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वाहवाही के लिए फर्जी मुठभेड़

खाकी वर्दी एक बार फिर फर्जी मुठभेड़ के कलंक से दागदार हो गई. चंबल पुलिस की विश्वसनीयता एक बार फिर संदेह के घेरे में है, जिस पर डकैतों के नाम पर निर्दोष लोगों को मुठभेड़ में मार गिराने के आरोप यदा-कदा लगते ही रहते हैं और ऐसे कई मामलों में जांच भी चल रही है.

ग्वालियर इनकाउंटर
ग्वालियर इनकाउंटर
अपडेटेड 25 जुलाई , 2011

खाकी वर्दी एक बार फिर फर्जी मुठभेड़ के कलंक से दागदार हो गई. चंबल पुलिस की विश्वसनीयता एक बार फिर संदेह के घेरे में है, जिस पर डकैतों के नाम पर निर्दोष लोगों को मुठभेड़ में मार गिराने के आरोप यदा-कदा लगते ही रहते हैं और ऐसे कई मामलों में जांच भी चल रही है.

लेकिन इस बार, चार बेकसूर युवकों को बदमाश बताकर मार डालने वाली मुरैना पुलिस फंसती दिख रही है. न्यायिक जांच में पुलिस का इन युवकों को बदमाश बताने का दावा खरा नहीं उतर पाया.

अपने दावे की हवा निकलने के बाद पूरा पुलिस महकमा चुप्पी साधे हुए है. इसके पहले भिंड पुलिस ने पिछले साल अगस्त में चार कथित बदमाशों को मुठभेड़ में मारने का दावा किया था, जिसकी जांच अभी तक चल रही है.

पुलिस की हर मुठभेड़ के पीछे वहीं कहानी होती है, मुखबिर से सूचना मिली कि बीहड़ों से लगे गांव में कुछ हथियारबंद लोग देखे गए हैं. पुलिस दल ने बदमाशों को घेर लिया और हथियार डालने को कहा लेकिन बदमाशों ने फायरिंग शुरू कर दी. जबावी कार्रवाई में पुलिस ने भी गोलियां चलाईं. गोलीबारी आधे घंटे तक चली.

दूसरी तरफ से जब गोलियां चलनी बंद हो गई तो पुलिस को वहां से चार लोगों के शव मिले. जिनकी पहचान इनामी डकैतों के रूप में हुई जो कई वारदातों में शामिल थे. हैरानी तो यह कि ऐसी मुठभेड़ें हमेशा तड़के ही होती हैं और ऐसा कम ही होता है कि कोई पुलिसवाला घायल हुआ हो.

22 नवंबर, 2010 को टेंटरा थाना क्षेत्र के जाटौली गांव के बीहड़ों में ठीक ऐसी ही एक कथित मुठभेड़ में मुरैना पुलिस ने उत्तर प्रदेश के मैनपुरी निवासी चार डकैतों-संजू सिंह, गुड्डू सिंह, सोनू व अनिल काछी-को मारने का दावा किया था.

मुठभेड़ स्थल से तीन राइफल, पिस्तौल और कारतूस मिलने का भी दावा किया गया था. हर मुठभेड़ की न्यायिक जांच होती है, जो डिप्टी कलेक्टर रैंक का अधिकारी करता है. इस मुठभेड़ की न्यायिक जांच करने वाले सबलगढ़ के एसडीएम विकास नरवाल ने मुठभेड़ पर अहम सवाल उठाए हैं.

जांच में यह तथ्य सामने आया कि पुलिस मारे गए चारों युवकों का पुराना आपराधिक रिकॉर्ड पेश नहीं कर पाई. इसके अलावा, पुलिस ने डकैतों पर 7,500 रु. का जो इनाम घोषित करने की बात कही थी, वह अस्तित्व में ही नहीं थी. यानी मुठभेड़ में मार गिराए गए चारों युवक बेकसूर थे और पुलिस ने वाहवाही की चाह में इस वारदात को अंजाम दिया था. उस समय टेंटरा थाने के प्रभारी अनिल भदौरिया थे और मुरैना के एसपी गौरव राजपूत थे.

आम तौर पर औपचारिकता मानी जाने वाली न्यायिक जांच इस बार अपवाद रही. रिपोर्ट के सामने आते ही पूरे पुलिस महकमे में हडकंप मच गया. मुरैना के एसपी संजय सिंह विभाग को अभी यह रिपोर्ट नहीं मिलने की बात कहते हुए सफाई देते हैं, ''रिपोर्ट केवल शुरुआती स्तर की है.''

चंबल रेंज के डीआइजी डी.पी. गुप्ता भी यही बात दोहराते हैं. पूरा पुलिस महकमा लीपापोती में जुट गया है और इसीलिए मुरैना के कलेक्टर ने एसडीएम नरवाल से अंतिम रिपोर्ट देने के लिए कहा है. सवाल तो मुठभेड़ होने के बाद से ही उठ रहे थे. जिन युवकों को डकैत बताकर मारा गया, उनके नाम अंचल में किसी ने नहीं सुने थे और न ही किसी वारदात में उनका कोई रिकॉर्ड मिला था. कथित मुठभेड़ का यह अकेला मामला नहीं है.

इसके पहले भी अंचल में हुईं कई मुठभेड़ें सवालों के घेरे में हैं. पिछले साल 19 अगस्त को भिंड के एंडोरी थाने में पुलिस ने दावा किया कि उसने बंजारा गिरोह के चार सदस्यों-राजू खान उर्फ बंजारा, रविंद्र उदौनिया, ऊदल और अमजद खान-को तड़के ही एक मुठभेड़ में मार गिराया है.

इस मुठभेड़ को भिंड के एसपी चंचल शेखर और एंडोरी थाना प्रभारी सुरेंद्र सिंह सिकरवार की टीम ने अंजाम दिया था. कांग्र्रेस के अपना पदाधिकारी बताए जाने वाले अमजद खान के परिजनों ने फर्जी मुठभेड़ का आरोप लगाया. इस मामले की जांच अभी चल रही है.

22 अप्रैल, 2005 को दतिया पुलिस ने डबरा के रहने वाले खुशालीराम को उसके भाई बालकिशन और कल्ली के साथ घर से उठा लिया. कुछ दिन के बाद बालकिशन और कल्ली को तो छोड़ दिया, लेकिन खुशालीराम पुलिस गिरफ्त में ही रहा. 5 फरवरी, 2007 को दतिया पुलिस ने खुशालीराम को डकैत कालिया उर्फ बृजकिशोर बताते हुए मुठभेड़ में मारने का दावा किया. बाद में 29 अप्रैल, 2009 को झंसी पुलिस ने डकैत कालिया को एक मुठभेड़ में जिंदा पकड़ लिया.

दो साल पहले ग्वालियर पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारे गए कथित बदमाश आकाश दीक्षित का मामला भी संदेह के घेरे में है. चार साल पहले भी पुलिस ग्वालियर के मेला मैदान में दो मासूम युवकों को मुठभेड़ में मार चुकी है.

कई खूंखार डकैतों को मुठभेड़ों में मार गिराकर पुलिस ने अंचल के लोगों को राहत तो निश्चित तौर पर दिलाई है लेकिन मासूम लोग अनचाहे वाहवाही पाने की पुलिस की बढ़ती भूख का शिकार बन रहे हैं.

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