द मास्क ऑव अफ्रीका; द मिलियन म्युटिनीज नाउ
वी.एस. नायपॉल
पेंग्विन बुक्स,
पंचशील पार्क, नई दिल्ली-17,
कीमतः क्रमशः
210 रु. और 299 रु.
हम हिंदी वालों के लिए एक बुझौवल-से रहे हैं वी.एस. नायपॉल. भारतीय मूल के होकर भी विदेशी, लेखक होकर भी भाषा की दीवार की ओट में रहने वाले. अपनी स्थापनाओं, कथनों, रचनाओं और नोबेल पुरस्कार तक हासिल करके वे लगातार ऐसी चर्चा में रहे हैं जो हमें अपनी लगकर भी पराई लगती रही हैं. उस लिहाज से पेंग्विन ने उनकी ये किताबें हिंदी में लाकर बड़ा काम किया है. इनसे सर विदिया का रहस्य तो खुलता ही है, उनके सरोकारों, सोच की दुनिया भी सामने आती है.
यह कई मायनों में बहुत रोचक है. अफ्रीका में उगांडा, नाइजीरिया, घाना, आइवरी कोस्ट, दक्षिण अफ्रीका आदि की उनकी यात्रा कथाएं एक व्यक्ति के यात्रा वृत्तांत भर नहीं हैं. इनमें अफ्रीका की विविधता, रंग-बिरंगा जीवन, वहां के लोगों की मान्यताएं/अंधविश्वास तो आए ही हैं, वहां के पूरे जीवन को समेटने का प्रयास किया गया है. छोटे-छोटे कर्मकांड़ों, ओझा-गुनियों और संस्कारों के इर्द-गिर्द रचे गए वितानों के जरिए इन अफ्रीकी देशों के जीवन, विश्वास, मान्यताओं को तो सामने लाया ही गया है, एक आधुनिकतावादी, तर्कवादी नायपॉल की सोच और मान्यताओं को परखते चलने का काम भी किया गया है.
और इस लेखन की खास बात यह है कि लेखक को अपनी मान्यताओं और तर्कशक्ति पर भी सवाल/संदेह करने में कोई हिचक नहीं. यह नजरिया न होता तो इतने बड़े लेखक को यूं ही भटकने की जरूरत न होती. अफ्रीका के भूगोल, समाजशास्त्र, लोक मान्यताओं पर फिल्मों या किताबों की कोई कमी तो है नहीं. सो सर विदिया की यात्रा दोतरफा प्रभाव वाली है. वे एक आधुनिक तर्कवादी नजरिया लेकर अफ्रीकी जीवन के महत्वपूर्ण अनुष्ठानों, ठिकानों और लोगों तक जाते हैं.
कई बार ब्यौरे मजाक उड़ाने जैसे लगते हैं. पर जल्दी ही लगता है कि अफ्रीकी लोगों का विश्वास या अनुष्ठानों की शक्ति देखकर लेखक स्वयं अपनी आस्थाओं पर सवाल करने लगा है. यही किताब की असली खूबी है. वैसे इन अनजान प्रदेशों, अनुष्ठानों-स्मारकों की यात्रा और उनसे लोगों के जुड़ाव के किस्से कम रोचक नहीं. पर जब एक ही परिवार के सदस्य ईसाई मत, इस्लाम और आदि धर्म मानते हों और आदिधर्म वाला नए तरह के बाहरी धर्मों को सवालों के घेरे में लेता है तो नायपॉल का खुद का भरोसा डगमगाता लगता है.
दो निगेटिव और विवादास्पद किताबें एरिया आफ डार्कनेस तथा अ वुंडेड सिविलाइजेशन के बाद आई हिंदुस्तान संबंधी उनकी तीसरी किताब इस मुल्क में आधुनिकता और पश्चिमी प्रभाव से आ रहे तेज बदलावों की दास्तान है. और एक-एक विषय, व्यक्ति या प्रवृत्ति को पकड़कर नायपॉल जब कई-कई हजार शब्दों का ब्यौरा प्रस्तुत करते हैं तब हमारे अपने कई विश्लेषण और विश्लेषक छोटे जान पड़ते हैं. दिल्ली प्रेस के संस्थापक विश्वनाथ, नक्सली चिदानंद दासगुप्ता, सिख अतिवादी गुरतेज सिंह और शिवसेना नेता पाटील समेत दर्जनों ऐसे लोगों की कथा के माध्यम से नायपॉल भारतीय समाज में आ रहे बदलावों की चर्चा करते हैं.
यह किताब अस्सी के दशक के आखिरी दिनों की है. नायपॉल साठ के दशक में भी भारत आकर दो किताबें लिख चुके थे. पर भारत में चौतरफा हलचल देखकर उन्होंने यह जो किताब लिखनी शुुरू की, यह आकार-प्रकार में सबसे बड़ी बन गई. बिना टेप-वीडियो के, सिर्फ स्मरण और डायरी के नोट्स पर आधारित इस किताब के ब्यौरे तो हैरान करते ही हैं. यह समझ्ना भी मुश्किल है कि हमारे अपने लोगों को ये विषय क्यों नहीं सूझे थे.

