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डार्क मोड

कान में पहुंचे भारत के गैंग

मैं इस नए सिनेमा से इतना प्रभावित क्यों हूं? मेरे ख्याल से इसमें हास्य का दिलचस्प तरीके से इस्तेमाल किया गया है जो यहां उल्लेखनीय तरीके से उभरा है. इसके केंद्र में मूर्ख गैंगस्टरों की कहानी है जो अंधाधुंध लोगों को तो मार सकते हैं पर किसी लड़की का हाथ नहीं पकड़ सकते.

अपडेटेड 23 मई , 2012

आज से दो साल पहले मैंने स्विट्जरलैंड के फ्राइबर्ग में समकालीन भारतीय सिनेमा का सिंहावलोकन आयोजित किया था. उस दौरान मैंने मुंबई का प्रतिनिधित्व करने वाली फिल्मों को देखने का फैसला किया. लिहाजा, मैंने राम गोपाल वर्मा की फिल्म सरकार, शिमित अमीन की अब तक छप्पन, श्रीराम राघवन की एक हसीना थी तथा जॉनी गद्दार और अनुराग कश्यप की ब्लैक फ्राइडे  देखी.

नए भारतीय सिनेमा में मेरी दिलचस्पी थी. इसमें भारतीय समाज में बदलाव की बात की गई थी और यह जासूसी कहानियों को कहने की एक नई विधा की तलाश कर रहा था. मैं अचानक ही मुंबई के नए निर्देशकों के सिनेमा से परिचित हो गया. फिर मैं 2011 में कान फिल्म फेस्टिवल में डायरेक्टर्स फोर्टनाइट का आर्टिस्टिक डायरेक्टर बन गया.

इस साल फरवरी में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में संयोग से मेरी मुलाकात अनुराग से हुई. उन्होंने मुझसे कहा कि उनकी नई फिल्म तैयार हो गई है जिसकी वे डीवीडी ले आए हैं. मैंने उसे देखने की इच्छा जाहिर की.

अनुराग की नई फिल्म में साउंड मिक्स नहीं किया गया था, कुछ तस्वीरें भी पूरी तरह परिष्कृत नहीं थीं. लेकिन मुझे यह फिल्म जंच गई. यह गैंगस्टरों की गाथा थी लेकिन हकीकत में यह पिछले 60 वर्ष से चली आ रही प्रेम और मौत की कहानी थी. यह क्लासिकल थी जो 1940 के दशक के हॉलीवुड के दिग्गजों की परंपरा में बनी थी.

यह सिनेमा कई चीजों की ओर संकेत करता है, लेकिन उन्हें दर्शकों को खुलकर नहीं बताया गया. मैंने इसके बदलते हुए लहजे को भी आश्चर्यजनक पाया. यह एक क्षण के लिए क्रूर लगती थी तो दूसरे क्षण के लिए कॉमिक. इसके अलावा, यह दो हिस्सों में थी.

पहला हिस्सा देखने के बाद दूसरे हिस्से के लिए मुझे तीन घंटे इंतजार करना था. मैं आपसे सच कहता हूं कि इंतजार की घड़ी खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा थी. यह फिल्म 20 मिनट के इंटरवल के साथ कुल मिलाकर 5 घंटे 20 मिनट की थी. हम कान में दर्शकों को फिल्म में चित्रित तीन परिवारों की तीन पीढ़ियों का वंश वृक्ष मुहैया करा रहे हैं.

मैं इस बदले हुए माहौल को महसूस कर सकता हूं. इस बार कान के लिए भारत से किए गए हमारे अन्य दो चयन से भी यह स्पष्ट है. इनमें से एक पेडलर्स है जिसका निर्देशन वासन बाला ने किया है. इस फिल्म को मैं देख चुका हूं और यह क्रिटिक्स वीक में दिखाई जा रही है.

दूसरी फिल्म है असीम अहलूवालिया की मिस लवली, जिसे अन सर्टेन रिगार्ड सेक्शन में रखा गया है. इसे मैंने नहीं देखा है लेकिन इसके बारे में बहुत कुछ सुना है. मैं गैंग्स ऑफ वासेपुर में बॉलीवुड के बारे में थोड़ा-बहुत अंदाजा लगा सकता हूं.

इसमें अनुराग ने कहानी कहने के अपने परंपरागत तरीके को एक अलग अंदाज दिया है. मैं आपको एक भोजपुरी रैप गाने की मिसाल दूंगा जो कैरिबियाई द्वीप समूह से चलकर फिल्म तक पहुंचा है. गाना कुछ इस तरह हैः हम हैं शिकारी पाकेट में लंबी गन, धांय से छूटे तो मन होवे मगन.

मैं इस नए सिनेमा से इतना प्रभावित क्यों हूं? मेरे ख्याल से इसमें हास्य का दिलचस्प तरीके से इस्तेमाल किया गया है. याद रखिए, इसे परदे पर उतारना सबसे मुश्किल काम है.

लेकिन यहां यह उल्लेखनीय तरीके से उभरा क्योंकि इसके केंद्र में गैंगस्टरों की भी कहानी है जो अंधाधुंध लोगों को मार तो सकते हैं पर किसी लड़की का हाथ नहीं पकड़ सकते. मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि कान में दर्शकों को यह फिल्म बहुत पसंद आएगी. हम गैंग्स ऑफ वासेपुर के प्रीमियर के एक दिन बाद 23 मई को नए भारतीय सिनेमा पर चर्चा का भी आयोजन कर रहे हैं जिसमें इस विषय के जानकार लोगों को बुलाया जाएगा.

मैं रामगोपाल वर्मा से नहीं मिला हूं लेकिन अनुराग से दो बार मिल चुका हूं, पहली बार बर्लिन में और फिर पेरिस में. वे भारतीय सिनेमा में उभरती हुई नई आवाजों के लिए अहम हैं. नए सिनेमा को खोजने के कगार पर पहुंचना महान अनुभव है. इसके बारे में लोगों को पहले-पहल समझना मुश्किल है, लेकिन जब वे धीरे-धीरे समझने लगते हैं तो यह यात्रा सफल दिखती है.

मुझे याद है कि जब हमने इन भारतीय फिल्मों को फ्राइबर्ग में दिखाया था तो एक प्रतिष्ठित स्विस पित्रका ला'हेब्दो के एक पत्रकार ने कोपोला मसाला शीर्षक से स्टोरी लिखी थी. सचमुच, रामगोपाल वर्मा की सरकार देखकर मैंने भी वैसा ही महसूस किया.

पिछली बार मैं इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के लिए भारत आया था. यह चार साल पहले की बात है. तब मैंने ऊर्जा तो महसूस की, लेकिन पर्याप्त सिनेमा नहीं देख पाया. अब मैं खुश हूं कि मैंने पर्याप्त सिनेमा देखा और उसे दुनिया को दिखाने के लिए तैयार हूं.

(एडुवर्ड वेनट्रॉप कान फिल्म फव्स्टिवल में डायरेक्टर्स फोर्टनाइट के आर्टिस्टिक डायरेक्टर हैं. इस साल कान फिल्म फेस्टिवल में भारत से चार फिल्में गई हैं: गैंग्स ऑफ वासेपुर 1 और 2, वासन बाला की पेडलर्स और असीम अहलूवालिया की मिस लवली. उन्होंने कावेरी बामजई से बातचीत की.)

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