एक झूठ हमेशा बड़े झूठ को दावत देता है. अंतरराष्ट्रीय संबंधों का पिनोकियो (ऐसा काल्पनिक पात्र जिसकी नाक तनाव, खासकर झूठ बोलने के समय लंबी हो जाती थी) मत भले एक छोटी चालाक नाक से शुरू होता हो लेकिन वह जल्दी ही लंबा होकर शर्मनाक कैरिकेचर बन जाता हैः झूठ आप से आगे चलता है.
ओसामा बिन लादेन की मौत के चंद घंटों के भीतर आसिफ .जरदारी सरकार ने परस्पर विरोधी बयानों के जरिए ओसामा की हड्डियों से पाकिस्तान की विश्वसनीयता को दफना दिया. उन बयानों में उभरते तथ्यों के मुताबिक बदलने की शालीनता भी नहीं थी. शायद पाकिस्तान मानता है कि चूंकि वह रणभूमि बन चुका है, लिहाजा युद्ध के कुहासे में घबराहट एक जायज चाल है. जैसा कि मानव प्रकृति के शानदार डॉक्टर शेक्सपियर ने कहा था कि जब हम फरेब करने निकलते हैं तो हम बहुत पेचीदा जाल बुन लेते हैं.
जरदारी की सरकार के लिए मौकापरस्ती स्वाभाविक रूप से आ जाती है, और शुरू में उसका घुटना जानी-पहचानी दिशा में मुड़ा, उन्होंने अपनी पीठ थपथपा ली. उसके लोग यह ऐलान करने के लिए टेलीविजन स्टुडियो की ओर भागे कि ओसामा ''संयुक्त अभियान'' में मारा गया, जो ''आतंक के खिलाफ'' लंबी ''जंग'' का सर्वोच्च गौरव है. लंदन और वाशिंगटन में उसके राजदूत मीडिया में मशक्कत करने लगे. लंदन में वाजिद शम्सुल हसन ने बीबीसी के सामने ऐसी झूठी शेखी बघारी, जिसकी मुख्यालय से इजाजत नहीं मिली होगीः ओसामा को कुछ रोज पहले ही फुसलाकर जाल में फांसने के लिए एबटाबाद लाया गया था.
लेकिन सीआइए के निदेशक लियोन पनेटा ने इस काल्पनिक कथा की धज्जियां उड़ा दीं: ''यह तय किया गया कि पाकिस्तानियों के साथ काम करने की किसी कोशिश से मिशन खतरे में पड़ सकता है. वे निशाने को सतर्क कर सकते हैं.'' दूसरी ओर, व्हाइट हाउस में काउंटर-टेररिज्म के प्रमुख जॉन ब्रेनन ने सार्वजनिक तौर पर कहा, ''यह सोच से परे है कि ओसामा किसी सपोर्ट सिस्टम के बिना इतने लंबे समय तक रह सकता है.''
वे इससे ज्यादा स्पष्टवादी नहीं हो सकते थेः अमेरिका का मानना था कि अगर इस्लामाबाद को प्रस्तावित हमले के बारे में बता दिया जाता तो वह अपने आश्रित, ओसामा, को दूसरी पनाहगाह की ओर फरार करने में मदद करता. सीआइए को मालूम था कि ओसामा एबटाबाद में पाकिस्तान की सबसे अहम सैन्य अकादमी की नाक के नीचे उस घर के बनने के समय से ही, करीब पांच-छह साल से रह रहा है. यह दो और दो के जोड़ का नतीजा जानने जितना आसान था. ऊंची दीवारों और कंटीले तारों वाला वह विशाल घर विशेष रूप से ओसामा के लिए बनवाया गया था.
सोमवार शाम तक जरदारी को यह मानने को मजबूर कर दिया गया कि उनके नुमाइंदे झूठ बोल रहे थे, और कि ''रविवार की घटनाएं साझा मुहिम नहीं थीं.'' बाद में शायद घरेलू तबकों के दबाव में उन्होंने अमेरिका पर पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन करने का भी आरोप मढ़ा. यहां एक ख्याल आता हैः संप्रभुता का उल्लंघन तभी हो सकता है जब आपने उसे बचा रखा हो.
जरदारी ने जान-बूझकर एक बड़ा सवाल नजरअंदाज कर दिया जिस पर अब हो-हल्ला मच रहा है. आइएसआइ कोई बेवकूफ संगठन तो है नहीं. उसे यह कैसे नहीं पता था कि वांछितों की दुनिया का सबसे मशहूर चेहरा, एक आतंकी जिसने अमेरिका को एक बड़ा युद्ध (जिसकी मौजूदा कीमत प्रति दिन 30 करोड़ डॉलर है) छेड़ने के लिए उकसाया, अपनी बीवियों, एक दर्जन बच्चों और सहयोगियों के साथ पांच साल से भी ज्यादा अरसे से उसके दरवाजे पर रह रहा है?
अगर इस्लामाबाद को मालूम ही था, जैसा कि कुछ लोग अब दावा कर रहे हैं, तो पाकिस्तान ने अमेरिकियों को ओसामा के ठिकाने का पता लगाने और उसके नतीजे झेलने का इंतजार करने की बजाए सबसे वांछित आतंकी को गिरफ्तार कर उसके खिलाफ मुकदमा चलाने का अपना सार्वभौम अधिकार क्यों छोड़ दिया? इस विचार में ढेर सारी संभावनाएं हैं. यदि सलमान तासीर के हत्यारे का लाहौर में गुलाब की पंखुड़ियां बरसाकर स्वागत किया गया और उसका स्तुतिगान किया गया तो मुकदमे के दौरान ओसामा की कितनी प्रशंसा की जाती? पाकिस्तान प्रवेश शुल्क लगाकर अपना राष्ट्रीय कर्ज चुका सकता था.
जब आप झूठ बोलते हैं तो चिमटी दोनों ओर से सिकुड़ जाती है.
सच पेचीदा नहीं होता. घर के रख-रखाव से जुड़े कुछ सामान्य सवाल इसका खुलासा कर देंगे. ओसामा की आखिरी (पाकिस्तानी) बीवी से सबसे छोटी संतान की उम्र दो साल है, और इस तरह उसकी पैदाइश एबटाबाद में हुई है. वे डॉक्टर कौन थे? क्या उसके एक दर्जन बच्चे स्कूल जाते थे या उन्हें निजी तौर पर शिक्षा दी जाती थी? वे ट्यूटर कौन थे? क्या बच्चे कभी घर से बाहर नहीं निकले? वे कहां गए? उन्हें गल्ले के लिए पैसा कैसे मिलता था?
किसी स्थानीय बैंक के खाते से तो नहीं मिलता रहा होगा? बिजली और पानी के बिल कौन चुकाता था? नकद या चेक से भुगतान किया जाता था? ओसामा गुर्दे की बीमारी का मरीज था, जैसा कि परवेज मुशर्रफ ने 2002 में पुष्टि की थी. उसने इलाज कैसे कराया? यह बमुश्किल कोई लंबी सूची है पर यह साबित करने के लिए काफी है कि सत्ता में से किसी ने, बहुत मुमकिन है कि आइएसआइ ने ओसामा को सहायता और संरक्षण दिया होगा. अमेरिका के पास इस्लामाबाद पर भरोसा न करने की सैकड़ों वजहें हैं, और इससे निकट भविष्य में संबंध बिगड़ जाएंगे.
ओसामा को मार गिराने से पहले तक बराक ओबामा महज राष्ट्रपति थे; अब वे अपने देश के नेता बन गए हैं. उन्होंने शांति के लिए नोबेल पुरस्कार को जायज ठहरा दिया है, जिसे उन्होंने बड़ी बेवकूफी के साथ तब ले लिया जब उन्होंने इसे हासिल करने के लिए कुछ नहीं किया था. लेकिन जीत से गलती करने की उतनी ही गुंजाइश पैदा हो जाती है जितनी हार से.
ओसामा समस्या का सबसे ज्यादा सड़नवाला प्रतीक मात्र था और वह समस्या पिछले दशक में बढ़ गई. असली खतरा व्यक्ति विशेष या समूहों से नहीं बल्कि उस विचारधारा से है जिसने पाकिस्तान और अफगानिस्तान में गहरी पैठ जमा ली है, और वह तालिबान जैसी पार्टियों के रूप में सामने आ रही हैः धर्मतंत्र की एक मध्ययुगीन व्याख्या, जिसके जरिए काबुल और इस्लामाबाद दोनों जगह सत्ता हथियाने की कोशिश की जा रही है और आसपास के इलाकों को दूषित करने की कोशिश की जा रही है.
ओबामा को अपने दोस्तों को उतने ही ध्यान से चुनना चाहिए जितना ध्यान से उन्होंने अपने दुश्मनों को चुना है.

