भारतीय सेना के साथ लड़ते हुए मारे जाने के 28 वर्षों बाद सिख धर्म के सबसे प्रतिष्ठित आधुनिक 'शहीद' के नाम पर आखिरकार एक स्मारक होगा. जरनैल सिंह भिंडरांवाले और उसके 250 सशस्त्र अनुयायी जून, 1984 में सेना द्वारा अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से अलगाववादी आतंकवादियों को निकालने के लिए चलाए गए अभियान ऑपरेशन ब्लूस्टार में मारे गए थे.
इस सैन्य कार्रवाई में लगभग 800 श्रद्धालु भी मारे गए थे. सिख समुदाय का एक बड़ा हिस्सा अपने पवित्रतम तीर्थ की रक्षा करते हुए मारे गए 'नायक' के रूप में भिंडरांवाले की जय-जयकार करता है.
यह स्मारक स्वर्ण मंदिर परिसर के भीतर उस जगह से बमुश्किल 15 फीट की दूरी पर बनाया जाएगा जहां 6 जून, 1984 की सुबह यह आतंकवादी नेता मारा गया था. अकाल तख्त से लगी हुई यह तीन मंजिला इमारत ''शहीदगंज'' के नाम से जानी जाएगी, जिसमें ऑपरेशन ब्लूस्टार से जुड़ी दृश्य-श्रव्य स्मृतियां, एक गुरुद्वारा और सिखों के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब की गोली से क्षतिग्रस्त एक प्रति सहित कलाकृतियों की एक गैलरी होगी. 20 मई से इस स्मारक का निर्माण शुरू होने वाला है.
लंबे समय से ऐसे स्मारक की मांग करते आ रहे कट्टरपंथी सिख समूहों ने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के शहीदगंज बनवाने के फैसले का स्वागत किया है. अहम बात यह है कि पंजाब में सत्तारूढ़ शिरोमणि अकाली दल का इस कमेटी में भारी बहुमत है.
अलगाववादी संगठन दल खालसा के महासचिव कंवरपाल सिंह का कहना है कि यह स्मारक ''न केवल भिंडरांवाले और उनके अनुयायियों के लिए बल्कि मारे गए सैकड़ों अन्य निर्दोष तीर्थ यात्रियों के लिए भी आवश्यक श्रद्धांजलि है.'' सैन फ्रांसिस्को स्थित अमेरिकी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष प्रीतपाल सिंह कहते हैं कि यह 500 वर्षों की सिख परंपरा के अनुरूप है.
मगर इस कदम से अकाली दल के गठबंधन साझीदार हतोत्साहित हैं. पंजाब भाजपा इकाई के अध्यक्ष अश्विनी शर्मा कहते हैं कि पार्टी ''इंतजार करेगी और नजर रखेगी,'' लेकिन पूर्व मंत्री मनोरंजन कालिया ने स्मारक के विचार पर अफसोस जाहिर किया. उन्होंने तीन दशकों बाद स्मारक के विचार पर सवाल उठाते हुए कहा, ''पंजाब में हर कोई हमारे इतिहास के उस काले अध्याय को बंद करना चाहता है.''
स्मारक के निर्माण की अनुमति देने के अपने फैसले का बचाव करते हुए एसजीपीसी प्रमुख अवतार सिंह मक्कड़ का कहना है कि शहीदगंज जुल्म के खिलाफ एक प्रतीक होगा. मक्कड़ ने इंडिया टुडे को बताया, ''जून, 1984 में मंदिर के भीतर, जलियांवाला बाग से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी.''

