मई का महीना आधा बीत चुका है. मैदानी इलाके की भीषण गर्मी में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) अपने मेहराबदार गेट के बाहर की भीड़-भाड़ और चहल-पहल के विपरीत शांति का नखलिस्तान लगता है. पेड़ों की कतार वाले रास्ते और मंदिर की वास्तुकला वाले हल्के-पीले रंग के भवन वाराणसी की प्राचीन गलियों में उमड़े जनसैलाब से राहत देते हैं. स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक मदन मोहन मालवीय के दिमाग की उपज बीएचयू की स्थापना 1916 में हुई. इसे हिंदू संस्कृति और आधुनिक प्रौद्योगिकी तथा उद्योग की शिक्षा का उत्कृष्ट मेल माना जाता है. यह सही मायनों में पूरब और पश्चिम के बीच समकालिकता की रूमानी कल्पना है.
करीब 1,350 एकड़ में फैला बीएचयू एशिया का सबसे बड़ा आवासीय कैंपस भी है और यहां भाषा विज्ञान, संगीत शास्त्र और बायो-टेक्नोलॉजी से लेकर मैनेजमेंट तक के विविध पाठ्यक्रमों की पढ़ाई होती है. बीएचयू का लक्ष्य, जैसा उसके बारे में परिचय कराने वाले प्रत्येक पर्चे, विजन प्लान और प्रॉस्पेक्टस में लिखा होता है, ''शिक्षण और अनुसंधान के बीच तालमेल'' है. इसलिए बीएचयू के पूर्व छात्र और अब कुलपति 64 वर्षीय लालजी सिंह ने पहला काम यह किया कि उन्होंने छात्रों को चौबीसों घंटे अध्ययन करने की छूट देकर अनुसंधान को प्रोत्साहित किया.
जेनेटिक्स और डीएनए फिंगरप्रिंटिंग के क्षेत्र में नाम कमाने वाले लालजी सिंह अगस्त, 2011 में बीएचयू के कुलपति बने थे. यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबरा के इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल जेनेटिक्स में 13 साल तक अध्यापन करने के बाद, अब वे बीएचयू में स्वतंत्र अनुसंधान की भावना पैदा करना चाहते हैं.
वे कहते हैं, ''मैंने रात में चौकीदारों को नियुक्त कर उन छात्रों के लिए विभाग खुलवा दिए हैं जो रात में भी अनुसंधान का काम जारी रखना चाहते हैं.'' यह कदम छोटा भले लगे, लेकिन यह बीएचयू को दुनिया के सर्वोत्तम शोध संस्थानों में से एक बनाने की उनकी बृहत योजना का हिस्सा है. बीएचयू ने इस सिलसिले में जनवरी 2012 में अपना पक्ष विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सामने रखा और उसे 'उत्कृष्टता की संभावना वाले विश्वविद्यालय' का दर्जा मिल गया. इसके तहत उसे पांच साल में 50 करोड़ रु. अनुदान मिलेगा.
लालजी सिंह कहते हैं, ''मेरा ख्वाब स्थानांतरीय (ट्रांसलेशनल) शोध संस्थान स्थापित करने का है, ताकि ज्ञान को ऐसी टेक्नोलॉजी में बदला जा सके, जो समाज के लिए मददगार हो. हमने स्थानांतरीय शोध के लिए योजना आयोग से 1,000 करोड़ रु. के निवेश का अनुरोध किया है. इस योजना से स्थानांतरीय शोध विशेषज्ञ, बायोटेक्नोलॉजिस्ट, कृषि विज्ञानी और समाज विज्ञानी सभी एक मंच पर आ जाएंगे. इसके पीछे सोच यह है कि सभी सेक्टर एक-दूसरे के विकास में योगदान करें.''
जो चीज बीएचयू को अन्य विश्वविद्यालयों से अलग करती है, वह है सुविधाओं से वंचित प्रतिभाओं के सशक्तीकरण की दिशा में सुनिश्चित दृष्टिकोण. बीएचयू के लोग इसे आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों को सस्ती लागत पर विश्वस्तरीय सुविधाएं मुहैया कराने का अपना मालवीयवादी सिद्धांत कहते हैं. दूसरे केंद्रीय विश्वविद्यालयों की तुलना में कम खर्चीला साबित होने के लिए बीएचयू अपने रिसर्च स्कॉलरों को प्रति माह 5,000 रु. वजीफा भी देता है. इसके अलावा, आर्थिक रूप से पिछड़े 100 छात्रों को सालाना 2,000 रु. की स्कॉलरशिप भी दी जाती है.
बीएचयू से मान्यता प्राप्त वाराणसी के पांच कॉलेजों में से एक महिला महाविद्यालय में समाज विज्ञान की अंतिम वर्ष की छात्रा, 21 वर्षीया श्रुति सिंह कहती हैं, ''यह लोकल और ग्लोबल का अच्छा मिश्रण है. कम फीस के कारण प्रोफेशनल पाठ्यक्रम छात्रों की पहुंच में हैं. यहां पहली प्राथमिकता हमेशा अध्ययन करने और सीखने की होती है.'' वे इशारा करती हैं कि यहां का प्रशासन घटिया राजनीति को बर्दाश्त नहीं करता जबकि देश के दूसरे विश्वविद्यालयों में इसकी अनदेखी की जाती है.
कानपुर के 21 वर्षीय सुबोध कटियार कहते हैं, ''यह राज्य के विश्वविद्यालयों की तुलना में बेहतर विकल्प है क्योंकि यहां कम भ्रष्टाचार है और कक्षाएं भी नियमानुसार लगती हैं.'' कटियार गणित के अंतिम वर्ष के छात्र और विश्वविद्यालय स्तर के तैराक तथा मैराथन धावक हैं.
बीएचयू के प्रेस, पब्लिकेशन और पब्लिसिटी विभाग के चेयरमैन राजेश सिंह कहते हैं, ''पिछले शैक्षणिक वर्ष में छात्रों के दाखिले में लगभग 25 फीसदी का इजाफा हुआ है. विश्वविद्यालय के मैनेजमेंट, कृषि और लॉ विभागों से शत-प्रतिशत प्लेसमेंट का रिकॉर्ड रहा है.'' बीएचयू प्रत्येक पाठ्यक्रम के लिए प्रवेश परीक्षा का आयोजन करता है और छात्रों को मेरिट के आधार पर दाखिला मिलता है. इस मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय उससे सबक सीख सकता है.
वाराणसी कैंपस से 80 किमी दूर बरकटचा में बीएचयू का राजीव गांधी साउथ कैंपस है. यह विशाल कृषि हब है जहां पशु चिकित्सा विज्ञान संकाय की स्थापना के लिए अकादमिक काउंसिल ने मंजूरी दे दी है. इसमें 14 विभाग होंगे. इसके अतिरिक्त, विश्वविद्यालय डेयरी टेक्नोलॉजी में भी निवेश कर रहा है जिससे छात्र आजीविका के साधन के रूप में पशु पालन और डेयरी उत्पाद प्रबंधन में इस क्षेत्र के जनजातीय समुदायों की मदद कर सकेंगे.
लालजी कहते हैं, ''यह काम पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप, और उत्तर प्रदेश के पिछड़े इलाकों में चैनल विकास के जरिए किया जाएगा.'' कृषि विज्ञान संस्थान ने अधिक पैदावार वाली फसलों की 45 किस्में विकसित की हैं जो मौसम की मार को झेल सकती हैं. किसान मेलों के जरिए छोटे किसानों को इसके फायदों के बारे में बताया जाता है और उन्हें प्रशिक्षित किया जाता है. यह दुनिया के बदलते मौसम के कारण पैदा हुई भुखमरी और गरीबी को दूर करने की दिशा में बीएचयू का योगदान है.
बीएचयू की सबसे बड़ी उपलब्धि इसके प्रौद्योगिकी संस्थान को 16वें इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आइआइटी) का दर्जा मिलना है. इसके परिसर में आइआइटी कैंपस स्थापित होने की खुशी के बीच उसे बीएचयू के बरअक्स संस्थान की स्वायत्तता को लेकर चिंता भी जताई जाती रही है. हालांकि अधिकारों में हिस्सेदारी को अभी अंतिम रूप दिया जाना है, लेकिन कुलपति को विश्वास है कि यह परस्पर फायदेमंद संबंध होगा.
वे कहते हैं, ''यह देश में शिक्षा का भविष्य है. समय की मांग है कि संस्थानों के बीच संघीय संबंध हो.'' लोकसभा और राज्यसभा दोनों में पारित होने के बावजूद, आइआइटी बीएचयू स्थापित करने का विधेयक दिल्ली की नौकरशाही के गलियारों में अभी तक अटका पड़ा है. बीएचयू के अधिकारियों को उम्मीद है कि दो महीने में विधेयक को अंतिम मंजूरी मिल जाएगी.
बीएचयू कैंपस में स्थित सर सुंदरलाल अस्पताल के बारे में भी कुलपति की ऐसी ही राय है. वे इसे सुविधाओं के मामले में दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जैसा बनाना चाहते हैं.
कुलपति और उनकी टीम का ध्यान अब सर्वोत्तम फैकल्टी को आकर्षित करने पर है. इस क्षेत्र में विश्वविद्यालय सुधार लाने की कोशिश करता रहा है. 2010 में शोध पत्रों के प्रकाशन के मामले में भारतीय विश्वविद्यालयों के बीच बीएचयू का पहला स्थान रहा. उसे भौतिक विज्ञान, बायोटेक्नोलॉजी, कृषि विज्ञान और भूविज्ञान में अब तक 10,000 से अधिक प्रशस्तिपत्र भी मिल चुके हैं.
लेकिन उसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान की भी भूख है. राजेश सिंह कहते हैं, ''हम अंतरराष्ट्रीय पेटेंट की दिशा में अनुसंधान को गाइड करने की कोशिश कर रहे हैं. इसके लिए उच्च गुणवत्ता वाली फैकल्टी और शोध सुविधाओं की जरूरत है.''
जाहिर है, अनुसंधान और विकास में बीएचयू की निवेश योजना सही दिशा में उठाया गया कदम है.

