सरकार में गोपनीयता खतरनाक भी होती है और जरूरी भी. यह फर्क उसके मकसद में निहित हैः यह दुष्कृत्यों पर परदा डालने के लिए इस्तेमाल की जाए तो अपराध है और राष्ट्रीय हित की रक्षा में काम आए तो तारीफ के काबिल है.
बदकिस्मती से यह सब सत्ता में बैठे नेता ही कर सकते हैं. और काम में पारदर्शिता आए, इसे लेकर उनमें कोई उत्साह नहीं होता है. अपने स्वार्थ को किसी राष्ट्रीय कर्तव्य से नत्थी दिखा-बता देने में वे माहिर होते हैं. घुटे-शातिर लोगों के लिए राष्ट्रभक्ति आखिरी औजार यानी ब्रह्मास्त्र का काम करती रही है. पर इन दिनों इसे पहली वरीयता हासिल हो गई है.
26 सितंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे का अंक
सूचना के अधिकार (आरटीआइ) पर बहस अब इसी के जंजाल में जा उलझी है. सरकारों का तर्क है कि कुछ खास परिस्थितियों में सच को छिपाना, यहां तक कि झूठ बोलना उनका फर्ज है. हम समझ सकते हैं. हम यह भी समझ्ते हैं कि इस विशेषाधिकार का दुरुपयोग कैसे होता है. मिसाल के तौर पर जंग के दिनों में हर मुल्क झूठ बोलने के अधिकारों की सीमा को काफी लचीला बना लेता है. लेकिन राष्ट्रभक्ति के जोशोखरोश में भी हम किसी योद्धा के पलायन को माफ कर देते हैं लेकिन युद्ध के बारे में अफवाह फैलाने वाले की गलतियों के लिए सजा देते हैं. इराक के युद्ध में घसीट लाने के लिए अपने-अपने मुल्कों से झूठ बोलने वाले जॉर्ज बुश और टॉनी ब्लेयर ने जो जख्म पाए हैं, वे उनके जीते-जी तो नहीं पूरने वाले.
डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार किसी और से नहीं बल्कि अपने से ही युद्ध लड़ रही है. लेकिन एक बदमिजाज किस्म का सिविल युद्ध सेंसरशिप को बढ़ावा देता प्रतीत होता है. इसने आरटीआइ पर जान-बूझ्कर एक खुली बहस शुरू की है. हालांकि तमाम युक्तियों के जरिए उसका मकसद ऐसे संशोधन लाना है, जिनके जरिए दस्तावेजों तक पहुंच उतनी आसान न रह जाए. निजी तौर पर यह प्रशासन मान चुका है कि आरटीआइ कुश्ती की एक लाइसेंसी जंग में तब्दील हो चुकी है. क्यों? तो फिर इसके लिए सही सवाल होगा 'अभी क्यों?'
आरटीआइ डॉ. सिंह की उपज नहीं है लेकिन वे इस कानून के अभिभावक होने का दावा कर सकते हैं. 2009 के आम चुनावों के प्रचार अभियान में उन्होंने इसे अपनी अहम उपलब्धियों में गिनाया और कुछ अतिरिक्त वोट पाने में उन्हें मदद मिली. डॉ. सिंह को पहले कार्यकाल में आरटीआइ से कोई दिक्कत न थी. दूसरे कार्यकाल के दो साल के भीतर ही वह आखिर कैसे उनके लिए समस्या बन गई? आरटीआइ की कार्यप्रणाली कोई अतिरिक्त उदार तो हुई नहीं है.
हालांकि इसके कार्यकर्ता चतुर और होशियार होते गए हैं. यूपीए 1 में आरटीआइ को लेकर गर्वोन्माद और यूपीए 2 में उसके प्रति घबराहट का फर्क साफ है. 2009 से पहले डॉ. सिंह को लगता था कि उनके पास छिपाने को कुछ भी नहीं. उनके मंत्रियों के दुष्कृत्यों के मानो औद्योगिक स्तर पर हुए खुलासों ने उनका वह आत्मविश्वास हवा कर दिया. खुद के ही खाए जख्मों से विश्वसनीयता तार-तार हो गई और सबसे ज्यादा चोट आरटीआइ ने पहुंचाई.
भ्रष्टाचार इन घावों की जड़ में था, जिसने उन्हें नासूर बना दिया. राष्ट्रमंडल खेल और 2जी स्पेक्ट्रम भ्रष्टाचार के देशव्यापी प्रतीक बन गए. दोनों मामलों में आइटीआइ से मिली फाइलों ने न सिर्फ भंडाफोड़ किया बल्कि उन पर परदा डाले जाने की कोई संभावना ही न छोड़ी.
सरकारें जब रिकॉर्ड दुरुस्त करने की बात करती हैं तो वहां एक सवाल खड़ा होना चाहिएः रिकॉर्ड गड़बड़ किसने किया था? आरटीआइ से पहले तथ्यों के तोड़मरोड़ के लिए मीडिया पर दोष मढ़ना आसान था. जब मूल फाइलों की कॉपियां हाथ में आने लगीं तो खिलाफ आवाज उठाने वालों के स्वर मंत्रियों के आधे-अधूरे स्पष्टीकरणों से ज्यादा प्रामाणिक लगने लगे. हमारी संसदीय प्रणाली में झूठ को लेकर बड़ी बारीक दृष्टि से काम लिया जाता हैः सदन में झूठ बोलते पकड़े गए किसी मंत्री से इस्तीफे की उम्मीद की जाती है पर सच से कन्नी काट सकने वाले मंत्रियों को चालाक और सक्षम मान लिया गया. आरटीआइ ने मंत्रियों के लिए ऐसे किसी बचाव की गुंजाइश नहीं छोड़ी.
डॉ. सिंह की सरकार में 'सेकेंडटर्माइटिस' रोग के सारे लक्षण नजर आ रहे हैं: एक फालतू का रोग जो जानलेवा हो सकता है. ज्यादातर सरकारें चुनाव के बाद फलती-फूलती हैं; दोबारा चुना जाना कहीं ज्यादा कड़ी चुनौती होती है. यहां तक कि महान नेता जवाहरलाल नेहरू भी 1957 में फिर से चुने जाने के बाद लड़खड़ाने लगे थे. शांति के जिस धरातल पर खड़े होकर उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व का निर्माण किया था वह चीन के मोर्चे पर 1959 तक टूटना शुरू हो चुका था और 1962 की जंग में तो पूरा ध्वस्त हो गया.
श्रीमती इंदिरा गांधी का मामला पहली नजर में अपवाद लगता है. 1971 में उनके दूसरे कार्यकाल की शुरुआत तक कुछ भी गड़बड़ नहीं हुई. लेकिन 1973 आते-आते कुछ भी ठीक नहीं रह गया. 1980 से 1984 के बीच में उनका तीसरा कार्यकाल गलतियों और हिंसा के गुबार में घुमड़ता रहा और इसकी समाप्ति उनकी शहादत के साथ ही हुई.
दोबारा चुनी जाने वाली सरकारें ऊंची जन अपेक्षाओं और आत्मसंतोषी रवैए के बीच लड़खड़ा जाती हैं. वे इस भ्रम में भरोसा करने लगती हैं कि विपक्ष खत्म हो गया. लोकतंत्र में मरता कुछ भी नहीं.
लोकतंत्र में सार्वजनिक जीवन के कई मायने होते हैं; इसका अर्थ सार्वजनिक मामलों का प्रबंधन ही नहीं बल्कि इस प्रक्रिया में जन प्रबंधन भी है. गोपनीयता की छतरी तो रक्षा जैसे कुछ विषयों पर ही काम आती है. शासन के दूसरे विषयों में तो यह सिर्फ बहाना है, समाधान नहीं और बहाने सामयिक विनिमय दर पर बहुत ज्यादा वक्त नहीं खरीद पाते. डॉ. सिंह के पास अब ऐसी कोई सरकार नहीं है, जिसे आरटीआइ को तोड़ने-मरोड़ने से कोई फायदा हो लेकिन उनके पास खोने के लिए एक अदद प्रतिष्ठा अब भी है.

