पटना के शास्त्रीनगर स्थित दक्षिण भारतीय भाषा संस्थान में 22 साल से टाइपिस्ट के रूप में काम कर रहे गणेश ठाकुर को पिछले मई माह से वेतन नहीं मिला है. 54 वर्षीय ठाकुर की सेवानिवृति अब चंद साल शेष रह गए हैं, लेकिन अब तक उनके पद का सृजन नहीं किया जा सका है.
सूबे के ज्यादातर विभागों के कर्मियों को छठा वेतनमान मिलता है, लेकिन ठाकुर को चौथे वेतनमान पर संतोष करना पड़ रहा है. पेंशन का भी प्रावधान नहीं कि सेवानिवृति के बाद चैन का जीवन गुजार सकें.
छह माह पहले उनका ब्रेन हैमरेज हो गया था. घर की माली हालत ऐसी नहीं थी कि वे अपना इलाज करा पाते लेकिन उनके दामाद का बड़प्पन कि आज वे जीवित हैं. फिर भी ठाकुर खुशी नहीं महसूस करते हैं. पीड़ा भरे लहजे में वे कहते हैं, ''जिल्लत भरी जिदंगी से अच्छा होता कि मौत हो जाती.'' अपनी पांच संतानों वाले परिवार की परवरिश के लिए ठाकुर अकादमी में ड्यूटी के अलावा सुबह और शाम सैलून में काम कर गुजारा करने की मजबूरी है. लेकिन ठाकुर अकव्ले ऐसे बाबू नही हैं, इस संस्थान में सभी नौ कर्मियों का यही हाल है और वे इसी तरह काम कर रहे हैं. ठाकुर अपनी दशा और विभाग की परेशानियों की वजह से काफी हताश हो गए हैं.
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ठाकुर से भी ज्यादा बुरा हाल 1981 में गठित उनके संस्थान का है, जिसके गठन के वक्त दफ्तर विश्वविद्यालय सेवा आयोग में चलता था. इसकी लाइब्रेरी में दक्षिण भारतीय भाषाओं से संबंधित 111 पुस्तकें थीं जो आगजनी की एक घटना में जल कर राख हो गईं. फिलहाल, किताबों की सूची और हिंदी टु तमिल नामक एक किताब ही लाइब्रेरी की पूंजी है. ताज्जुब कि स्थापना काल से अब तक इस संस्थान में कार्यसमिति का गठन ही नहीं किया गया.
अब तक इस दिशा में सरकार और अधिकारियों ने कोई पहल भी नही की. बीच में एक बार अध्यक्ष की नियुक्ति हुई, लेकिन ज्यादातर प्रभारी निदेशकों के जिम्मे ही अध्यक्ष का भी प्रभार रहा. यही नहीं, सात कर्मचारियों को सचिवालय में प्रतिनियुक्त पर भेज दिया गया, तब से यह संस्थान टाइपिस्ट और आदेशपाल के भरोसे है.
यह बदहाली महज दक्षिण भारतीय भाषा अकादमी तक सीमित नहीं है. बिहार में भाषाई समृद्धता को लेकर बनी अधिकांश अकादमियों की दशा कमोबेश यही है. लिहाजा, न तो भाषाओं का प्रचार-प्रसार हो रहा है और न साहित्य संग्रह और सृजन का काम. 1983 में गठित बांग्ला अकादमी का हाल भी ऐसा ही है.
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इस अकादमी की 14 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं और इसमें 4,000 पुस्तकों की लाइब्रेरी है. यह लाइब्रेरी भी खस्ताहाल है. दो कमरे में संचालित अकादमी में अध्यक्ष और निदेशक समेत 16 पद हैं, जिसमें से 10 पद खाली हैं. हाल में निदेशक बनाए गए, लेकिन कार्यसमिति का गठन नहीं किए जाने से हालात खराब ही रहे.
संस्कृत अकादमी 25 साल पहले 1986 में गठित हुई थी. पहली बार 1989-91 तक आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा और 2002-03 में विधानंद सिंह अध्यक्ष बने थे लेकिन उस समय विकास के लिए पैसे ही नहीं दिए गए. 2010 में डॉ. किशोर नाथ झा अध्यक्ष बनाए गए लेकिन कथित रूप से विभागीय पेचिदगियों से तंग आकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया. 2009-10 में अकादमी के विकास के लिए 20 लाख रु. मिले थे, लेकिन कार्यसमिति का गठन नहीं होने की वजह से राशि का उपयोग नहीं किया जा सका.
अतीत को देखें तो अकादमी को वेतन आदि के लिए 1.70 करोड़ रु. और योजना मद में सिर्फ 32.5 लाख रु. मिले. लेकिन सात किताबों का प्रकाशन और 1,000 पुस्तकों की लाइब्रेरी के सिवा गिनाने लायक कोई उपलब्धि नहीं है.
न कोई सभा-सम्मेलन हुए और न पुरस्कार योजना शुरू हो सकी. इस अकादमी के कर्मचारी हृदय नारायण झा कहते हैं, ''अध्यक्ष और निदेशक जब तक नहीं रहेंगे तब तक अकादमी का काम कर्मचारी कैसे करा सकेंगे. अब तो यहां पदस्थापित आठ में से तीन कर्मचारियों को सचिवालय में प्रतिनियुक्त पर भेज दिया गया है.''
मैथिली अकादमी का हाल भी दूसरी अकादमियों से अलग नहीं है. यह अकादमी 35 साल पहले 11 मार्च, 1976 को गठित हुई. मैथिली आठवीं अनुसूची में शामिल की जा चुकी है, लेकिन 2005 से कार्यसमिति का गठन नहीं हो पाने से मैथिली अकादमी के जरिए संचालित होने वाली पुरस्कार योजना, सभा-सम्मेलनों जैसी गतिविधियां ठप रहीं. लिहाजा, विकास मद के 20 लाख रु. विभाग में वगैर इस्तेमाल के पड़े रहे.
अब मुश्किल यह कि अध्यक्ष बना दिए गए हैं, लेकिन निर्णय लेने के लिए जरूरी सदस्यों की संख्या नहीं है. कमेटी के लिए जरूरी 49 सामान्य परिषद के सदस्यों की जगह 12 और कार्यसमिति के 23 की जगह महज 10 सदस्य हैं. इस अकादमी के अध्यक्ष कमलाकांत झा का कहना है, ''कार्यसमिति के गठन के लिए सरकार को कई बार प्रस्ताव भेजा गया है, लेकिन आवश्यक मंजूरी नहीं होने से कामकाज बाधित है.'' हालांकि मैथिली अकादमी का अतीत गौरवशाली रहा है. मैथिली की 214 पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है, जिसमें से 9 पुस्तकों को भारत सरकार की साहित्य अकादमी से अवार्ड मिल चुका है.
1981 में गठित मगही अकादमी में लंबे समय बाद 2010 में उदय शंकर शर्मा उर्फ कविजी को अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन बिडंबना कि सात माह तक निदेशक का पद खाली रहा. और 2006 से विकास मद के 7 लाख रु. विभाग में पड़े हैं. सितंबर में एचआरडी विभाग के संयुक्त सचिव के.के. राय को निदेशक का प्रभार दिया गया है. अकादमी के सदस्य उदय भारती का कहना है, ''कार्यसमिति की बैठक की गई, जिसमें वर्षों पहले बंद हुई निरंजना पत्रिका के अलावा मगही गद्य-पद संग्रह प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया.''
पूर्णकालिक निदेशक के अभाव में 1978 में गठित भोजपुरी अकादमी का हाल भी अलग नहीं है. अध्यक्ष तो हैं लेकिन प्रभारी निदेशक के चलते योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है. अकादमी के 24 पदों में से एक-चौथाई पद खाली हैं.
दिलचस्प बात यह है कि इन अकादमियों को 9.59 करोड़ रु. आवंटित हुए, जिसमें सबसे ज्यादा वेतन मद में करीब 8.8 करोड रु. दिए गए, जबकि योजना मद से भाषा के प्रचार-प्रसार और विकास के लिए सिर्फ 1.51 करोड़ रु. आवंटित किए गए हैं. हालांकि राज्य मंत्रिपरिषद ने चालू वितीय वर्ष में गैरयोजना मद के तहत भाषाई अकादमियों के वेतन आदि के लिए 1.85 करोड़ रु. की स्वीकृति दी है, लेकिन विकास मद में राशि का आवंटन नहीं किया गया. हिंदी ग्रंथ अकादमी को 80 लाख रु., भोजपुरी को 33 लाख रु., मैथिली को 25 लाख रु., मगही को 22 लाख रु., बांग्ला को 7 लाख रु. और संस्कृत को 18 लाख रु. का अनुदान मिला है.
हालांकि यह अनुदान भी अकादमियों के बजट से कम है. चूंकि कर्मचारियों को चतुर्थ वेतनमान ही दिए जा रहे हैं, अकादमी कर्मियों के वेतन और अन्य मद का 5.70 करोड़ रु. का बकाया है. बांग्ला अकादमी को छह साल तक पैसा नहीं दिया गया. हाइकोर्ट के आदेश के बाद भी मैथिली का 1.5 करोड़ रु. तथा भोजपुरी का 1.62 करोड़ रु. बकाया नहीं दिया है.
पिछले हफ्ते अकादमी कर्मियों ने प्रदेश के मानव संसाधन विकास मंत्री प्रशांत कुमार शाही से मिलकर अपनी परेशानियों से अवगत कराया, जिस पर मंत्री ने उनकी मांगों पर विचार करने का भरोसा दिलाया है. अकादमी के संबंध में शाही का कहना है, ''हम इस पर प्राथमिकता से काम कर रहे हैं. अकादमियों की स्थिति पहले से खराब है और इस पर भी ध्यान दिया जाएगा.''
अकादमियों का कामकाज कार्यसमिति को तय करना होता है. लेकिन बांग्ला को छोड़कर किसी भी अकादमी में निदेशक नहीं है. तीन अकादमियों में निदेशक ही अध्यक्ष के प्रभार में है. पिछले साल तीन अकादमियों में अध्यक्ष बनाए भी गए तो पूर्णकालिक निदेशक नहीं रहने से काम नहीं हो पा रहा है. जहां थोड़े-बहुत काम होने की गुंजाइश है, वहां विकास के लिए राशि ही नहीं. सरकार की भी कोई तत्कालिक योजना नहीं दिख रही है. वैसे में सर से पांव तक रोगग्रस्त अकादमियों की दशा कैसे सुधरेगी, एक यक्ष प्रश्न है.
बिहार में महज औपचारिक रूप में संचालित की जा रहीं भाषाई अकादमियां अपने उद्देश्यों को पूरा करने में नाकाम हो रहीं. इन पर हो रहे खर्च के खास नतीजे नहीं.
ज्यादातर भाषाई अकादमियों में तमाम अव्यवस्थाओं के कारण कोई खास काम नहीं हो रहा. जरूरी संसाधनों के अभाव में इन अकादमियों की उपलब्धियां लगभग नगण्य.
भोजपुरी अकादमीः इस अकादमी में काम कर रहे कर्मचारियों का वेतन-भत्तों के रूप में सरकार पर 1.60 करोड़ रु. बकाया.
संस्कृत अकादमीः कार्यसमिति नहीं होने की वजह से विकास मद के 20 लाख रु. बगैर इस्तेमाल हुए पड़े हैं.
मैथिली अकादमीः 2005 से कार्यसमिति का गठन नहीं होने से पुरस्कार और सभा-सम्मेलन जैसी गतिविधियां ठप.
मगही अकादमीः लंबे समय के बाद अध्यक्ष चुन लेने के बाद करीब सात माह तक निदेशक का पद खाली रहा.
दक्षिण भारतीय भाषा संस्थानः गणेश ठाकुर 22 साल से टाइपिस्ट का काम कर रहे, लेकिन उनके पद का सृजन नहीं हुआ.

