scorecardresearch
डार्क मोड

अयोध्या: आस्था पर भारी रहा विकास

गोवा में कैथलिक ईसाई भाजपा को जीता देते हैं वहीं मंदिर आंदोलन के केंद्र में पार्टी हार जाती है.

अपडेटेड 2 अप्रैल , 2012

भगवान राम की नगरी अयोध्या में इस बार भाजपा की धूनी नहीं रमी, तो इसकी खास वजह रही कि पिछले 20 साल में उसने राम-नाम पर सियासत तो खूब की, लेकिन कभी गीता के ज्ञान को आत्मसात कर वह 'कर्म' नहीं किया, जिसके लिए लोग अपना जनप्रतिनिधि चुनते हैं. भाजपा को उसका फल भी मिला और 1991 से लगातार राम के सहारे बेड़ा पार लगाने वाले लल्लू सिंह को 32 वर्षीय सपा उम्मीदवार पवन पांडेय ने धूल चटा दी.

यूपी में भाजपा भले खास प्रदर्शन नहीं कर पाई, लेकिन अयोध्या की हार पार्टी की कट्टर विचारधारा की सांकेतिक हार है. कभी भगवा पार्टी को मंदिर निर्माण के लिए एकमात्र आस के तौर पर देखने वाले लोगों ने मान लिया है कि यह एनडीए का नेतृत्व करने वाली भाजपा है, न कि मंदिर आंदोलन के लिए प्रतिबद्ध 1989 वाली पार्टी.

हैरत करने वाली बात यह भी है कि चुनाव में अयोध्या की जनता ने उस पार्टी के उम्मीदवार को जिताया है जिसके अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को राम मंदिर आंदोलन के दौरान साधु-संतों ने बाबर तक की उपाधि दी थी. यों चुनाव में अपना दुर्ग बचाए रखने के लिए इस बार भी भाजपा ने हरसंभव कोशिश की.

पार्टी के वरिष्ठ नेताओं राजनाथ सिंह और कलराज मिश्र की प्रदेश में घूमी जनक्रांति यात्राओं का भी बीते अक्तूबर के महीने में अयोध्या में समापन हुआ. लेकिन पवन पांडेय ने लल्लू सिंह को 5,430 मतों से हराकर अयोध्या की राजनीति में एक बड़े बदलाव की नींव रख दी.

इस हार ने भाजपा के अंदर मची धमाचौकड़ी को भी सतह पर ला दिया है. अयोध्या में एक किन्नर प्रत्याशी के मैदान में उतरने को भी लल्लू सिंह की हार का कारण बताया जा रहा है. दिल्ली निवासी गुलशन बिंदु नाम के इस किन्नर को 22,000 से ज्यादा मत मिले. लल्लू सिंह कहते हैं कि गुलशन ने भाजपा को मिलने वाले वोटों को काटा है.

'शतदर्शन अखाड़ा परिषद' के महंत ज्ञानदास भी भाजपा की हार की वजह भीतरघात बताते हैं. वे कहते हैं, ‘विनय कटियार और विश्व हिंदू परिषद के लोगों ने अंदर ही अंदर लल्लू का विरोध किया जो हार का कारण बना. ‘हालांकि विनय कटियार इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं.

वहीं दूसरी ओर अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता शरद शर्मा कहते हैं कि इस बार जब चुनाव हो रहा था तो बड़ी संख्या में साधु-संत माघ मेला में भाग लेने प्रयाग गए हुए थे, जिससे ये लोग भाजपा के पक्ष में  सक्रियता से नहीं उतर पाए. वे परिसीमन में भाजपा के परंपरागत वोट बैंक वाले इलाके कटने की भी दलील देते हैं.

अब भले भाजपा अपनी हार की कई वजहें गिनाए, लेकिन उसे इस कठोर सच को कबूलना होगा ही कि मतदाताओं की सोच बदल गई है. इसकी एक बड़ी मिसाल गोवा है, जहां ईसाईबहुल क्षेत्र में भाजपा अपने बूते चुनाव जीत लेती है, लेकिन अयोध्या जैसी हिंदुत्व की कथित प्रयोगशाला में नकार दी जाती है.

जाहिर है, बीते बीस वर्षों में अयोध्या में विकास की गति काफी धीमी रही है. मंदिरों के आसपास गंदगी और अव्यवस्था से संत समाज में रोष था. वैदेही वल्लभशरण बावन मंदिर के उपमहंत बल्लू महाराज बताते हैं कि संतों ने इस बार उसी पार्टी का समर्थन किया जिसने विकास का वादा किया था.

बीते 30 वर्षों से अनवरत राम कथा बांचने वाले रामशरण दास बताते हैं, ‘अयोध्या में सीवर की समस्या जस की तस है. राम की पौड़ी के घाट के पानी में सीवर का पानी गिरता है जिससे लोगों को बदबू के बीच नहाना पड़ता है.’ महंत ज्ञानदास तो बेबाक कहते हैं, ‘अयोध्या का संत समाज अब झूठे वायदे नहीं बल्कि विकास चाहता है इसीलिए उसने बदलाव के लिए समाजवादी पार्टी का समर्थन किया है.’

असल में भाजपा इस बार भी इसी मुगालते में थी कि हिंदुत्व का कार्ड कम-से-कम अयोध्या में उसकी नैया पार लगा देगा. इस बार चुनाव में बड़ी तादाद में उन युवा वोटरों ने हिस्सा लिया जिनका जन्म राममंदिर आंदोलन के वक्त हुआ, लेकिन परवरिश उदारीकरण के दौर में हुई.1989 में लल्लू सिंह को अयोध्या विधानसभा चुनाव  में हराने वाले पवन पांडेय के मामा और जिला समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष जयशंकर पांडेय बताते हैं कि भाजपा हर बार चुनाव में यह प्रचार करती थी कि यदि वह हार गई तो राम हार जाएंगे लेकिन इस बार चुनाव में जनता भाजपा के झांसे में नहीं आई.

अयोध्या में पवन पांडेय को उस वक्त भी खासा प्रचार मिला जब चुनाव आयोग ने बीते जनवरी माह में उनकी शादी के खर्चे को चुनाव के खर्च में जोडऩे का फरमान सुना दिया. इसके बाद पवन को काफी सादगी से अपनी शादी का आयोजन करना पड़ा. शादी के बाद पवन को अपने चुनाव प्रचार में पत्नी का सहयोग मिला और उन्होंने मुंह दिखाई की रस्म की एवज में पति के लिए वोट मांगे.

पवन बताते हैं कि चुनाव में उन्होंने मुख्य रूप से विकास को ही मुद्दा बनाया. वे कहते हैं, ‘फैजाबाद बड़ा शहर है लेकिन यह अभी तक महानगर पालिका नहीं बन पाया है, यहां पर उद्योग नहीं है, कालेजों की संख्या काफी कम है, इन्हीं सभी मुद्दों ने जनता का भरोसा जीता और 20 साल बाद सपा की जीत हुई.’

भाजपा के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह अयोध्या में पार्टी के हार के कारणों की समीक्षा की बात कर रहे हैं, लेकिन अगर भाजपा ने वक्त रहते अयोध्या में आस्था के साथ-साथ विकास को अधिक तरजीह दी होती, जिसे भाजपा के मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं, तो शायद नतीजे कुछ और होते.

ADVERTISEMENT
Advertisement