महिला और बाल कल्याण को लेकर मध्य प्रदेश सरकार के दावे जो भी हों, इस प्रदेश में लाड़लियों की जान को सबसे ज्यादा खतरा है. नई दिल्ली के निर्माण भवन से निकली स्वास्थ्य मंत्रालय के राष्ट्रीय स्वास्थ्य आसूचना ब्यूरो की रिपोर्ट 'नेशनल हेल्थ प्रोफाइल-2010' के पांच साल के आंकड़े तो यही कहते हैं. ब्यूरो ने ये आंकड़े राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के हवाले से दिए हैं.
मध्य प्रदेश ने वर्ष 2009 के दौरान भ्रूण हत्या के 23 मामलों और शिशु हत्या के 51 मामलों के साथ पंजाब-हरियाणा सहित देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पीछे छोड़ते हुए शर्मनाक रूप से पहला स्थान हासिल किया है. (देखें तालिका) 
ज्यादा दिन नहीं हुए जब एनसीआरबी रिपोर्ट में कहा गया था कि बलात्कार के सबसे ज्यादा 2,998 मामले मध्य प्रदेश में दर्ज हुए और देश के ऐसे कुल मामलों में इस राज्य का 14 फीसदी हिस्सा है. 19.2 फीसदी (24,201 में से 4,646) भागीदारी के साथ बच्चों के साथ हुए अपराधों में मध्य प्रदेश का नाम सबसे ऊपर था. इतना ही नहीं, मध्य प्रदेश (39) और पंजाब (23) गर्भस्थ शिशुओं की हत्या के मामले में सबसे आगे हैं. देश में होने वाले इस जघन्य अपराध में दोनों राज्यों का 44.3 फीसदी हिस्सा है.
बच्चों के अधिकारों के लिए कार्यरत भोपाल स्थित सामाजिक संस्था विकास संवाद की ओर से जुटाए गए आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल 2005 से जनवरी 2011 के बीच मेडिकली टर्मिनेटेड प्रैग्नेंसी.ज (एमपीटी) के रूप में प्रदेश में 1,44,066 गर्भस्थ शिशुओं को जान गंवानी पड़ी. प्रदेश सरकार के लोक स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग की मासिक रिपोर्टों के आधार पर इस संस्था का कहना है कि मध्य प्रदेश में बीते छह वर्षों में 1 वर्ष से कम आयु के 1,50,512 शिशुओं की मौत हो गई. प्रदेश में घटते शिशु लिंगानुपात की मौजूदा विपरीत परिस्थितियों के मद्देनजर छोटे बच्चों की ये मौतें संवेदनशील नजर आती हैं.
बीते 4 अप्रैल को जारी हुए जनगणना-2011 के प्रारंभिक आंकड़े भी मध्य प्रदेश में नन्ही बालिकाओं की जिंदगी को लेकर स्याह तस्वीर पेश करते हैं. शिशु लिंगानुपात (6 वर्ष से कम उम्र के बालकों की तुलना में बालिकाओं का अनुपात) के आंकड़े भी काफी हद तक चौकाने वाले हैं. जहां यह अनुपात वर्ष 2001 की जनगणना के प्रति 1,000 बालकों पर 932 बालिकाओं की तुलना में 20 अंक घट कर 912 रह गया.
वर्ष 2001 में जहां 4 जिलों मुरैना, भिंड, ग्वालियर और दतिया में 1,000 लड़कों पर 900 से कम लड़कियां थीं वहीं अब 2011 के प्रारंभिक आंकड़ों में यह स्थिति 10 जिलों में हो गई है और इनमें अब शिवपुरी, टीकमगढ़, छतरपुर, श्योपुर और प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी इंदौर भी जुड़ गए हैं तथा नरसिंहपुर (900) तथा गुना (901) भी किनारे पर हीं हैं. भिंड (महज 2 अंक की बढ़ोतरी) के अलावा मध्य प्रदेश के सभी जिलों में 0 से 6 वर्ष की लड़कियों की संख्या घट गई है.
नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2010 को लेकर मध्यप्रदेश के महिला एवं बाल विकास विभाग में प्रमुख सचिव बी.आर. नायडू इससे अनभिज्ञ हैं, ''किसकी रिपोर्ट है, किस मंत्रालय की है? अभी इसे देखा नहीं है, आपसे जानकारी मिली है तो देखते हैं.'' महिला और बाल विकास मंत्री रंजना बघेल का कहना है, ''प्रदेश के 14 जिलों में लड़कियों को लेकर भेदभाव की बात लिंगानुपात से पता चलती थी किंतु आज लोगों की सोच में अंतर आया है.''
दरअसल, सामाजिक कारणों की वजह से मध्य प्रदेश का ग्वालियर-चंबल अंचल कन्या भ्रूणहत्या और कन्या शिशुहत्या का प्रमुख केंद्र रहा है. गांवों में यह कहावत प्रचलित है कि एक रुपया और एक मोडा किसी का काम नहीं. परंपरागत रूप से चली आ रही इस सामाजिक बुराई के पीछे कई भ्रांतियां और सामाजिक कुरीतियां जिम्मेदार हैं.
गांवों में पोर्टेंबल सोनोग्राफी मशीन के जरिए लिंग परीक्षण किया जाता है. लड़का और लड़की की पहचान के लिए कोडवर्ड ईजाद किए गए हैं. ऐसे परीक्षण या अवैध गर्भपात के मामले सामने आते भी हैं, लेकिन ज्यादातर सबूतों के अभाव में दम तोड़ जाते हैं.
मुरैना और श्योपुर जिले में सक्रिय एनजीओ 'धरती' के 40 वर्षीय देवेंद्र भदौरिया कहते हैं ''मुरैना में ही 15 और ग्वालियर में 150 से 200 सोनोग्राफी सेंटर हो गए हैं. यह प्रवृत्ति शिक्षित तबके में बढ़ गई है. कई बुजुर्ग भी कहते हैं कि 1000-2000 रुपए डॉक्टर को देने पर काम बनता है तो क्यों पाप मोल लें.''
विकास संवाद के प्रमुख सचिन जैन का कहना है, ''कन्या भ्रूणहत्या, कन्या शिशु हत्या और गिरते लिंगानुपात में समाज के पढ़े-लिखे और सामाजिक रूप से संपन्न समुदायों की भूमिका ज्यादा रही है. जो समुदाय जातिगत व्यवस्था में ऊंचा स्थान रखते हैं, उन्होंने अल्ट्रा साउंड जैसी तकनीकों का ज्यादा उपयोग किया है.'' जैन का कहना है, ''जरूरत है लिंग चुनाव और भ्रूण हत्या विरोधी कानून के ठोस क्रियान्वयन की.'' एक समय तक जिला चिकित्सा अधिकारियों को ही इस कानून के क्रियान्वयन और निगरानी के अधिकार थे, जिन्होंने अपने और दूसरे डॉक्टरों के हितों का संरक्षण किया. हजारों बालिकाओं की हत्या होती रही पर किसी भी अपराधी डाक्टर को सालों तक कोई सजा नहीं हुई. एक तरफ सरकार चिंता जाहिर करती रही और दूसरी तरफ क़ानून का बेहद लचर क्रियान्वयन हुआ.
मध्य प्रदेश वॉलंटरी हेल्थ एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक मुकेश सिन्हा का दावा है, ''इंदौर में पिछले ढाई वर्ष में स्थानीय प्रशासन के साथ निगरानी प्रक्रिया में सिविल सोसाइटी के सदस्यों की सहभागिता के कारण भ्रूणहत्या के मामलों पर रोक में काफी मदद मिली है.''
मध्य प्रदेश सरकार ने इस मसले पर काम करते हुए लाडली लक्ष्मी योजना और कन्यादान योजना शुरू की. महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त संचालक सुरेश तोमर का कहना है कि किसी भी योजना के लागू होने से लोगों की मानसिकता में बड़ा बदलाव नहीं आया है फिर भी चंबल अंचल के भिंड जिले में लोगों की सोच बदलने में मदद मिली है. वे कहते हैं कि चंबल अंचल में पुरुषों की सोच हरियाणा से अलग नहीं है, जिसमें वे महिलाओं को ज्यादा इज्जत नहीं देते हैं.
आखिर चंबल अंचल में ऐसा क्यों है, इसके बारे में जीवाजी विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री डॉ. विमलेन्द्र सिंह राठौड़ के मुताबिक, ''यहां लोगों की मानसिकता यही है कि लड़की पराया धन है, जबकि लड़के होंगे तो समाज में रुतबा कायम रहेगा.''
सरकार यह मानती है कि लड़कियों की संख्या कम होने के पीछे गरीबी या आर्थिक कारण सबसे अहम हैं और आर्थिक मदद देकर लड़कियों को बचाया जा सकव्गा. लेकिन जैन का मानना है, ''यह नजरिया बिलकुल सही नहीं है. वास्तव में सरकार को समाज की पितृसत्तात्मक सोच पर प्रहार करना होगा, जो यह मानता है कि लड़की एक परिवार को कमजोर करती है. चिकित्सकीय गर्भपात और शिशु मृत्यु संबंधी आंकड़ों पर पैनी नजर रखने की जरूरत है.''
लिंगानुपात की विषमता पर रोक लगाने के लिए पिछले वर्ष भी ग्वालियर में अपना रिकार्ड सही नहीं रखने के चलते कई अल्ट्रासाउंड सेंटरों को बंद किया गया था, लेकिन इन लोगों ने फिर से अपनी पहुंच का इस्तेमाल किया और कारोबार शुरू कर दिया. ग्वालियर के कलेक्टर आकाश त्रिपाठी इस समस्या से निपटने के लिए अल्ट्रासाउंड सेंटर में सोनोग्र्राफी को रिकॉर्ड करने के लिए एक हार्डवेयर डिवाइस लगाने संबंधी प्रयोग कर रहे हैं.
-साथ में महश शर्मा

