मदरसा
मंजूर एहतेशाम
राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली-2,
कीमतः 350 रु.
कोई हड़बड़ी नहीं: मंजूर एहतेशाम
मंजूर एहतेशाम का उपन्यास मदरसा यद्यपि किसी बड़े मसले को अपनी किस्सागोई में सामने नहीं लाता लेकिन साबिर, मरियम, अलीगढ़ मामू और बान्नगी फूफू के अलावा जायदाद माफिया गनी मियां और सांसद इमरान आलम के भिन्न किरदारों की मौजूदगी से इस समय के छल-बल को यहां कहीं अधिक साफगोई से देखा और महसूस किया जा सकता है. यह और बात है कि मंजूर एहतेशाम के पिछले उपन्यास बशारत मंजिल ने कुछ चटख आदर्शवादी तेवर के साथ राष्ट्रभक्त मुसलमानों की गांधीवादी छवि दर्शाते हुए जिस तरह की किस्सागोई की बुनियाद रखी थी, मदरसा में यह किस्सागोई कुछ छिन्न-भिन्न हुई है. मद्धिम गति से उपन्यास को आगे बढ़ाते हुए मंजूर साब किसी हड़बड़ी में नहीं दिखते, बल्कि बंद दिमागों में चल रही कश्मकश को रेशा-दर-रेशा उधेड़ते चलते हैं. मुंबई, भोपाल, बरेली, अलीगढ़ के बीच आवाजाही करता हुआ यह उपन्यास जिन और कुछ किरदारों के भावभीने वृत्तांत से बुना गया है वह हैं नानीजान, परछाईं और आमिर.
सौतेलेपन का दंश व्यक्ति को किस कदर तन्हा और यतीम बना देता है, उसके मासूम सपनों पर वक्त के बूटों के निर्मम निशान किस तरह पड़ते हैं और किस तरह उसका एक मदरसा बनाने का ख्वाब .जमींदो.ज होता है, साबिर उसका निरीह पर्याय बन गया है. आखिर एक रोज साबिर पर यह राज खुलता है कि वह जिसे अपना पिता मानता है वे उसके सौतेले अब्बा हैं, जिनकी पहली बीबी से कई संतानें हैं. वह जायदाद में हिस्सा हासिल करने की मुहिम पर लगता है पर कामयाब नहीं होता.
उसकी तालीम भी अधूरी ही रह जाती है. वह अपनी जड़ों की तलाश में बरेली, अलीगढ़ और बान्नगी फूफू तक पहुंचता है और अलीगढ़ मामू से पता चलता है कि उसकी मां का निकाह उन्हीं की सहमति से बहुत पहले मां की उम्र से ड्योढ़ी उम्र के शख्स से हुआ. इस रिश्ते से उसकी नानीजान इस कदर खफा हुईं कि पाकिस्तान जा बसीं और अलीगढ़ मामू से रिश्ता तोड़ लिया.
क्रिकेट का श्ाौक रखने वाले और बाद में रंगाई-पुताई के काम में संलग्न साबिर के जीवन में यों तो तमाम लड़कियां आईं, अलका भी जो एक फिल्म प्रोड्यूसर की बेटी थी, पर उससे बात ज्यादा दिन बनी नहीं. आखिरकार संपन्न बेदी परिवार की जिस लड़की पिंकी से साबिर ने मुहब्बत की, उसने मरियम बन कर उसका दामन थामा, पर यह रिश्ता बहुत दिनों तक उसे मुसीबत में डाले रहा.
उससे पैदा बेटी जब तक सयानी और विवाह योग्य हुई, साबिर और मरियम के बीच का फासला बढ़ चुका था. लिहाजा साबिर और मरियम जीवन भर लगभग अपने-अपने अजनबी का जीवन जीते रहे. साबिर अंततः मदरसे की तामीर का ख्वाब लिए टेकरी में एक जमीन के टुकड़े की खातिर जिस तरह जद्दोजहद करता रहा, वह भी भूमाफियायों के चलते चकनाचूर हुआ.
इस उपन्यास का ताना-बाना बहुत जटिल नहीं है, पर इसके इंदराज कभी-कभी ऊब पैदा करते हैं. वृत्तांत में बहाव वैसा नहीं है जैसा मंजूर के पिछले उपन्यासों सूखा बरगद, दास्तान-ए-लापता और बशारत मंजिल में है. लिहाजा कभी-कभी इसके गद्य में आलस्य से चलते-फिरते किसी शख्स की-सी छाया नुमायां होती है.
अलीगढ़ मामू शेरो-शायरी के शौकीन हैं, फिल्मी गीतों के उद्धरण बात-बात में उनकी जुबान पर हाजिर रहते हैं तो मरियम से मनमुटाव होने के बाद साबिर गुलाम अली की शायरी और मदिरा के प्याले में शरण्य खोजता दिखता है. मदरसे की तामीर का सपना साबिर की नेकनीयती का ही सबूत है पर उसके अपने जीवन में ऐसे उच्चादर्शों की कहीं कोई ज्यादा शिनाख्त नहीं मिलती. जिस दमखम की दरकार साबिर से हम करते हैं वह उसमें न.जर नहीं आता. किसी मशाल में तब्दील होने की बजाए वह आद्यंत ऊहापोह में पड़ा रहता है.
यों देखा जाए तो साबिर का किरदार उस आम आदमी से बहुत मिलता-जुलता है जिसकी दुनिया में न रिश्ते काम आते हैं, न मैत्री. जिसका विश्वास डगमगाया हो, जिसकी बुनियाद ही यतीमी पर टिकी हो, जिसकी मां ने शौहर के रहते हुए ही एक बड़ी उम्र के शख्स से आशनाई कर रखी हो जो भले ही बाद में ब्याह में परिणत हुई हो, जो अपने बाप की परछाईं से मिलता-जुलता हुआ भी निरीह-सा अपने लिए एक अदद .जमीन का टुकड़ा खोजता हुआ अंत में 'हारे को हरिनाम' पर लौट आता हो-साबिर ऐसे थके-हारे शख्स की नुमाइंदगी करता प्रतीत होता है.
सवाल उठता है कि मंजूर साब इस उपन्यास के जरिए क्या कहना चाहते हैं? इसकी काट उपन्यास के ब्लर्ब में ही हैः किसी भी उम्दा रचना को लेकर यह कहना कभी संभव नहीं होता कि इसका उद्देश्य अमुक है...बल्कि वह हमारे ही जीवन का एक ज्यादा उजले प्रकाश में बुना गया चित्र होता है जिससे हम न जाने कितनी दिशाओं से रोशनी पाते हैं.'' शायद यही वजह है कि किस्सागोई की प्रचलित सरणि पर सरपट न दौड़ पाने और किसी व्यापक विमर्श से परे इस उपन्यास का औचित्य स्थापित करते हुए इसे समकालीन हिंदी उपन्यास के लय-ताल रहित परिदृश्य में एक सुखद हस्तक्षेप कहा गया है.
बिना किसी विमर्श की तयशुदा जुमलेबाजी में फंसे इस उपन्यास में एक जगह अमजद के साथ बातचीत में साबिर का यह कहना कि ''मेरी हैसियत, इस चालीस साल के आ.जाद मुल्क से कम नहीं. हर सफलता, समस्या, विरोधाभास जिससे देश दो चार है, आंखें हैं तो मुझ्में प्रत्यक्ष दिखेंगे. मैं देश की स्वतंत्रता का स्वरूप हूं. मेरी शिक्षा भले ही न हो पाई लेकिन अपने जीवन में जो कुछ हूं तुम्हारे लिए मदरसे से कम नहीं.'' आजादी की फलश्रुति के इस रूपक में ही इस उपन्यास की महिमा छिपी है.
अपने ब्यौरों में पृथुल इस उपन्यास में रिश्तों के पेचोखम, दीनी तालीम, तब्लीगी चर्चाओं, कौमी जबान के रूप में देवनागरी की हिमायत और मदरसे को लेकर बहसतलब गुफ्तगू है. मंजूर ने भले ही इसकी किस्सागोई की गति को उतना प्रवाही न बनाया हो, पर देश के हालात से गुज़रते आम आदमी और कहीं-कहीं आम मुसलमान के हालात का तद्गिकरा यहां मौजूद है.

