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डार्क मोड

बेस्‍ट कॉलेज: उच्च शिक्षा के शहंशाह

इंडिया टुडे-नीलसन बेस्ट कॉलेज सर्वेक्षण और रैंकिंग के इस 16वें संस्करण में इस बार पांच नई स्ट्रीम को जोड़ा गया है. बाकी की छह स्ट्रीम में संस्थानों के बीच शीर्ष पर आने की पुरानी प्रतिस्पर्धा अब भी छिड़ी हुई है.

अपडेटेड 12 जून , 2012

बात पंद्रह साल पहले की है जब इंडिया टुडे ने बेस्ट कॉलेजों के अपने पहले सर्वेक्षण को अंजाम दिया था. यह सिलसिला 1997 से यूं ही बरकरार है. तब से आज तक उच्च शिक्षा की तस्वीर काफी हद तक बदल चुकी है. कॉलेजों की संख्या तब के 9,500 के आंकड़े से बढ़ कर अब 30,000 को पार कर गई है. इनमें नाम लिखवाने वाले छात्रों की संख्या 55 लाख से बढ़ कर 1.69 करोड़ पहुंच चुकी है.

जो चीज पिछले 15 साल में नहीं बदली, वह है उच्च शिक्षा पर होने वाला विमर्श. इंडिया टुडे ने 1997 में उच्च शिक्षा के संकट पर लिखा था. अब 2012 में आइआइटी समेत अन्य इंजीनियरिंग कॉलेजों की प्रवेश परीक्षा की नई प्रणाली पर जिस तरह का बवाल मचा हुआ है, वह दिखाता है कि उच्च शिक्षा के आकाश पर एक बार फिर से संकट के बादल छा रहे हैं.Best Colleages

भले ही वक्त के साथ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की संख्या में इजाफा हुआ हो, लेकिन देश में अब भी आइआइटी या दिल्ली के सेंट स्टीफंस, लेडी श्रीराम, श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स; कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज; चेन्नै के लोयोला कॉलेज; मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज के स्तर के संस्थानों की कमी है जो युवाओं की आकांक्षाओं को पूरा कर पाने में सक्षम हों.

पिछले 15 साल से ये कॉलेज और कुछ अन्य कॉलेज रैंकिंग में शीर्ष पर रहे हैं. टॉप कॉलेजों को उनकी जगह से हटा पाना आसान तो नहीं, लेकिन रैंकिंग ऐसी होनी चाहिए जो प्रतिस्पर्धा को बढ़ा सके ताकि 30,000 कॉलेजों में से प्रत्येक अपने स्तर को उठा सके और टॉप10 में नहीं तो 100 में ही आने के लिए कोशिश करे.

सरकार के लिहाज से देखें तो उसके लिए यह काम ज्‍यादा आसान है कि वह टॉप की गुणवत्ता को कम कर सबके लिए समान अवसरों को सृजित कर दे. दरअसल, सरकार द्वारा पोषित इंजीनियरिंग कॉलेजों के लिए संयुक्त प्रवेश परीक्षा का उद्देश्य यही है जिसे लेकर विभिन्न आइआइटी की आपत्तियों को सिरे से दरकिनार कर दिया गया है. हमारे खयाल से भारत के कॉलेजों को एक ऐसी होड़ में नहीं धकव्ल देना चाहिए जो उन्हें नीचे की ओर लेकर जाए. इसकी बजाए उन्हें शीर्ष पर पहुंचाने वाली दौड़ का हिस्सा बनने देना चाहिए.

इस साल पिछले एक दशक में पहली बार हमने अपने सर्वेक्षण को कुछ विस्तार देने की दिशा में कदम बढ़ाया है और इसमें आर्ट्स, साइंस, कॉमर्स, इंजीनियरिंग, मेडिसिन और लॉ के अलावा पांच नई शाखाओं (स्ट्रीम) को शामिल किया है-बैचलर ऑफ बिजनेस ऐडमिनिस्ट्रेशन (बीबीए), बैचलर ऑफ कंप्यूटर ऐप्लिकेशन (बीसीए), मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्‍म, फाइन आर्ट्स और फैशन टेक्नोलॉजी जैसी नई शाखाओं को जोड़ना उच्च शिक्षा में हो रहे विविधीकरण और विस्तार को मान्यता देना है. उदारीकरण के लागू होने के दो दशक बाद ऐसी नई प्रोफेशनल डिग्रियों की मांग बढ़ी है जो युवाओं को आकर्षक रोजगार पाने में सक्षम बनाती हैं.

इन पांच नई शाखाओं की मांग में वृद्धि सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में आई उछाल से जुड़ी हुई है. बीसीए सिर्फ भारत में दी जाने वाली ग्रेजुएट स्तर की डिग्री है जो युवाओं को प्रोग्रामर बनाती है. इसे हासिल करने के बाद आइटी सेक्टर में रोजगार मिलने में आसानी हो जाती है.

बीबीए करने वाले छात्र इंडस्ट्री में मैनेजरों की उस कमी को पूरा करते हैं जिसे अकेले एमबीए छात्र पूरा नहीं कर पाते. जर्नलिज्‍म और मास मीडिया तो तेजी से बढ़ते क्षेत्र हैं. भारत दुनिया के उन कुछेक देशों में से है जहां ह्ढिंट मीडिया अब भी मजबूती से बढ़ कर रहा है, साथ ही इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया का भी प्रसार हो रहा है.

पिछले पांच साल में भारतीय फैशन और आर्ट को दुनिया के मंच पर भी मान्यता मिली है. महंगा फैशन और आर्ट का घरेलू बाजार तो प्रति व्यक्ति आय की मौजूदा स्थिति में हमेशा सीमित ही बना रहेगा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार तक उसकी पहुंच ने युवाओं के लिए जबरदस्त संभावनाएं पैदा कर दी हैं.

उच्च शिक्षा में विकल्पों का विविधीकरण संस्थानों के लिए अपनी जगह बना पाने का एक अवसर भी है. नब्बे के दशक में बंगलुरू स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी ने खाली जगह भरने के लिए बारहवीं पास छात्रों को अपने यहां दाखिला दिया था. इस बार शीर्ष 25 लॉ संस्थानों में कई ऐसे भी नाम शामिल हैं जिनका 1997 में कोई अस्तित्व ही नहीं था जब इंडिया टुडे ने पहली बार सर्वेक्षण किया था. इनमें से एक नाम हैदराबाद के एनएएलएसएआर का भी लिया जा सकता है.

इस बार बीबीए और बीसीए में अपेक्षाकृत नए संस्थानों ने अपनी जगह बनाई है. दोनों ही शाखाओं में शीर्ष पांच में शामिल दो संस्थान-बंगलुरू की क्राइस्ट यूनिवर्सिटी और चेन्नै की एसआरएम यूनिवर्सिटी निजी क्षेत्र के डीम्ड विश्वविद्यालय हैं जिन्होंने उच्चस्तरीय बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने में बेहतरीन काम किया है.

नए संस्थान पुरानों के मुकाबले कहीं ज्‍यादा तेजी से नए कोर्सों के हिसाब से खुद को ढाल रहे हैं. मसलन, अपनी स्थापना के 125 साल बाद भी दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज में बीकॉम का डिग्री कोर्स नहीं है.

मौजूदा परिदृश्य को देखने पर यही लगता है कि आने वाले समय में हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था को ऐसे निजी संस्थान ही चलाएंगे जिन्हें कोई सरकारी मदद हासिल नहीं होगी. ऐसे में सरकार को नियमन का काम तो करना ही होगा जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि गैर-भरोसेमंद और सिर्फपैसा उगाहने के उद्देश्य से इस क्षेत्र में आने वाले संस्थान कम से कम गुणवत्ता को खराब न कर सकें.

दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और ऑल इंडिया काउंसिल ऑन टेक्निकल एजुकेशन (एआइसीटीई) जैसे साख खो चुके संस्थानों की जगह एक नया उच्च शिक्षा नियामक नेशनल कमीशन फॉर हायर एजुकव्शन ऐंड रिसर्च बनाने से संबंधित बिल अब भी संसद में नहीं लाया जा सका है. नियामक प्राधिकरण को स्थिरता देने के लिए इस बिल को संसद में पेश किया जाना निर्णायक होगा.

सरकार को विदेशी विश्वविद्यालय विधेयक पर भी आम राय कायम करनी चाहिए ताकि भारत दुनिया के कुछ बेहतरीन शिक्षण संस्थानों का मेजबान बन सके. सरकार को किसी भी कीमत पर ऐसी व्यवस्था कायम करनी होगी जिसमें निजी संस्थान अच्छे से फल-फूल सकें और आपस में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी कायम कर सकें. उम्मीद की जानी चाहिए कि आज से 15 साल बाद 2027 में इंडिया टुडे की रैंकिंग इसी भावना और प्रयास को प्रतिबिंबित करती नजर आएगी.

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