नाटककार दयाप्रकाश सिन्हाः समीक्षायन
(संपादनः रवींद्रनाथ बहोरे)
संजय प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली-2,
कीमतः 995 रु.
दयाप्रकाश सिन्हा आइएएस अफसर रहे हैं, पर सांस्कृतिक प्रशासक और नाट्यलेखक-निर्देशक के रूप में उनका दूसरा परिचय ज्यादा महत्वपूर्ण रहा है. उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान और भोपाल स्थित भारत-भवन के वे मुखिया रहे हैं. इस पुस्तक में 50 से ज्यादा वरिष्ठ और युवा नाट्यालोचकों/लेखकों ने उनके लिखे और मंचित नाटकों पर बेबाकी से लिखा है. इनमें डॉ. नगेंद्र, विष्णु प्रभाकर, जयदेव तनेजा और गिरीश रस्तोगी से लेकर संगम पांडेय तक के नाम शामिल हैं.
1958 में अपना पहला नाटक सांझ-सवेरा लिखने वाले सिन्हा इतिहास चक्र और ओह अमेरिका से बतौर नाटककार स्थापित हुए और कथा एक कंस की ने उनके नाटककार व्यक्तित्व को विशिष्ट पहचान दी. इस किताब के संपादक रवींद्रनाथ बहोरे उ.प्र. संगीत नाटक अकादमी की पत्रिका छायानट का संपादन करते हुए एक दशक तक सिन्हा के साथ रहे हैं.
इस किताब की तैयारी में उनकी मेहनत दिखती है. हां! अच्छा होता कि सिन्हा के नाटकों की समीक्षाओं के साथ संबंधित पत्र-पत्रिकाओं-जिनमें वे छपी-के नाम और तारीखें भी दी गई होतीं तो पाठकों का उनसे जुड़ना और भी सुखद होता.
सिन्हा के नाटकों की जमीन स्त्री-पुरुष संबंधों की बजाए समाज, राजनीति और इतिहास रहे हैं. कुछ समीक्षकों का मत है कि सिन्हा दर्शकों तक पहुंचने के लिए अपने नाटकों का सरलीकरण कर देते हैं. पर यही उनके नाटकों का सशक्त पक्ष भी है. यह किताब करीब 50 वर्ष की नाट्य समीक्षा यात्रा का एक वृहत् वृतांत भी है, जो नाट्यालोचकों की दृष्टि को नई पीढ़ी के रंगप्रेमियों और शोधार्थियों के सामने एक पाथेय के रूप में पेश करती है.

