मनोज यादव बीती 14 जनवरी को बिहार में नवादा जिले के सदर पुलिस थाने में हिरासत में था. इस 28 वर्षीय युवक के पिता दयानंद यादव जब उससे मिलने पहुंचे तो वह रो रहा था. पुलिस ने मनोज को इतनी यातना दी कि वह दर्द से बिलबिला रहा था. यहां तक कि उसके पिता उसके लिए घर का बना जो खाना लाए थे, वह उसे भी नहीं खा पा रहा था. अगले दिन, मनोज की लाश सुनसान मैदान में पड़ी मिली. उसका मुंह खुला हुआ था और उससे ढेर सारी लार निकली हुई थी.
मनोज का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था, लेकिन पुलिस ने उसे दूसरी बार गिरफ्तार किया था. नवंबर, 2011 में उसे एक ऐसे बिजनेसमैन का मोबाइल इस्तेमाल करने पर पकड़ा गया था, जिसकी हत्या हो चुकी थी. हालांकि मनोज को वह मोबाइल सड़क पर लावारिस पड़ा मिला था.
पुलिस ने उसे पूछताछ के बाद बेकसूर पाए जाने पर रिहा किया, लेकिन हत्या के इस मामले को सुलझाने का दबाव बढ़ने पर, 11 जनवरी को पुलिस ने मनोज को फिर गिरफ्तार कर लिया. इस बार पुलिस ने कुछ कबूलवाने के लिए उसे बुरी तरह मारा-पीटा, जिससे अंततः उसकी मौत हो गई.![]()
उसकी 25 वर्षीया विधवा और तीन बच्चों की मां रीना देवी कहती हैं, ‘मेरे पति इतने नादान थे कि वे किसी और का मोबाइल इस्तेमाल कर बैठे और इस गलती के लिए उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. अब हम लोग अपनी जिंदगी कैसे काटेंगे?’ इस घटना पर हंगामा मच गया और पुलिस को मजबूरन पांच पुलिसवालों के खिलाफ एफआइआर दर्ज करनी पड़ी.
नवादा के पुलिस अधीक्षक सुरेंद्र लाल दास दावा करते हैं कि मनोज को कभी गिरफ्तार नहीं किया गया, लेकिन वे इस बात का कोई जवाब नहीं दे पाये कि फिर इस मामले में पुलिसवालों के खिलाफ एफआइआर दर्ज क्यों की गई.
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने देशभर में अप्रैल, 2010 से 31 मार्च, 2011 के बीच हिरासत में हुई मौत के 1,574 मामले दर्ज किए यानी रोजाना चार मौत 'ईं. इस संख्या में पुलिस हिरासत भी शामिल है और न्यायिक हिरासत भी. 331 मौत के साथ उत्तर प्रदेश प्रथम स्थान पर है, दूसरे स्थान पर बिहार (136 मौत) और उसके ठीक बाद महाराष्ट्र (130 मौत) है. इस तरह देशभर में हिरासत में होने वाली मौत में से 37 फीसदी मौत इन तीन राज्यों में 'ईं.
अदालत में पेश किए जाने के पहले किसी संदिग्ध को हवालात में रखा जाता है, और उसे उन लोगों की तरह कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं होता है, जैसा न्यायिक हिरासत में बंद लोगों को या जेल में बंद लोगों को प्राप्त होता है. कानून कहता है कि किसी भी व्यक्ति को 24 घंटे से ज्यादा हिरासत में नहीं रखा जा सकता है. लेकिन पुलिस रिकॉर्ड में गिरफ्तारी दिखाए जाने के पहले का समय इसमें शामिल नहीं होता है. पुलिस हिरासत का समय तब से शुरू होता है, जब अदालत इसकी अनुमति देती है, न कि तब से जब अभियुक्त को पकड़ा जाता है और यही कारण है कि नवादा की पुलिस मनोज को गिरफ्तार करने की बात से इनकार कर रही है.
बिहार मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस (रिटायर्ड) एस.एन. झा कहते हैं, ‘पुलिस का गठन मानवाधिकारों की रक्षा के लिए किया गया था. पर पुलिस ही जब इसका उल्लंघन करेगी, तो जनता को संरक्षण कहां से मिलेगा? वे कई बार अभियुक्त को गिरफ्तार करने के 24 घंटे के भीतर अदालत में पेश नहीं करते. हवालात जनता की निगाह से परे होती है और कोई नहीं जानता कि वहां क्या होता है.’
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मुताबिक, अप्रैल, 2010 से दिसंबर, 2010 के बीच हिरासत में मौत के 1,321 मामले गृह मंत्रालय में दर्ज हैं. रिपोर्ट के अनुसार एनएचआरसी की जांच शाखा पुलिस हिरासत में हुई 88 मौत की जांच कर चुकी है. गृह मंत्रालय के तहत आने वाले नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों को देश में अपराधों का सबसे प्रामाणिक रिकॉर्ड माना जाता है. एनसीआरबी के मुताबिक, पुलिस हिरासत में सिर्फ 72 मौत के मामले दर्ज किए गए हैं. इस विसंगति को स्पष्ट करते हुए एक वरिष्ठ आइपीएस अधिकारी बताते हैं कि हिरासत में मौत के सारे मामलों की सूचना पुलिस एनएचआरसी को देती है, इसी कारण गृह मंत्रालय की रिपोर्ट में संख्या ज्यादा है. इनमें से कुछ ही मामलों को एनसीआरबी को भेजा जाता है.
एनसीआरबी की रिपोर्ट पुलिसिया यातना को छिपाने की जान-बूझ्कर की गई कोशिश नजर आती है. एक नमूना देखिएः हिरासत में मौत के कारणों के बारे में एनसीआरबी की तालिका में हवालात में दी गई यातना का कोई जिक्र ही नहीं है. इसकी बजाए उसमें ऐसी एंट्री की गई हैं, जैसे-अस्पताल में भर्ती कराए जाने के दौरान मौत, दूसरे अपराधियों की ओर से किया गया हमला, भीड़ के हमले/दंगे के दौरान मौत, आत्महत्या या फरार होने की कोशिश के दौरान मौत.
पुलिस की ओर से किए गए मानवाधिकारों के उल्लंघन पर एनसीआरबी की एक और तालिका बताती है कि 2010 के दौरान पूरे देश में पुलिसिया यातना का मात्र एक मामला हुआ है. यह वही वर्ष है, जब एनएचआरसी ने हिरासत में 1,321 मौत के मामले दर्ज किए हैं. कई मामलों में पुलिस दावा करती है कि पीड़ित ने 'आत्महत्या' कर ली है.
सितंबर, 2011 में गुजरात के वीरमगाम पुलिस थाने में 37 वर्ष के दशरथजी ठाकोर ने अपहरण के एक मामले में गिरफ्तार किए जाने के तीन घंटे के भीतर अपने जूतों के फीतों से आत्महत्या कर ली. 13 जनवरी को एक संदिग्ध नक्सली पुदियामी मादा ने छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा के सुकमा पुलिस थाने में 'आत्महत्या' कर ली. हालांकि मेडिकल रिपोर्ट्स में उसके गुप्तांगों में खरोंच की पुष्टि हुई है. पुलिस को रोकने वाला कोई नहीं है. पीड़ितों के रिश्तेदारों या मानवाधिकार गुटों ने हवालात में कथित हत्या की शिकायत की है पर उनमें नाममात्र का ही दोष साबित हुआ है.
सुप्रीम कोर्ट का नवंबर, 2011 का फैसला आंखें खोल देने वाला है, जिसमें अदालत ने पंजाब पुलिस के चार पूर्व अधिकारियों-डीएसपी जसपाल सिंह, हेड कांस्टेबल पृथपाल सिंह और दो सब इंस्पेक्टर सतनाम सिंह और जसबीर सिंह-को सुनाई गई उम्र कैद की सजा को बरकरार रखा था. इन चारों पुलिसवालों को 1995 में मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा का अपहरण और हत्या करने के मामले में दोषी पाया गया था. मानवाधिकारों के मामलों में बढ़ती हुई जागरूकता ने हिरासत में मौतों के मामलों को बहस के केंद्र में ला दिया है. लेकिन इससे प्रणाली में कोई सुधार नहीं हुआ है.

