उत्तर प्रदेश की प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) नीता चौधरी बीते 25 अप्रैल की शाम लखनऊ से दिल्ली आने के लिए अमौसी हवाई अड्डे पहुंच चुकी थीं. लेकिन उन्हें उड़ान भरने से पहले ही लखनऊ के मुख्य चिकित्साधिकारी (परिवार कल्याण) डॉक्टर बी.पी. सिंह हत्याकांड की जांच में कुछ महत्वपूर्ण घटनाक्रमों के चलते वापस बुला लिया गया.
तीन हफ्ते की तफ्तीश में कुछ भी हाथ न लगने से खिसियाए जांच अधिकारियों ने आखिरकार 25 अप्रैल की पूरी रात मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय में उन सीलबंद दस्तावेजों को खंगाला जो हत्याकांड के बाद ही सील कर दिए गए थे. और इस जांच का निष्कर्ष अगले दिन कैबिनेट सचिव शशंक शेखर सिंह ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बताया, ''राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के क्रियान्वयन में धांधली और आपसी प्रतिस्पर्धा इस हत्या की जड़ में है.'' उनका कहना था कि धांधली के आरोप में पहले ही गिरफ्तार उपमुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. वाइ. एस. सचान की भूमिका इस प्रकरण में संदेहास्पद है क्योंकि उनके करीब साढ़े तीन महीने केकार्यकाल में 3.49 करोड़ रु. खर्च किए गए.
बी.पी. सिंह बीते 2 अप्रैल की सुबह टहल कर घर लौट रहे थे कि दो नकाबपोश मोटरसाइकिल सवारों में से एक ने उन पर ताबड़तोड़ फायरिंग की और यह पक्का कर ही वहां से भागे कि वे जिंदा नहीं हैं. पुलिस को घटनास्थल से कारतूस के 13 खोखे मिले जिनमें आठ गोलियां बी.पी. सिंह को लगी थीं. पिछले साल 27 अक्तूबर को बी.पी. सिंह के ही पद पर तैनात डॉ. विनोद आर्य की हत्या कमोबेश इसी स्टाइल में हो गई थी जिसका आरोप जेल में बंद सरगना अभय सिंह पर लगा था.
इस तरह छह महीने के भीतर दो वरिष्ठ चिकित्सकों की हत्या से चिकित्सा जगत सन्न रह गया. प्रादेशिक चिकित्सा सेवा (पीएमएस) संघ के अध्यक्ष, डॉ. डी.आर. सिंह कहते हैं, ''पिछले वर्षों में अनेक डॉक्टरों की हत्या हुई हैं और ये सभी चिंता का विषय हैं. आर्य और बी.पी. सिंह जैसे लोगों की हत्या की वजह का पता लगाने और असली हत्यारों तक पहुंचने के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो से जांच जरूरी है.'' बी.पी. सिंह के चचेरे भाई और वकील इंद्र प्रताप सिंह कहते हैं, ''हमभी इस प्रकरण की सीबीआइ से जांच के पक्षधर हैं क्योंकि राज्य पुलिस की जांच पर हमेशा भरोसा नहीं है.''
बहरहाल, लखनऊ पुलिस इस प्रकरण की जांच कर रही है और राज्य पुलिस का विशेष कार्य बल (एसटीएफ) उसकी मदद कर रहा है. वारदात के बाद से अब तक करीब तीन दर्जन लोगों से पूछताछ हो चुकी है जिनमें माफिया, स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी, दवाओं के सप्लायर, ठेकेदार, शूटर, जेल में बंद अपराधी और अपराधी से राजनीतिक शरण में आए लोग शामिल हैं. एसटीएफ की ओर से इस जांच की निगरानी पुलिस अधीक्षक विजय प्रकाश कर रहे हैं. पुलिस और एसटीएफ के हाथ अभी तक बहुत कुछ नहीं लगा है. हालांकि एसटीएफ के एक अधिकारी कहते हैं, ''कुछ सुराग जरूर हाथ लगे हैं, लेकिन जब तक पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हो जाते, किसी पर उंगली नहीं उठाना चाहते.'' लेकिन सूत्रों का कहना है कि उन्हें अब तक जो सुराग मिले हैं उनसे आर्य की हत्या के मामले में भी नए तथ्य सामने आ सकते हैं.
जाहिर है, आर्य की हत्या के वक्त प्रदेश सरकार पर ऐसा दबाव नहीं था, जैसा अभी है और न ही उनकी हत्या देश भर में भ्रष्ट राजनेताओं के खिलाफ चल रहे जनांदोलनों के दरम्यान हुई थी, सो, उस प्रकरण पर ज्यादा हायतौबा नहीं मची. लेकिन बी.पी. सिंह की हत्या ऐसे समय हुई जब अण्णा हजारे के नेतृत्व में देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर रहे थे. इसलिए राज्य सरकार ने फटाफट स्वास्थ्य मंत्री अनंत कुमार मिश्र और परिवार कल्याण मंत्री बाबूसिंह कुशवाहा को बाहर का रास्ता दिखा दिया.
समझा जाता है कि इन दोनों के अहं की टकराहट प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की सेहत को बिगाड़ रही थी.
बहरहाल, ताजा हत्याकांड की सीबीआइ जांच की मांग तेज हो गई है. जहां समाजवादी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने एक स्वर से सीबीआइ जांच की मांग की है, वहीं, हाइकोर्ट में जनहित याचिकाओं का सिलसिला शुरू हो गया है.
इलाहाबाद हाइकोर्ट की लखनऊ पीठ में दायर एक जनहित याचिका में मांग की गई है कि एनआरएचम के क्रियान्वयन में घपलों की जांच सीबीआइ से कराई जाए वहीं एक अन्य जनहित याचिका में बी.पी. सिंह हत्याकांड कीसीबीआइ जांच की मांग की गई है. इन पर सुनवाई अगले महीने होनी है. लेकिन बी.पी. सिंह के भाई और डॉक्टरों की एसोसिएशन ने अब तक अदालत की शरण नहीं ली है. डी.आर. सिंह कहते हैं, ''इस बारे में हम अगले हफ्ते कार्यकारिणी की बैठक में फैसला लेंगे.''
जाहिर है, इन जनहित याचिकाओं पर राज्य सरकार हाइकोर्ट को यह तो दिखाना चाहेगी ही कि उसने अब तक क्या-क्या कार्रवाई की है. सीबीआइ जांच की मांग का विरोध करने के साथ राज्य सरकार को अदालत को आश्वस्त करना होगा कि उसकी जांच सही दिशा में है. इसलिए तफ्तीश में लगे अधिकारी कोई कोरकसर नहीं छोड़ रहे. पर सीबीआइ जांच की आहट जांच अधिकारियों को दोहरे दबाव में डालती है. ऐसी हालत में राज्य पुलिस इसका तभी खुलासा करना चाहेगी जब सीबीआइ जांच पर अदालत का रुख साफ हो जाए. जहां तक डॉक्टरों की बात है, वे अनिर्णय के शिकार लगते हैं. बी.पी. सिंह की हत्या के बाद पीएमएस एसोसिएशन ने पहले हड़ताल की घोषणा की और बाद में उसे वापस ले लिया.
हत्या के चंद दिनों बाद ही लखनऊ में मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. ए.के. शुक्ला समेत पांच लोगों के खिलाफ वित्तीय अनियमितताओं के आरोप में मुकदमा दर्ज कराया गया और जहां उपमुख्य चिकित्साधिकारी सचान और अन्य तीन को गिरफ्तार कर लिया गया और निलंबित कर दिया गया वहीं, निवर्तमान मुख्य चिकित्सा अधिकारी शुक्ल, जिनसे बी.पी. सिंह की डाह विभाग में चर्चा का विषय रहती थी, को न तो निलंबित किया गया और न ही गिरफ्तार.
शुक्ल कहते हैं, ''शासन ने हमसे एक भुगतान के बारे में कुछ जानकारियां मांगी थीं, जो मैंने भेज दी हैं. हमारे काम एक शासनादेश के जरिए बांट दिए गए थे इसलिए हमारा डॉ. सिंह के कामकाज से कोई लेनादेना नहीं था.'' वैसे शुक्ल का तबादला कर दिया गया है और उनकी जगह कानपुर के मुख्य चिकित्साधिकारी रहे डॉ. अशोक मिश्र को आननफानन में बुलाकर लखनऊ का मुख्य चिकित्साधिकारी बना दिया गया है.
जांच अधिकारी संभावित हत्यारों के मकसद को नहीं समझ पा रहे हैं, तो लखनऊ चिकित्सा विभाग में तैनात रहे हर अधिकारी-कर्मचारी की भूमिका की पड़ताल तह तक पहुंचाने में उनकी मदद कर सकती है. पुलिस ने डॉ. सचान के मुख्य चिकित्साधिकारी (परिवार कल्याण) के पद पर रहने की अवधि में 3.49 करोड़ रु. खर्च को देखते हुए उनकी भूमिका संदेहास्पद मानी है, पर वह शायद इस तथ्य की अनदेखी कर रही है कि जनवरी-फरवरी (जिन महीनों में सचान उक्त पद पर थे) में ही हर सरकारी विभाग में सर्वाधिक सरकारी रकम खर्च होती है.
केंद्रीय योजना आयोग और मंत्रालयों से लेकर धरातल पर शासन-प्रशासन चला रहे लोगों को पता है कि वित्त वर्ष की आखिरी छमाही, खास तौर से आखिरी तिमाही में ही सरकारी रकम सर्वाधिक खर्च होती है. इसलिए इस प्रकरण की तह तक पहुंचने से चिकित्सा जगत में व्याप्त कई ऐसी गड़बड़ियों का रहस्योद्घाटन हो सकता है जिन पर शायद अभी तक किसी की नजर ही नहीं गई हो. एसटीएफ के एक अधिकारी कहते हैं, '' हमें पहली बार पता चला कि चिकित्सा जगत में किस कदर भ्रष्टाचार अपने पैर पसार चुका है.'' लेकिन ये सूचनाएं शायद किसी काम में न आ सकें क्योंकि ये अधिकारी जांच हत्या की कर रहे हैं, भ्रष्टाचार की उनकी जांच का दायरा लखनऊ के बाद दूसरे जिलों की ओर शायद ही जाए.
असल में, सरकार ने पिछले साल मई में राज्य के दो ताकतवर मंत्रियों में बढ़ती तनातनी को देखते हुए न केवल स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभागों को अलग कर दिया था बल्कि हर जिले में मुख्य चिकित्साधिकारी के साथ मुख्य चिकित्साधिकारी (परिवार कल्याण) का एक नया पद भी सृजित कर दिया था जिस पर तैनाती के लिए प्रादेशिक चिकित्सा सेवा के अधिकारियों में गलाकाट प्रतिस्पर्धा पैदा हो गई थी.
असल में, पहले स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री प्रायः एक ही होते थे तो कभी इनमें से एक को मुख्यमंत्री अपने पास रखते थे. निवर्तमान स्वास्थ्य मंत्री अनंतकुमार मिश्र और निवर्तमान परिवार कल्याण मंत्री बाबूसिंह कुशवाहा के बीच तनातनी पिछले साल तक इसलिए बढ़ती जा रही थी क्योंकि जिलों में एक ही मुख्य चिकित्साधिकारी दोनों काम देखते थे. इसी तनातनी के चलते पिछले साल 5 मई को एक शासनादेश के जरिए हर जिले में एक मुख्य चिकित्साधिकारी (परिवार कल्याण) की तैनाती करने का फैसला किया गया जो खास तौर पर एनआरएचएम के तहतबनने वाली योजनाओं के क्रियान्वयन को देखे.
पैसे के प्रवाह के चलते यह पद इतने आकर्षण का केंद्र बन गया कि डॉक्टरों में इस पर बैठने की होड़ लग गई. वरिष्ठता आदि की परवाह किए बगैर होने वाली इन नियुक्तियों में इतनी अफरातफरी मची कि डॉक्टर लोग ताश के पत्ते की तरह फेंटे गए और कई जिलों में एक साल के भीतर ही कोई चारचार लोग इस पद पर लाए और हटाए गए. मसलन, लखनऊ में, जहां की गड़बड़ी दोदो हत्याओं के चलते सचाई सामने आ रही है, 11 महीने में ही चार लोग आए.
पहले डॉ. राजेंद्र कुमार, फिर विनोद कार्य, आर्य की हत्या के बाद डॉ. सचान और फरवरी के आखिर में बी.पी. सिंह. बहरहाल, बी.पी. सिंह की हत्या के बाद जब प्रदेश सरकार पर दबाव बनने लगा तो वह हरकत में आई और उसके जिन फैसलों की वजह से पिछले एक साल से चिकित्सा विभाग में सरकारी रकम की बंदरबांट के ज्यादा ही आरोप लग रहे थे, उनमें तब्दीली करने का फैसला कर दिया. आखिरकार अब सरकार ने मुख्य चिकित्साधिकारी (परिवार कल्याण) का पद समाप्त कर दिया है. साथही, नई व्यवस्था के तहत प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) की भी भूमिका सीमित करते हुए एनआरएचएम का क्रियान्वयन मुख्य सचिव की निगरानी में कर दिया गया है. लगता है, यह सब जनहित याचिकाओं पर राज्य सरकार ने कुछ करता हुआ दिखने के लिए किया है.
मुख्य चिकित्साधिकारियों की नियुक्ति की युक्तिसंगत नीति बनाने की मांग को लेकर भी एक याचिका हाइकोर्ट में विचाराधीन है जिसे फर्रुखाबाद में तैनात डॉ. लल्लन प्रसाद सिंह ने दायर की है. प्रदेश में जगहजगह निजी क्लीनिक और अस्पताल खुल चुके हैं तो सरकारी अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर ऐसे गरीब मरीज ही दस्तक देते हैं, जो निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकते. पीएमएस में वैसे तो 1,3791 स्वीकृत पद हैं, लेकिन इस समय कोई 8000 डॉक्टर ही सेवा में हैं. ग्रामीण अंचलों में तैनाती से आनाकानी करना और तैनाती होने पर भी न जाना जैसी शिकायतें डॉक्टरों के खिलाफ साधारण हैं.
बहरहाल, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग ही ऐसे नहीं हैं जहां भ्रष्टाचार की बू आ रही है. एक जमाना था जबसरकारी पैसे से जेबें भरने वाले भ्रष्ट अधिकारी, ठेकेदार, सप्लायर और उन्हें पीछे से संचालित करने वाले माफिया सिंचाई विभाग, राजकीय निर्माण निगम, लोक निर्माण विभाग, ग्रामीण अभियंत्रण सेवा आदि उन विभागों पर काबिज रहते थे जहां निर्माण कार्यों पर भारी रकम खर्च होती थी जो आज भी होती है.
पर एनआरएचएम लागू होने के बाद अधिकारियों के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग और सर्वशिक्षा अभियान और मध्यान्ह भोजन के पैसे की बेहिसाब आमद के चलते प्राथमिक शिक्षा विभाग भी उन्हीं की श्रेणी में आ गए हैं. इसी तरह केंद्र से आने वाली रकम के चलते कृषि, बागवानी, सिंचाई आदि विभाग भी उसी कतार में हैं. जिला बेसिक शिक्षा अधिकारियों (बीएसए) की प्राथमिक शिक्षकों की एसोसिएशन के साथ पैसे के लिए भीतर ही भीतर तकरार चलती रहती है.
वहीं 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं में नकल के अनियंत्रित कारोबार में रिकॉर्ड बना रहे राज्य में जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआइओएस) के पद भी मालदार और इसलिए जोखिम भरे हो गए हैं. दो साल पहले ही जौनपुर में डीआईओएस दिनेश पांडेकी उनके दफ्तर में ही गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. इसी तरह वर्ष 2006 में श्रावस्ती के बीएसए विनोद वर्मा की एक अध्यापक ने गोली मार कर हत्या कर दी थी. यानी सरकारी पदों पर बैठे लोगों की हत्या का फैलाव किसी एक पार्टी की सरकार तक और किसी एक मकसद से नहीं दिखता है.
सरकारी पैसा ऊपर से आ रहा है, पर आखिरी लाभार्थी तक पहुंचने में उसमें बड़े अवरोध हैं. यह शासन तंत्र की पुरानी सचाई है. उत्तर प्रदेश प्रशासनिक सेवा में सर्वोच्च अंक पाकर उपजिलाधिकारी पदों पर तैनात होने वाले अधिकारी इसीलिए उनसे बहुत कम अंक पाकर शिक्षा आदि विभागों में तैनात होने वाले अधिकारियों के मुकाबले बदकिस्मत मानने लगे हैं.
केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी जो पहले स्वास्थ्य मंत्रालय में थे और फिलहाल शिक्षा विभाग से जुड़े हैं, कहते हैं, ''इन विभागों से जुड़ी योजनाओं के तहत जितना पैसा राज्यों में जा रहा है, अगर उसका सही इस्तेमाल हो तो आम आदमी का जीवन सचमुच बदल सकता है.''
जब राजधानी लखनऊ में एनआरएचएम के क्रियान्वयन का यह आलम है, तो फिर दूसरे जिलों की हालत का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने यह जानने के लिए ही पिछले हफ्ते सूचनाधिकार कानून के तहत जानकारी मंगवाई है, उन सूचनाओं से असली खुलासा शायद ही हो.
लेकिन चुनावी वर्ष है तो सरकारी पैसे की बंदरबांट पर राजनीति गरम ही रहनी है. यह तो सभी दलों को देखना होगा कि चिकित्सक बेफिक्र होकर काम कर सकें. वरना नेता सरकारी अधिकारी कर्मचारी माफिया मिलकर राज्य को अराजकता के गर्त में ही ले जाएंगे.
-साथ में ब्यूरो रिपोर्ट

