scorecardresearch
डार्क मोड

नाकाफी सुधार, जस की तस विषमताएं

आर्थिक सुधार लागू होने के बाद से क्षेत्र, आमदनी और वर्ग के आधार पर गैर-बराबरी में इजाफा ही हुआ है. राजनैतिक दलों के लिए आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाना जोखिम का काम है जबकि उसे टालने में कोई जोखिम नहीं है.

अपडेटेड 6 जनवरी , 2012

भारत में आर्थिक सुधारों का करीब दो दशक पुराना इतिहास उतार चढ़ाव भरा रहा है. साल 1991 में दबाव के तहत सुधारों की शुरुआत की गई और तब से लेकर आज तक की कहानी सबके सामने है.

हालांकि, साल 1991 के बाद से हर सरकार ने आर्थिक सुधारों को अंगीकार किया. यह ख्याल या विचार कि राष्ट्रीय स्तर पर सर्वसम्मति ने आर्थिक सुधारों का समर्थन किया, गलत है.

4 जनवरी 2012: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

असलियत यह है कि आर्थिक सुधारों को लेकर तमाम राजनैतिक पार्टियों के भीतर और राजनैतिक हलकों में कोई सहमति नहीं है. वाम दल अड़ियल रवैए के साथ उनका विरोध करते रहे हैं और आम जनता पूरी तरह उदासीन रही. ऐसे में हर सरकार संयत दृष्टिकोण को अपनाती है और कव्वल वही काम करती है जिनको लेकर खासा दबाव होता है और जो अपरिहार्य होती हैं.

28 दिसम्‍बर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

इस बात में संदेह नहीं है कि आर्थिक सुधारों की शुरुआत के बाद से हमने आर्थिक शक्ति बनने तक का सफर तय किया है. मौजूदा समय में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को लेकर आम नजरिया 8-9 फीसदी का है और अगर चीजें इससे कमतर होती हैं तो कहीं-न-कहीं संकट की बात उठने लगती है.

21 दिसम्‍बर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

निश्चित रूप से आर्थिक क्षेत्र में सुधार सफल हुए हैं, लेकिन राजनैतिक क्षेत्र में वे पूरी तरह असफल रहे हैं. इस अवधि के दौरान वित्त मंत्री का पद संभालने वाले राजनेता आम तौर पर लोकप्रिय नहीं रहे हैं.

14 दिसंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

मनमोहन सिंह को साल 1998 में लोकसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा. यह उनके द्वारा लड़ा गया पहला और आखिरी लोकसभा चुनाव है. चिदंबरम भी 1999 के चुनाव में हारे. मुझे साल 2004 में हार का सामना करना पड़ा. जसवंत सिंह ने साल 2004 का चुनाव नहीं लड़ा और प्रणव मुखर्जी जब साल 2009 में लोकसभा के लिए फिर चुने गए तो इससे पहले वे थोड़े समय के लिए ही वित्त मंत्री थे.

07 दिसंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

आर्थिक सुधारों के मोर्चे पर यूपीए1 के प्रदर्शन से सभी लोग वाकिफ हैं. इसके बाद भी, साल 2009 में फिर इसकी सरकार बनी. ऐसे में आर्थिक सुधार आगे बढ़ाने में राजनैतिक जोखिम है, जबकि इनसे पल्ला झाड़ने में कोई जोखिम नहीं है.

सवाल यह है कि आखिर आर्थिक सुधार राजनीतिक पार्टियों और आम आदमी के बीच अलोकप्रिय क्यों है? इनके समर्थक कव्वल अर्थशास्त्रियों, आर्थिक प्रशासकों, उद्योगपतियों, बैंकरों और बिजनेस पत्रकारिकता से जुड़े मीडिया तक ही क्यों सीमित है?

मेरे विचार से इसके कारणों की तलाश ज्‍यादा मुश्किल नहीं है. आर्थिक सुधार निस्संदेह आर्थिक विकास, संपन्नता लेकर आए. इनसे प्रति व्यक्ति आमदनी में इजाफा हुआ और लोगों के जीवन स्तर में सुधार आया. हालांकि, इससे होने वाले फायदों का लोगों और क्षेत्रों के बीच व्यापक रूप से साझा नहीं किया गया. आर्थिक सुधारों ने कव्वल क्षेत्रीय विषमता, आय असमानता, जाति एवं वर्ग असमानताओं को बढ़ाया है. तेजी के साथ मीडिया का दायरा बढ़ने से चीजें और कटु हो गई हैं.

ग्रामीण इलाकों में हम जो अशांति देखते हैं, वह आम तौर पर हिंसक आंदोलनों में तब्दील हो जाती है, उसे हम सीधे तौर पर समाज के एक बड़े वर्ग को होने वाले नुकसान और अभाव का कारण मान सकते हैं.

हमारी योजनागत प्रक्रिया की एक बड़ी खामी यह है इसमें गांव नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर खासा जोर दिया गया है, जिसे अब तक नहीं सुधारा गया है. समाजवाद के दौर में गांव उपेक्षित रहे.

यहां तक कि उदारीकरण के दौर में भी इन पर ध्यान नहीं दिया गया. इन दोनों ही स्थितियों में इकलौता अंतर यह है कि जब भारत हिंदू ग्रोथ रेट (सुस्त विकास दर) के हिसाब से आगे बढ़ रहा था, तो इसे बर्दाश्त किया गया. लेकिन अब भारत की विकास दर सालाना 9 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई तो यह अस्वीकार्य बन गया है.

झारखंड के हजारीबाग जिले में एक आदिवासी गांव है, जिसका नाम दोनो रेशाम है. यह मेरे निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा है और यह हजारीबाग और रांची को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 33 से करीब 15 किमी की दूरी पर है. यह गांव घने जंगल में है, सड़कों से सीधे जुड़ा नहीं है और यह वामपंथी उग्रवादी आंदोलन का इलाका रहा है.

30 नवंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

कभी किसी ने इस गांव का दौरा नहीं किया. पिछले साल जब मैं इस गांव में गया तो गांववालों ने मेरा भव्य स्वागत किया. उन्होंने मुझसे कहा कि मैं पहला ऐसा निर्वाचित प्रतिनिधि हूं, जो इस गांव में आया हूं. यह मेरे लिए भी शर्म की बात थी.

दोनो रेशाम का यह दौरा आंख खोलने वाला था. इस गांव का न तो सड़कों से जुड़ाव है, यहां पानी, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी कोई भी सुविधाएं नहीं हैं. मुझे बताया गया कि इस गांव में प्रगति का इकलौता निशान एक छोटी नदी पर कुछ साल पहले मेरी कोशिशों से बनवाया गया पुल और सर्वशिक्षा अभियान के तहत चलने वाला प्राथमिक स्कूल है.

तब से लेकर आज तक मैंने कई बार इस गांव का दौरा किया है और इसके विकास पर खासा ध्यान दिया है. दोनो रेशाम में विकास की स्थिति व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए शर्म की बात है. साथ ही यह भारत में 1952 में शुरू हुई योजना और विकास प्रक्रिया के लिए शर्मनाक स्थिति है.

विकास को लेकर पिछड़ेपन के मामले में दोनो रेशाम इकलौता गांव नहीं है. झारखंड और दूसरे पिछड़े क्षेत्रों में ऐसे तमाम गांव हैं. भला ऐसी स्थिति में ये गांव वामपंथी उग्रवाद की राह में आगे बढ़ने से कैसे बच सकते हैं?

दोनो रेशाम के अपने अनुभव को देखते हुए मैंने योजना आयोग के सदस्य सचिवों के साथ बैठक में सुझाव दिया कि तत्काल आधार पर देश के सभी गांवों में इस बात की जांच के लिए सर्वे किया जाना चाहिए कि वहां सड़क, बिजली, पीने का पानी, सिंचाई, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा, कृ षि विस्तार, आवास, स्वच्छता, कुटीर उद्योग और रोजगार के मौकों की क्या स्थिति है.

इस तरह के किसी भी सर्वे से हमें अपने सभी गांवों तक बुनियादी सुविधाओं को पहुंचाने में आने वाली चुनौतियों की झलक मिल जाएगी. साथ ही जमीनी स्तर पर हमें भविष्य की कार्ययोजना तैयार करने में भी मदद मिलेगी. सतही या ऊपरी स्तर की प्लानिंग ने हमें नाकाम किया है.

मुझे एक दैनिक समाचार पत्र के शीर्षक याद आते हैं, जब अमुक समाचार पत्र ने पेंशन फंड, रिटेल कारोबार और घरेलू विमानन कंपनियों में सरकार द्वारा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को हरी झंडी दिए जाने का स्वागत किया था. इन्हें रोमांच के साथ दूसरी पीढ़ी या चरण के आर्थिक सुधारों के रूप में पेश किया गया. समस्या की असल जड़ यहीं है.

सुधारों के तरफदारों ने सुधारों का एजेंडा इतना संकु चित बनाया है कि इसमें आम आदमी का महत्व या तो बिल्कुल नहीं है या बहुत सीमित है. सुधार उस समय तक संभ्रातवादी बने रहेंगे, जब तक कि ये सूदूरवर्ती गांवों और आम आदमी को अपने दायरे में शामिल नहीं करते हैं या उनकी सुध नहीं लेते हैं. हममें से कुछ लोगों के लिए सुधार, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का पर्याय बन गया है.

आम आदमी मदद नहीं मांग रहा है. उसे जो सेवाएं दी जाती हैं, वह उनका भुगतान करने को तैयार है, लेकिन सेवाओं को तर्कसंगत, सक्षम और आश्वस्त होना चाहिए.

कोई भी व्यक्ति यह उम्मीद नहीं कर सकता कि बिजली मिले बिना ही, गांव में रहने वाला परिवार उसके लिए एक तय शुल्क दे. अगर गांवों की नहरों में पानी नहीं है, तो वह सिंचाई की खातिर भुगतान नहीं करेगा. उसे आत्मसम्मान मिलना चाहिए, क्योंकि वह इसका हकदार है. भविष्य में चुनौती एक नया भारत बनाने की है, जिसमें सभी लोगों के लिए बुनियादी सुविधाएं हों, जो इन लोगों के लिए अभी तक एक सपना बना हुआ है.

ADVERTISEMENT
Advertisement