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डार्क मोड

दिल्ली विश्वविद्यालय: छात्रों की रहती है भविष्य पर नजर

ई-लर्निंग पोर्टल. चुनिंदा विश्वविद्यालयों के साथ संयुक्त डिग्री कोर्स. मिक्स ऐंड मैच कोर्स. यह हैरानी की बात नहीं कि सारी राहें दिल्ली का ही रुख करती हैं.

अपडेटेड 23 मई , 2012

भगत सिंह यहीं कैद थे, गांधी-इर्विन समझौते पर पड़ोस के कमरे में हस्ताक्षर किए गए और बाहर के गार्डन में ही लॉर्ड माउंटबेटन ने एडविना से शादी का प्रस्ताव रखा था. कभी वायसराय का निवास रहे अपने ऑफिस के बारे में बताते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति (वीसी) दिनेश सिंह जोश भरे लहजे में कहते हैं, ''आप इतिहास में खड़े हैं.''

जियोलॉजी और जूलॉजी के 20 रिसर्च स्कॉलर्स का एक समूह सारी बातें बेसब्री से सुन रहा है. उन्हें अपनी लैबोरेटरी से छुट्टी मिली है. इस छुट्टी में उन्हें काजू की बर्फी, कॉफी और दिनेश सिंह के साथ बातचीत का मौका मिला है, जिसकी उन्हें उम्मीद नहीं थी. परंपरागत रूप से, कुलपति छात्रों से थोड़ा दूर ही रहते हैं, और योजना और प्रशासन पर ज्‍यादा ध्यान देते हैं. कुलपति की कोशिश है कि डीन और विभाग प्रमुख छात्रों की पहुंच में रहें.Delhi university

दिल्ली विश्वविद्यालय उस राजधानी के साथ पूरी तरह तालमेल बनाए हुए है, जिसमें वह है. क्लास नोट्स और पीढ़ियों से चली आ रही फोटोकॉपियों पर निर्भर रहने की बजाए आज छात्र सिर्फ एक माउस क्लिक करके 12 पाठ्यक्रमों के पहले से रिकॉर्डेड लेक्चर्स यूनिवर्सिटी के ई-लर्निंग पोर्टल से हासिल कर सकते हैं. जुलाई तक और भी ज्‍यादा कोर्सेज, ई-लेसंस, वर्चुअल प्रयोग लैब्स और ई-क्विजेज भी उपलब्ध हो जाएंगे.

गणितज्ञ दिनेश सिंह कहते हैं, ''2019 में सेवानिवृत्त होने से पहले मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि डीयू के हर कॉलेज में हरेक क्लासरूम में एक एलसीडी प्रोजेक्टर लगा हो, और एक लैपटॉप हो. हमारे पास शानदार फैकल्टी है और मैं चाहता हूं कि छात्र सिर्फ एक क्लास में बैठकर इस यूनिवर्सिटी की विविधता का उपयोग करने में सक्षम हों. उस समय की कल्पना कीजिए, जब मिरांडा हाउस में अंग्रेजी की कोई छात्रा लेडी श्रीराम में साहित्य पर दिया जा रहा लेक्चर सुन सकेगी.'' दिनेश सिंह पिछले 20 साल से दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे हैं.

इस तकनीकी कायाकल्प के मर्म में है-एडवांस्ड इन्फॉर्मेशन और कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी (आइसीटी) नेटवर्क, जिसकी स्थापना 2012 में 56 कॉलेज परिसरों में की गई थी. आइसीटी की शुरुआत सूचना प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा दिए गए 3.85 करोड़ रु. के अनुदान से हुई थी. इस परियोजना का लक्ष्य भौगोलिक सीमाओं के आर-पार डीयू के तहत सभी 77 कॉलेजों को पहली बार एक सुपरफास्ट इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क के माध्यम से कनेक्ट करना है.Delhi University

इस प्रणाली के लाभ अभी से ही नॉर्थ और साउथ कैंपस में देखे जा सकते हैं, जहां नेटवर्क ने किताबों, पत्रिकाओं, सूचनाओं और निजी ई-मेल्स को एक साथ जोड़ दिया है. इसके बाद जल्द ही लाइव लेक्चर स्ट्रीमिंग, ऑनलाइन एसेसमेंट, ऑनलाइन रिपोर्ट कार्ड और डिजिटल डिसप्ले बोर्ड भी इसमें शामिल किए जाएंगे.

डीयू में जो कुछ नया हो रहा है, उसमें टेक्नोलॉजी अकेली नहीं है. कुलपति का इरादा मौजूदा पाठ्यक्रम संरचना में भी क्रांतिकारी बदलाव लाने का है. उनकी 'मेटा-कॉलेज' अवधारणा भारत में अपने किस्म की सबसे पहली होगी. वह ऐसे समय की कल्पना करते हैं, जब डीयू के छात्र विश्वविद्यालय के भीतर किसी भी कॉलेज में अपने कोर्सेज का चयन खुद करने में सक्षम होंगे. यह विश्वविद्यालय भी भारत में केवल एक ही होगा, जिसमें छात्र एक ही डिग्री में अलग-अलग डिसिप्लिन की फील्ड्स मिक्स और मैच करने में सक्षम होंगे.

दिनेश सिंह कहते हैं, ''छात्रों पर प्रतिबंध और पूर्व निर्धारित कोर्स क्यों थोपे जाने चाहिए? हम सब में एक आंतरिक तरंग होती है, जिसे सुनना और उसके साथ तालमेल से आगे बढ़ना हमें सीखना चाहिए. मैं चाहता हूं कि मेरे छात्र अपने दिल की सच्ची आवाज सुनने में सक्षम बनें. यदि गणित का एक छात्र साथ में पियानो सीखना चाहता है, तो ऐसा होने दीजिए. यह उसके लिए जीवन और शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति करने में मदद ही करेगा.''

डीयू के क्लस्टर इनोवेशन केंद्र के तहत मेटा-कॉलेज अवधारणा को अपनाने वाला पहला कोर्स 2012-13 में ह्यूमेनिटीज में बी.टेक का होगा. इस कोर्स को चुनने वाले सभी छात्र अध्ययन और शोध का अपना रास्ता खुद निर्धारित कर सकेंगे.

दिनेश सिंह कहते हैं, ''बहुत से लोगों को ह्यूमेनिटीज में बी.टेक उलटबांसी लगती है. अगर ऐसा है, तो मुझे बताइए कि विज्ञान में डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी (पीएचडी) की क्या तुक है? हमें दी गई स्थिति पर सवाल खड़े करना और अपने मन में विचारों को उलटना-पलटना सीखना चाहिए. मैं चाहता हूं कि छात्र इस विश्वविद्यालय से सोचने का चुनौतीपूर्ण और गतिशील अंदाज लेकर निकलें.''

कुलपति अन्य विश्वविद्यालयों के साथ सहयोग को लेकर भी बहुत उम्मीदें लगाए बैठे हैं, जिसमें डीयू के छात्र विश्वविद्यालय के बाहर अध्ययन कर सकते हैं. इसमें किसी छात्र को डीयू में किसी डिग्री के लिए अध्ययन करते हुए ही आइआइटी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) या अपने पसंद के किसी भी दूसरे विश्वविद्यालय से कोई कोर्स करने की अनुमति होगी.

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के साथ एक संयुक्त डिग्री (गणित शिक्षा में एमए) शुरू की गई है और आइआइटी-दिल्ली, जामिया और जेएनयू के साथ स्वास्थ्य शिक्षा में एक डिग्री को लेकर काम चल रहा है.

मौजूदा कोर्स संरचना में महत्वाकांक्षी परिवर्तन के इरादे से 2013 में चार वर्षीय ग्रेजुएट डिग्री भी शुरू की जा रही है. इस डिग्री में छात्रों को एक दो-वर्षीय पाठ्यक्रम (एसोसिएट डिग्री), एक तीन वर्षीय पाठ्यक्रम (बैचलर डिग्री) या एक चार वर्षीय (ऑनर्स डिग्री) चुनने की छूट होगी. तीसरे वर्ष के छात्रों के पास यह भी विकल्प होगा कि वे 10 साल के भीतर वापस लौट कर ऑनर्स डिग्री पूरी कर सकेंगे.

गार्गी कॉलेज से अंग्रेजी में बीए करने वाली 25 वर्षीया कीर्ति माथुर कहती हैं, ''मैं इसका इंतजार कर रही हूं. सोलह साल की शिक्षा का मतलब है कि छात्र एक अतिरिक्त वर्ष के लिए कहीं और पढ़े बिना ही पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए अमेरिकी विश्वविद्यालयों में आवेदन कर सकेंगे. और तीसरे साल में कॉलेज से निकल सकने से उन लोगों को सुविधा हो जाएगी जो देश में आगे अध्ययन करना चाहते हैं या तुरंत रोजगार चाहते हैं. काश इसे पहले लागू कर दिया गया होता.''

परियोजनाएं, सेमिनार और उस ढंग के रिसर्च प्रोजेक्ट, जो पहले किसी ने सोचे न हों-तेजी से विश्वविद्यालय के एजेंडे में शामिल होते जा रहे हैं. बाहरी माहौल के साथ ऐसे परस्पर संवाद वाले तजुर्बे वास्तव में कक्षा के अनुभव को मजबूत बनाने में मददगार होते हैं. इसी इरादे से विश्वविद्यालय ने 'अंडरस्टैंडिंग इंडिया' नाम से पायलट परियोजना शुरू की है. इस परियोजना के तहत 1,000 छात्रों को रेल के सफर पर देश भर में ले जाया जाएगा, जिससे उन्हें भारत का अध्ययन करने का एक ऐसा दुर्लभ मौका मिलेगा, जो पहले कभी नहीं मिला होगा. कुलपति दिनेश सिंह कहते हैं, ''ट्रेन का नाम दिल्ली विश्वविद्यालय ज्ञानोदय एक्सप्रेस या 'ज्ञान का डॉन' होगा.

पूरी ट्रेन छात्रों और फैकल्टी के 30 सदस्यों के लिए आरक्षित होगी. वे सबसे पहले महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम और गुजरात विद्यापीठ जाएंगे. इसके बाद वे मुंबई में आइएनएस विक्रांत की यात्रा करेंगे. इसके बाद वे गोवा नौसैनिक गोदी, बंगलुरू में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और वर्धा में गांधी आश्रम की यात्रा करेंगे.

दिनेश सिंह कहते हैं, ''यह एक सांस्कृतिक अनुभूति होगी. वे लोग शोध करेंगे कि ट्रेनें कैसे काम करती हैं, वे विभिन्न रेलवे स्टेशनों में सुधार के लिए सुझाव देंगे और जीवन के विविध तरीकों का अनुभव करेंगे.'' यह यात्रा इस साल जुलाई में विश्वविद्यालय की छुट्टियों से शुरू होगी. अभी से ही प्रिंसटन, कोलंबिया और मेरीलैंड जैसे विदेशी विश्वविद्यालयों ने इसमें रुचि दिखाई है. ट्रेन भारतीय रेलवे द्वारा उपलब्ध कराई जा रही है और इसका खर्च उठाने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा एक फंड स्थापित किया गया है.

सेंट स्टीफंस कॉलेज से 1983 में इतिहास से ग्रेजुएशन करने वाले 54 वर्षीय फैशन डिजाइनर रोहित बल कहते हैं, ''वे कमाल के दिन थे. घास के हरे-भरे बगीचों में हम लोग सुस्ताते रहते थे. हमारे साथ प्रोफेसरों की एक गंभीर और समर्पित टीम होती थी और वे हमारे सबसे अच्छे दोस्त भी हुआ करते थे. और क्लास के बाद चाय, गुलाब जामुन, अंडे की भुर्जी और ऑमलेट मुंह में भरकर हल्की-फुल्की बौद्धिक चर्चा के लंबे सत्र चलते थे. मेरे जीवन के सबसे अच्छे दिन डीयू में ही गुजरे थे.'

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