मैथिलीशरण
नंदकिशोर नवल
राजकमल प्रकाशन,
कीमतः 650 रु.
लब्बोलुआब: गुप्त जी की सबसे सुंदर ग्यारह कृतियों पर नवल लिखित विश्लेषणात्मक आलेख पढ़ने के बाद स्वतः ही साबित हो जाता है कि वे खड़ी बोली हिंदी के बड़े कवि हैं. पर उनकी कविताओं में अंतर्निहित सामाजिकता और वैचारिकता की गहरी छानबीन नहीं की गई है.
एक ऐसे दौर में जब समय-समय पर लिखे गए समीक्षात्मक निबंधों को संग्रहीत कर आलोचना पुस्तक तैयार करने का चलन जोरों पर है, नंदकिशोर नवल हिंदी के उन गिने-चुने आलोचकों में हैं जो आज भी आलोचना कर्म के प्रति अपनी गंभीरता और निष्ठा को बरकरार रखे हुए हैं. उसी का सुफल है मैथिलीशरण नाम की यह पुस्तक. इसमें उन्होंने मैथिलीशरण गुप्त के काव्य को केंद्र में रखकर अपना विशद और व्यवस्थित अध्ययन प्रस्तुत किया है. मुक्तिबोध और निराला पर इसी तरह का व्यवस्थित अध्ययन वे प्रस्तुत कर चुके हैं.
इस किताब में नवल ने यथासंभव गुप्त जी के संपूर्ण काव्य का विवेचन-विश्लेषण किया है. उन्होंने काव्य सौंदर्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण गुप्त की छोटी-छोटी काव्य-पुस्तकों का भी विवेचन एक बड़े लेख में किया है. लेकिन किताब का मुख्य आकर्षण वे ग्यारह लेख हैं, जिनके अंतर्गत गुप्त की सबसे सुंदर ग्यारह कृतियों क्रमशः जयद्रथ वध, पंचवटी, साकेत, जय भारत, यशोधरा, विष्णुप्रिया, द्वापर, सिद्धराज, भारत-भारती, स्वदेश-संगीत और झ्ंकार का व्यापक अध्ययन-विश्लेषण किया गया है. इसे पढ़ने के बाद पाठक की दृष्टि में गुप्त अपनी विराट् काव्य-संवेदना और रचनात्मक प्रयोगों के आधार पर स्वतः ही खड़ी बोली हिंदी के महत्वपूर्ण कवि सिद्ध होते हैं. आलोचक को इस संदर्भ में अलग से कुछ कहने की जरूरत ही नहीं रह जाती.
मैथिलीशरण गुप्त आधुनिक काल में अब तक के सर्वाधिक लोकप्रिय कवियों में हैं. जहां तक हिंदी पाठक का सवाल है, उसने आरंभ से ही उनको अपने जातीय कवि के रूप में स्वीकार किया है. उनकी महानता को लेकर हिंदी पाठक के मन में कभी कोई संदेह नहीं रहा. संदेह का बीजारोपण तो उन आलोचकों ने किया जिन्होंने 'ऐतिहासिक महत्ता बनाम साहित्यिक महत्ता' और 'लोकप्रियता बनाम श्रेष्ठता'' का निरर्थक विभाजन पैदा करके गुप्त जी ऐतिहासिक महत्व वाला और लोकप्रिय कवि की श्रेणी में डालकर उनका घोर अवमूल्यन किया. नवल इस पुस्तक में ऐसे विभाजन और उसके फलस्वरूप हिंदी आलोचना में उनके साथ किए गए सलूक का डटकर विरोध करते हैं. वे कहते हैं, ''यह असंभव है कि कोई कवि साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण न हो और वह इतिहास में अमरता का अधिकारी हो. दूसरे, यह भी असंभव है कि कोई कवि भाषण देकर या लेख लिखकर कविता की धारा को मोड़ दे...यह बार-बार कहने की आवश्यकता है कि गुप्त ने अपनी अपरिमित सृजन-क्षमता से खड़ी बोली में काव्य रचना का मार्ग प्रशस्त किया और उसे नए-नए आयाम प्रदान किए.''
नवल ने इस बात को विश्वसनीय तरीके से दिखाया है कि काव्य-सौंदर्य की दृष्टि से भी उनकी कृतियां कहीं से भी कमतर नहीं. लेकिन जैसा अक्सर होता है, हर उपलब्धि एक दूसरे संदर्भ में सीमा भी बन जाती है. इस किताब में गुप्त की कविताओं से लंबे-लंबे उद्धरण देकर आद्यंत दिखाया गया है कि उनकी रचनाएं कवित्व से परिपूर्ण हैं. पर उनकी कविताओं में अंतर्निहित सामाजिकता और वैचारिकता की गहरी और व्यापक छानबीन नहीं की गई है. अगर ऐसा किया जाता तो यह मैथिलीशरण गुप्त पर एक समग्र आलोचना पुस्तक होती.

