''मैंने और मेरे भाइयों ने 22 सालों तक एक पहाड़ को छीलकर गांव की 100 एकड़ खेती को सिंचाई के लिए पानी पहुंचाया ताकि सरकार समझ सके कि इस तरीके से भी सूखे खेतों में पानी पहुंचाया जा सकता है. मुझे इतना वक्त लगा क्योंकि मेरे पास लोग नहीं थे, संसाधन नहीं थे. लेकिन सरकार के पास ना तो लोगों की कमी है और ना संसाधनों की फिर उस योजना को क्यों आगे नहीं बढ़ाया गया?''
ओडिशा के क्योंझर जिले के तालाबाइतरानी गांव के किसान दैतारी नायक यह सवाल कई प्रशासनिक अधिकारियों के सामने उठा चुके हैं. दरअसल यह वही दैयतारी नायक हैं जिनका जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी 'मन की बात' में कर चुके हैं. कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा था, ''ओडिशा के इस कैनाल मैन के बारे में आपको जरूर जानना चाहिए जिसने पहाड़ को काटकर तीन किलोमीटर की कैनाल बनाकर अपने गांव के सूखे खेतों को पानी पहुंचाया.''
दैतारी के इसी काम को सम्मान देते हुए उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया. दैयतारी कहते हैं, '' मुझे लगा था कि यह कैनाल मिसाल बनेगी, सरकार अब इस कैनाल को पूरे गांव तक ही नहीं आसपास के गांवों तक भी पहुंचाएगी. लेकिन यह काम तो मैंने जहां छोड़ा था वहीं ठप पड़ा है.'' वे कहते हैं कि यहां तक कि मैंने कई बार प्रशासन का दरवाजा खटखटाया कि इस कैनाल के किनारों को कंकरीट का करवा दिया जाए मगर किसी ने नहीं सुना.
दैतारी नायक से यह पूछने पर कि क्या वे आजकल भुखमरी की स्थिति से गुजर रहे हैं? क्या वे चीटियों के अंडे खाकर बसर कर रहे हैं? वे कहते हैं, '' यह खबर बिल्कुल झूठ है. हां हम बहुत संपन्न नहीं हैं. हम रोज मलाई भी नहीं खाते लेकिन दालभात खाने भर की मेहनत कर लेते हैं. उनके बेहद करीबी कृष्ण चरन मोहंती चीटियों के अंडो के सवाल पर बौखला जाते हैं, वे कहते हैं, '' 50-100 साल पहले भुइया समुदाय (एक आदिवासी प्रजाति) के लोग इसे खाते थे.
लेकिन अब इसे कोई नहीं खाता. सनसनी फैलाने के लिए पत्रकार कुछ भी मनगढ़ंत लिख देते हैं.'' दैयतारी कहते हैं, '' मैंने भी सुना कि खबर छप रही है कि मैं पद्मश्री वापस कर रहा हूं, चीटियों के अंडे खा रहा हूं. तो सिवाए एक अखबार बेचने वाले के मेरे पास कोई नहीं आया. उसने खुद मुझे सलाह दी कि आपका घर इतना खराब है. आप लोग गरीब हैं. तो फिर इस पद्मश्री को रखने का क्या फायदा इसे वापस कर दें.''
वे जोर देकर कहते हैं, मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा. पर हां,'' ना तो केंद्र और नाहीं पटनायक सरकार, किसी ने भी मेरी सालों की मेहनत को आगे बढ़ाने के लिए कोई कदम उठाया. मेरे गांव में न तो डिजिटल क्रांति हुई और न जमीन पर विकास ही उतरा. कृष्णा मोहंती कहते हैं, पत्रकारों को जनता और सरकार के बीच एक पुल का काम करना चाहिए, मगर अब तो पत्रकार गांव हमारी दशा जानकर उसे सरकार तक पहुंचाने के लिए नहीं बल्कि सनसनी खोजने आते हैं. सनसनी खोजते-खोजते वे गांव के कर्मठ और भोले-भाले लोगों का मजाक तक बनाने से नहीं चूकते.
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