scorecardresearch
डार्क मोड

खेत-खलिहान: पहाड़ों में भी अरहर

अब पहाड़ों में भी अरहर की पैदावार होने लगी है और यह सब पहाड़ों के बदलते मौसम के साथ-साथ काफी हद तक अरहर के नए बीज की बदौलत हुआ है.

अरहर की पैदावार
अरहर की पैदावार
अपडेटेड 22 अक्टूबर , 2011

अब पहाड़ों में भी अरहर की पैदावार होने लगी है और यह सब पहाड़ों के बदलते मौसम के साथ-साथ काफी हद तक अरहर के नए बीज की बदौलत हुआ है.  'अरहर बी.एल.-1' नामक इस बीज को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अल्मोड़ा स्थित विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने तैयार किया है. चमोली में तो इसका प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन 1,878 किलोग्राम तक पहुंच गया है.

अरहर की यह प्रजाति अपनी उत्पादन क्षमता और कम लागत के कारण पहाड़ के दूरदराज  इलाकों में भी किसानों की जबान पर है. खेतों में बढ़ते उत्पादन के रूप में इसके नतीजे दिखाई दे रहे हैं. इन दिनों पीले-लाल फूलों और रंगीन फलियों से भरे अरहर के पौधे उत्तराखंड में किसानों के चेहरों की रौनक बढ़ा रहे हैं.

अरहर भारत की प्राचीनतम फसलों में से एक है और इसे भारतीय मूल का ही माना जाता है, लेकिन पहाड़ की परिस्थितियों से तालमेल वाले बीज उपलब्ध न होने के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में कभी भी परंपरागत रूप से अरहर की खेती नहीं हुई. हालत यह थी कि 2007 से पहले कुमाऊं के सभी जिलो में कुल मिलाकर 19 हेक्टेयर से भी कम इलाके में इसकी पैदावार होती थी. लगभग पूरे साल भर के बाद भी प्रति हेक्टेयर उत्पादन 789 किग्रा के आसपास ही हो पाता था. राज्‍य सरकार के आंकड़ों पर गौर करें तो इस साल अकव्ले अल्मोड़ा में ही अरहर की बुआई 407 हेक्टेयर में फैल गई है और औसत उत्पादन 1,280 किलोग्राम प्रति हेक्टयर हो गया है.

कुमाऊं में इस बीज के कारण किसानों के बंजर रहने वाले खेतों से भी अब कमाई बढ़ने लगी है. अरहर पहले कम मात्रा में एक वर्षीय फसल के रूप में तैयार होती थी. इसकी बुआई और पकने के बीच सात से दस महीने का वक्त लग जाता था.

विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. जगदीश चद्र भट्ट कहते हैं, ''पहले उपलब्ध अरहर की प्रजातियां पर्वतीय क्षेत्र के फसल चक्र के अनुकूल नहीं थीं. लंबी अवधि की होने के कारण यह रबी की फसल के साथ नहीं उगाई जा सकती थी. सर्दियों में पाले से इनकी फलियों से बीज के पकने की समस्या थी. लेकिन यह नया बीज 130 से 140 दिनों के बीच पककर तैयार हो जाता है और इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह हर प्रकार की भूमि में पैदा हो जाता है.'' यही नहीं, अरहर की इस प्रजाति में रोग कम लगते हैं और कम पानी में भी इसकी पैदावार अच्छी होती है. यह पोषण के मामले में भी दूसरी प्रजातियों से बेहतर है. इसमें प्रोटीन की मात्रा 22 फीसदी है.

पहाड़ों के लिए तैयार किए गए इस अरहर के दाने आकार में भी बड़े और मोटे हैं. किसान बीज के इस दाने से काफी खुश हैं. चमोली के मैठाणा गांव की अरहर उत्पादक कमला देवी अपने पास बचे बीज दिखाते हुए कहती हैं, ''इसके बीज इतने बड़े हैं कि पैदावार निश्चित रूप से बढ़ जाएगी.''

मैठाणा में पहली बार किसानों ने इस बीज का उपयोग किया है. लगभग 15 किसानों ने बीज को देखते ही बिना किसी गारंटी के सीधे खेतों में बो दिया. अब उन्हें नतीजे भी अच्छे मिल रहे हैं. मैठाणा की माहेश्वरी देवी अपने खेतों में लहलहाते अरहर के पौधों से खासी उत्साहित हैं. वे कहती हैं, ''बुवाई में भी बीज की खपत कम हुई और अंकुरण भी अच्छा रहा. पौधे लंबे और मोटे हो रहे हैं और इन पर 100 से ज्‍यादा फलियां हैं. सबसे बड़ी बात तो यह कि इसमें मेहनत भी कम लगी है. इसके नीचे खरपतवार न होने से खेतों में निराई-गुड़ाई के लिए बार-बार नहीं जाना पड़ा.''

2007 में आम प्रचलन के लिए राज्‍य विमोचन समिति ने इस बीज को अनुमोदित कर दिया. मंजूरी के तीन साल के भीतर ही पहाड़ी इलाकों के दूर-दूर के गांवों तक इसका रिकॉर्डतोड़ विस्तार हुआ है. डॉ. भट्ट कहते हैं, ''यह बीज अंतरराष्ट्रीय ऊष्णशुष्क कटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान के आइपीसीएल 88039 बीज से तैयार किया गया है. उत्पादन भी प्रति हेक्टयेर 18 से 20 क्विंटल है. प्रयोगशाला के साथ-साथ खेतों में भी इस बीज के अच्छे नतीजे रहे हैं. पिछले साल अल्मोड़ा, बागेश्वर और नैनीताल जनपदों के 20 गांवों में इन बीजों के आधार पर प्रति हेक्टेयर 1,280 किग्रा अरहर का उत्पादन हुआ है.'' इस समय अरहर का औसत राष्ट्रीय उत्पादन 650 किलोग्राम प्रति हेक्टयर है.

विवेकानंद संस्थान के बीज उत्पादन विभाग के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. पी.के. अग्रवाल कहते हैं, ''इसे बंजर इलाके में भी बोया जा सकता है जिससे अरहर के उत्पादन के साथ इसकी जड़ों की वजह से भूस्थिरता भी बनी रहेगी.'' अरहर के इस बीज के सफल उत्पादन को देखते हुए राज्‍य के कृषि विभाग ने इस साल 11 जिलों में अपने न्याय पंचायत स्तरीय कार्यालयों के माध्यम से 500 क्विंटल बीज किसानों के बीच वितरित किया है.

अल्मोड़ा के अलावा चंपावत में 107 हेक्टयेर और नैनीताल व चमोली जिले में 50-50 हेक्टेयर में यह बीज बोया गया है. सबसे अच्छी बात बुआई से पहले इस बीज का किसानों तक पहुंचना रहा है. मैठाणा में कृषि निरीक्षक विनोद नौटियाल कहते हैं, ''खेतों के तैयार होने से पहले ही अरहर का बी.एल.-1 का बीज उनके स्टोर तक पहुंच गया था.

इस तरह यह किसानों तक भी समय पर पहुंच गया.'' किसानों ने भी बीज का उत्पादन अपने ही खेत से करने का मन बना लिया है. खेतों में लहलहाते अरहर को देखकर कमला देवी कहती हैं कि अगले साल अरहर बी.एल.-1 का यह बीज कृषि भंडार से नहीं, बल्कि घर से ही तैयार कर दोगुने रकबे में लगाएंगी.

ADVERTISEMENT
Advertisement