरेंद्र सिंह की बेटी चांदनी की हत्या इसी श्रृंखला का उदाहरण है. चांदनी चाचा के बेटे दीपक से प्रेम विवाह कर उसके घर पहुंच गई. लेकिन चाचा ने उसे रखने से इनकार करते हुए सुरेंद्र सिंह के घर पहुंचा दिया. गुस्साए सुरेंद्र ने चांदनी को पानी में डुबोकर मार डाला. सचाई सामने आने पर सुरेंद्र सिंह ने खुद स्वीकार किया, ''इज्जत बचाने के लिए और कोई रास्ता नहीं बचा था.''
यही नहीं, अंतरजातीय विवाह आज भी गांव समाज के असल जीवन में मान्य नहीं हो पाया है. नवादा ठठेरा गली के रंजीत गोस्वामी की कीटनाशक गोली खिलाकर हत्या कर दी गई. रंजीत की गलती आयशा से अंतरजातीय विवाह रचाना थी. 14 जनवरी को लड़कीवालों ने रंजीत के घर में घुसकर दोनों को जहर खिलाकर मारने का प्रयास किया. इसमें आयशा तो बच गई लेकिन रंजीत की अगले दिन मौत हो गई.
राज्य में ऐसी घटनाएं बानगी भर हैं. 'प्रतिष्ठा' के नाम पर ऑनर किलिंग की घटनाएं दिनोंदिन तेज होती जा रही हैं. जाति-बिरादरी के बाहर या हैसियत में अंतर वालों में होने वाले ह्ढेम विवाहों में इस तरह के मामले बढ़ रहे हैं. अधिकतर मामलों में कानून की धद्गिजयां उड़ती देखी जा सकती हैं.
इस पर अरविंद महिला कॉलेज, पटना के समाजशास्त्र विभाग की अध्यक्ष डॉ. स्निग्धा प्रसाद रूढ़िवादी परंपरा, संकीर्णता और अशिक्षा को ऑनर किलिंग की मूल वजह मानती हैं. वे कहती हैं, ''यह सामाजिक-मानसिक समस्या है. समाज में कुछ लोग दोहरा जीवन जीते हैं. वे अपनों और दूसरों के लिए अलग-अलग आदर्श तय करते हैं.
यही कारण है कि ऐसी घटनाएं बढ़ती जा रही हैं जबकि इतिहास यह है कि समाज का परिवर्तन जाति और धर्म से ऊपर उठने से ही संभव हुआ है.'' शैक्षणिक और सामाजिक विकास पर जोर देते हुए प्रो. स्निग्धा कहती हैं, ''हमें इस सोच से ऊपर उठना होगा कि लोग क्या कहेंगे. अहम पहलुओं की अनदेखी करने पर स्वाभाविक रूप से समाज में विकृतियां जन्म लेंगी.''
बहरहाल, बिहार में शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक बदलाव तो हो रहे हैं लेकिन इस बदलाव के बीच ऑनर किलिंग के बढ़ते मामले काफी गंभीर सवाल पैदा कर देते हैं. साथ ही यह बताते हैं कि अभी और भी लंबा सफर तय करना बाकी है.

