महेंद्र सिंह धोनी और सौरभ तिवारी सरीखे क्रिकेट सितारों ने बिहार और झारखंड के दूरदराज के इलाकों के बच्चों के मन में भी क्रिकेट के मैदान में चमकने की अलख जगा दी है. इस साल बिहार के वीर प्रताप सिंह मौनी और झारखंड के सनी गुप्ता आइपीएल-5 में नजर आएंगे. बुलंद इरादों और कड़ी मेहनत के दम पर उनकी चाहत आइपीएल के मैदान में अपने खेल के जौहर दिखाकर भारतीय टीम की जर्सी पहनने की है. लेकिन उनके यहां तक पहुंचने का सफर भी कम दिलचस्प नहीं रहा है.
'तेज गेंदबाज बनना है लक्ष्य'
दिसंबर, 2011. कोलकाता में रणजी ट्रॉफी का दिल्ली और पश्चिम बंगाल की टीम के बीच चल रहा एक मुकाबला. मैच अपने रोमांचक दौर में पहुंच चुका था. दिल्ली ने 392 रनों का लक्ष्य रखा था, जिसके जवाब में 358 रनों पर बंगाल के आठ खिलाड़ी आउट हो चुके थे. उस समय मनोज तिवारी और बिहार के एक युवा खिलाड़ी वीर प्रताप सिंह मौनी ने जरूरी 35 रन बनाकर पश्चिम बंगाल की टीम को जीत दिलाई.
यह एक क्षेत्रीय क्रिकेटर के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने की एक शुरुआत भर थी. बिहार के नालंदा जिले के जगतपुर गांव के मौनी का चयन इंडियन प्रीमियर लीग (आइपीएल) की टीम डेक्कन चार्जर्स के लिए हो गया है. इस 20 वर्षीय खिलाड़ी को टीम का हिस्सा बनने के एवज में 20 लाख रु. मिलेंगे. वे इसे भारतीय टीम के लिए दावेदारी का एक मौका मानते हैं. वे बताते हैं, 'भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल होकर दुनिया का सबसे तेज गेंदबाज बनना ही मेरा लक्ष्य है.'
उन्हें क्रिकेट का जुनून बचपन से ही है. जब वे आठ साल के थे, तब उन्होंने अपनी मां के बैग से 3 रु. चुरा लिए थे और उस पैसे से प्लास्टिक का बल्ला और गेंद खरीद लाए थे. जब परिवार स्कूल पहुंचा तो वे स्कूल की बजाए क्रिकेट खेलते हुए मिले. इस पर उनकी जमकर पिटाई हुई और यह पिटाई मौनी को 12 साल बाद भी याद है. यही नहीं, वे अकसर अभिभावकों से कॉपी-किताब के नाम पर लिए गए पैसों से भी क्रिकेट का सामान ले आया करते थे. उनके चाचा रमाशंकर बताते हैं, 'मौनी की इस धुन के चलते कई बार खेल के मैदान में भी पिटाई हुई थी. बैट और बॉल फेंक दिए गए. फिर भी उसका जुनून कम नहीं हुआ.'
परिजनों को पहली मर्तबा 2006 में मौनी के खेल से जुड़े जुनून का एहसास तब हुआ जब मुंगेर में आयोजित वीनू मांकड़ टूर्नामेंट में उन्हें खेलने का मौका मिला था. मौनी के क्रिकेट करियर के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण पल साबित हुआ. उन्होंने अपने खेल को निखारने के लिए नालंदा के ही सीनियर खिलाड़ी संजय सिंह की सलाह पर क्रिकेट खिलाड़ी सौरभ गांगुली की कोलकाता स्थित वीडियोकॉन एकेडमी में ट्रेनिंग के लिए दाखिला लिया. मौनी की प्रतिभा के कारण बंगाल के अंडर-19 में उनका चयन कर लिया गया. फिर उन्हें अंडर-22 में भी शामिल किया गया. उन्होंने अंदमान प्रीमियर लीग (एपीएल) में भी बेहतर प्रदर्शन किया. मौनी ने चेन्नै स्थित डेनिस लिली के एमआरएफ पेस फाउंडेशन में भी ट्रेनिंग ली. यह उनका प्रदर्शन ही था जिससे उन्हें 2011-12 में रणजी ट्रॉफी में खेलने का मौका मिला. मौनी कहते हैं, 'बंगाल टीम, खासकर सौरभ गांगुली के योगदान से ही रणजी ट्रॉफी में बेहतर प्रदर्शन का मौका मिला.'
वे खेल के प्रति समाज के नकारात्मक नजरिए को भी बदलना चाहते हैं. बचपन में उन्हें यह कहते हुए खेलने से मना किया जाता था कि इसमें कोई भविष्य नहीं है. हालांकि परिवार की चिंता भी लाजिमी थी. दरअसल, रामगढ़ में मौनी के पिता का छोटा-मोटा कारोबार है. बड़े भाई आलोक सिंह पटना में सब-इंस्पेक्टर और तेज प्रताप यूको बैंक कोलकाता में प्रोबेशनरी ऑफिसर हैं. मौनी की अलग राह मां के लिए चिंता का विषय रही. मां मिंता देवी कहती हैं, 'मौनी ने दृढ़ संकल्प और निरंतर प्रयास से मेरे भ्रम को मिथ्या साबित कर दिया.'
उनके पिता वीरेंद्र सिंह का नजरिया हमेशा सकारात्मक रहा. वे कहते हैं, 'मौनी ने जब आइपीएल में चयन की खबर दी तब कुछ पल के लिए यकीन नहीं हुआ.' बहरहाल, कीर्ति आजाद और सबा करीम जैसे खिलाड़ियों के बाद अब राष्ट्रीय स्तर पर बिहार के इस चेहरे की मौजूदगी से कई उम्मीदें जग जाती हैं.
स्पिन के दम पर बच्चों की मुहल्ले के स्तर पर होने वाली क्रिकेट की एक प्रतियोगिता में एक खिलाड़ी को इसलिए ज्यादा पैसा मिला क्योंकि वह तेज गेंदबाज था. बस, यह बात बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले दूसरे खिलाड़ी को चुभ गई क्योंकि वह स्पिन गेंदबाज था. फिर क्या था, अगले ही दिन वह बच्चा स्कूल का बस्ता उठाए स्कूल की बजाए राजीव नायर के स्कूल ऑफ क्रिकेट पहुंच गया. स्कूल के इंचार्ज ने टालते हुए उसे किसी और दिन आने के लिए कहा तो उसका करारा-सा जवाब था, 'मैं कल तक के लिए नहीं रुक सकता.' उसने टेनिस गेंद को तीन उंगलियों में फंसाकर हाथ घुमाते हुए दिखा दिया कि वह गेंदबाजी अच्छे से कर सकता है. यहां के इंचार्ज बद्रीनाथ को उनका यह अंदाज पसंद आया और समझ में आ गया कि उनमें गेंद को स्पिन कराने की क्षमता है.आज वही खिलाड़ी यानी सनी गुप्ता आइपीएल-5 में डेहली डेयरडेविल्स की टीम में शामिल है. जमशेदपुर के 22 वर्षीय सनी गुप्ता ने जब क्रिकेट में भविष्य बनाने का फैसला अपने पिता सुरेश नारायण को सुनाया तब वे आठवीं कक्षा में पढ़ते थे. एक प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले उनके पिता को उनके फैसले पर एतराज था, लेकिन सनी तय कर चुके थे. क्रिकेट के प्रति उनका यह लगाव रंग लाया. उन्होंने क्रिकेट को अपनी तपस्या माना और उसी पर कदम आगे बढ़ाने के मजबूत इरादे को थामे रखा. वर्तमान में, तमिलनाडु की रणजी टीम के बेहतरीन स्पिन गेंदबाज सनी ने पिछले साल अक्तूबर में आइपीएल में सेलेक्शन के लिए ट्रायल दिया था और वे चुन लिए गए.
आइपीएल में चयन के बारे में सनी बताते हैं, 'मेरे कोच रहे आशीष कपूर ने मुझे फोन पर इसकी सूचना दी. उसके बाद ही मैंने अपनी बड़ी बहन और जीजाजी को बताया. मेरे मां-पिताजी बेहद खुश हैं. जब मैंने आइपीएल में चयन की सूचना उन्हें दी तो उनके चेहरे पर एक अजब मुस्कान देखी. शायद अब उन्हें मेरे फैसले पर कोई शक नहीं होना चाहिए.' उनके दोस्त और भारतीय टीम के खिलाड़ी वरुण उरांव भी डेहली डेयरडेविल्स में ही हैं.
उनकी मां माला गुप्ता कहती हैं, 'जब वह बहुत छोटा था तब मैंने उसके लिए उसी डिजाइन का स्वेटर बुना था, जिसे मैंने सचिन को मैदान में पहने देखा था. जब वह बड़ा हुआ तब वह बल्ले और गेंद से ही खेलता था. आज उसकी सफलता पर खुश हूं.' 2001 के बाद उन्होंने अंडर 14, 16 और 19 के कई मैच खेले और 2003 में बिहार की रणजी टीम से भी खेले.
अब वे तमिलनाडु से रणजी के लिए खेलते हैं. रणजी में उन्होंने 27 मैच खेले हैं और 60 विकेट लिए हैं. वे शेन वॉर्न से प्रभावित हैं. उनका कहना है, 'मेरे हुनर को निखारने में एमआरएफ फाउंडेशन का बहुत बड़ा हाथ है.'
आइपीएल में खेलने को लेकर वे खासे उत्साहित हैं. लेकिन थोड़े नर्वस भी हैं. वे कहते हैं, 'आपको फाइनल डेस्टिनेशन का पता नहीं होता. अच्छा यही है कि आप बेहतर और उम्दा प्रदर्शन की कोशिश करें. और मैं ऐसा ही करने का प्रयास करूंगा.'

