केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद को कांग्रेस ने अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी का चुनाव घोषणा पत्र तैयार करने का जिम्मा दिया है. 4 कुशक रोड स्थित अपने आवास पर सीनियर एडीटर श्यामलाल यादव से बातचीत में उन्होंने उम्मीद जताई कि कांग्रेस की स्थिति आगामी चुनाव में कहीं बेहतर होगी. बातचीत के अंशः
कांग्रेस 22 साल से प्रदेश में सरकार से बाहर है. ऐसी स्थिति में चुनाव लड़ने में क्या चुनौतियां और क्या अवसर हैं?
इसके बहुत नुक्सान भी हैं और फायदे भी. लेकिन सकारात्मक बात यह है कि इस दौरान वहां जो कुछ हुआ है उसका दोष हमें नहीं दिया जा सकता. इसीलिए विकल्प हम दिखते हैं. एक बात और भी है कि हम राज्य में भले ही न रहे हों, केंद्र में आते रहे हैं. हमारा काम देश की कामयाबी की मंजिल बना है. लोकसभा चुनाव नतीजों से भी यही साबित होता है.
तो आपको यकीन है कि विधानसभा में भी यही होगा?
यही उस ताले की हमारी चाबी है जो पिछले 22 साल से नहीं खुला है. लेकिन हमें यह चाबी ताले में लगानी भी आनी चाहिए.
लेकिन राज्य में सामाजिक समीकरण भी आपके पक्ष में नहीं दिखता.
लोकसभा चुनाव में भी यही माना गया था. पिछले तीन-चार चुनाव जातीय समीकरण की व्यवस्था के आधार पर ही हुए थे. कांग्रेस उस समय न तो समीकरण बना पाई और न ही वैकल्पिक व्यवस्था का विश्वास दिला सकी. पर आज बड़ा बदलाव है. इस समय वैकल्पिक व्यवस्था का एक प्रतीक बने हैं राहुल गांधी जी.
तो आप मानते हैं कि बसपा के सामने आपकी ही पार्टी होगी?
हमें होना चाहिए. हम मानें या न मानें, जनता को मानना चाहिए. हमारी यह चुनौती है, लक्ष्य है और इसी के लिए हम काम कर रहे हैं.
बसपा, सपा के आने पर मुख्यमंत्री कौन होगा, यह साफ है. पर भाजपा की तरह कांग्रेस भी भावी मुख्यमंत्री नहीं बता रही?
हम किसी को प्रोजेक्ट नहीं करते. पार्टी ने अपने अनुभव के आधार पर यह फैसला किया है. उसे मैं नहीं बदल सकता.
राहुल गांधी सक्रिय दिखते हैं, लेकिन उनकी जैसी सक्रियता प्रदेश नेतृत्व नहीं दिखा रहा. क्या तैयारी है आपकी?
राहुल जी बार-बार कहते हैं कि संघर्ष का रास्ता अपनाना होगा. राहुल जी का जो दृष्टिकोण है, उसे हम कैसे क्रियान्वित करें, यह हमारे लिए परीक्षा की घड़ी है.
22 वर्षों में प्रदेश में मोटे तौर पर मायावती या मुलायमसिंह यादव की ही सरकारें रही हैं. पर न दलित सुखी हैं, न पिछड़े वर्ग के लोग. गड़बड़ कहां है?
ये लोग बहुत बड़े नेता हैं. छोटा मुंह, बड़ी बात होगी अगर मैं कहूं कि क्या गलत हुआ. ऐसा नहीं कि वे नहीं समझ्ते. चुनाव लड़ने की रणनीति और राज करने की रणनीति में फर्क होता है. ये लोग इसमें कमजोर रहे हैं. चुनाव की रणनीति इन्हें समझैतावादी बना देती है. अच्छा राज करना इनके लिए संभव नहीं रह जाता.
उत्तर प्रदेश के चारों तरफ मध्य प्रदेश से लेकर बिहार और दिल्ली तक में सुशासन चुनावी मुद्दा है, यहां सब कुछ जातीय समीकरण है. क्या मुद्दे होंगे आपके?
सुशासन बहुत प्रमुख मुद्दा है. हम इसे सरल भाषा में मतदाताओं को समझाएंगे. सुशासन में हर चीज आती है, भागीदारी, न्याय की बात आती है, पारदर्शिता भी आती है, अर्थव्यस्था की बात भी आती है, एनआरएचएम के पैसे के इस्तेमाल का मामला भी आता है. यह सब गवर्नेंस से जुड़ा है. पुलिस-प्रशासन भी इसका पहलू है.
सपा और लोकदल आपसे मिलकर लड़ें तो बसपा को हटाना आसान नहीं होगा?
मैं कुछ नहीं कह सकता. पिछले चुनाव में राहुल जी ने बहुत कोशिश की थी. उन दलों को हमारे बारे में कुछ अनुभव हैं, कुछ हमें उनके बारे में हैं. उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. उनके आधार पर ही विचार हो सकता है.

