उन्नाव के असोहा गांव में दलित युवतियों की जहर खाने से हुई मौत के बाद भीम आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर ने युवतियों के परिजनों से मिलने के लिए 22 फरवरी को उन्नाव आने की घोषणा की थी. इसके बाद से उन्नाव के असोहा गांव के बाहर पुलिस का कड़ा पहरा लगा दिया गया था. भीम आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के गांव पहुंचने और पीड़ित परिजनों से मिलने की सूचना पर पुलिस बल के अलर्ट होने के बाद भी युवती के परिजन चकमा देकर गांव से निकल गए. लखनऊ-कानपुर हाइवे पर सोहरामऊ कस्बा स्थित एक ढाबा में परिजनों ने चंद्रशेखर से मुलाकात की. परिजनों से मिलने के बाद भीम आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने सरकार पर निशाना साधते हुए पुलिस खुलासे को फर्जी बता सीबीआई जांच की मांग की और कानपुर में भर्ती किशोरी से मिलने की बात कह हाइवे के रास्ते निकल गए. इससे पहले पिछले वर्ष सितंबर में चंद्रशेखर हाथरस में गैंगरेप पीड़ित युवती से मिलने पुलिस को चकमा देकर अलीगढ़ मेडिकल कॉलेज पहुंच गए थे. भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद 27 सितंबर को अलीगढ़ के जे.एन. मेडिकल कॉलेज पहुंचकर यहां इलाज करा रही रेप की शिकार युवती के परिजनों से मिले थे. चंद्रशेखर की पहल पर ही परिजन युवती को दिल्ली के सफदरगंज अस्पताल रेफर करवाने को राजी हुए थे. पिछले एक वर्ष से भीम आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर की सक्रियता के कारण टाइम मैगजीन ने उन्हें उभरते हुए नेताओं की सूची में शामिल किया है. टाइम मैगजीन ने ताजा अंक में उभरते हुए 100 नेताओं की सूची में भारतीय मूल के पांच व्यक्तियों को भी शामिल किया है. इनमें ट्विटर की वकील विजया गड्डे और ब्रिटेन के वित्त मंत्री ऋषि सुनक शामिल है. इसके साथ ही भीम आर्मी के प्रमुख और आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर को भी शामिल किया है. इससे पहले पश्चिमी यूपी में हापुड़ के कुराना गांव निवासी बिलकिस दादी दिल्ली में शाहीन बाग के प्रदर्शन को लेकर टाइम मैगजीन में नाम दर्ज करा चुकी हैं.
छोटे से कस्बे सहारनपुर के छुटमलपुर गांव से टाइम मैगजीन में छाने वाले चंद्रशेखर के सियासी सफरनामे को अभी केवल सात साल हुए हैं. 21 जुलाई 2014 को चंद्रशेखर ने सहारनपुर के छुटमुलपुर गांव में भीम आर्मी का गठन किया था. दो साल तक भीम आर्मी की कोई खास चर्चा नहीं हुईं. अप्रैल 2016 में गागलहेड़ी क्षेत्र के गांव घड़कौली में एक जाति सूचक बोर्ड को लेकर माहौल गरमा गया. इसमें पहली बार भीम आर्मी चर्चा में आई. पांच मई 2017 को बड़गांव क्षेत्र के शब्बीरपुर गांव में जातीय हिंसा हुई. हिंसा के बाद भीम आर्मी ने नौ मई, 2017 को गांधी पार्क को महापंचायत का ऐलान किया था. प्रशासन ने कार्यकर्ताओं को गांधी पार्क से खदेड़ दिया था. इसके बाद जिलेभर में बवाल हुआ था. पुलिस ने चंद्रशेखर को आठ जुलाई 2017 को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. साथ ही उन पर रासुका लगा दिया था.
चंद्रशेखर 14 सितंबर 2018 को आधी रात को रिहा किए गए. उसके बाद तो दलित वर्ग में चंद्रशेखर की पैठ हो गई. सहारनपुर के वरिष्ठ वकील राम प्रताप कहते हैं, “बहुजन समाज पार्टी में इस वक्त युवा दलित नेताओं का अकाल हो गया है. पश्चिमी यूपी में दलितों के बीच पकड़ रखने वाली मायावती ने वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद इस वर्ग से दूरी बना ली है. दलितों के बीच राजनीतिक शून्यता को भरने की कोशिश चंद्रशेखर कर रहे हैं.” पश्चिमी यूपी में दलितो के बीच पैठ बनाने के लिए चंद्रशेखर ने बसपा के संस्थापक कांशीराम के जन्मदिवस 15 मार्च, 2020 को अपनी नई पार्टी “आजाद सामाज पार्टी” की घोषणा की थी. दलित चिंतक डॉ. रमेश आंबेडकर बताते हैं, “जिस तरह से चंद्रशेखर ने अपनी नई पार्टी का ऐलान कांशीराम के जन्मदिवस पर किया इससे जाहिर होता है कि वह बसपा का विकल्प बनने की मंशा रखता है.” पिछले एक वर्ष में आजाद समाज पार्टी ने मेरठ और सहारनपुर मंडल के सभी जिलों में जिले से लेकर विधानसभा क्षेत्र तक अपना संगठन खड़ा कर लिया है. चंद्रशेखर के सहयोगी रमेश कुमार बताते हैं, “आजाद समाज पार्टी वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में पूरी ताकत से उतरेगी. इससे पहले पार्टी यूपी के पंचायत चुनावों में भी हिस्सा लेगी.”
पश्चिमी यूपी में दलित वोट भी बसपा से खिसकते दिखाई दे रहे हैं. पिछले वर्ष नवंबर में बुलंदशहर सदर के उपचुनाव नतीजों ने दलित मतदाताओं के बीच बसपा की लगातार ढीली होती पकड़ की ओर भी इशारा किया है. बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के समर्थक दलित वोटबैंक को भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद की “आजाद समाज पार्टी” (आसपा) से कड़ी चुनौती मिली. जनवरी, 2020 में गठन के बाद आसपा पहली बार चुनावी राजनीति में कूदी थी. बुलंदशहर उपचुनाव में बसपा भले ही दूसरे नंबर पर रही लेकिन आसपा दलित वोटों पर सेंध लगाकर तीसरे नंबर पर थी. आसपा के लिए खास बात यह भी रही कि बुलंदशहर विधानसभा उपचुनाव में इस पार्टी ने सपा-रालोद गठबंधन और कांग्रेस से अधिक वोट पाए. घाटमपुर सुरक्षित सीट पर दलित वोटों के बल पर अपनी जीत पक्की मानकर चल रही बसपा न केवल हारी बल्कि वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव की अपेक्षा इस बार एक पायदान और नीचे (तीसरे पायदान) पर पहुंच गई. चंद्रशेखर जिस तरह से दलितों में पैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं उससे कम से कम पश्चिमी यूपी की दलित राजनीति में एक नया केंद्र तैयार हो रहा है.
***

