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योगी सरकार के कामकाज पर जनमत होंगे विधानसभा उपचुनाव के नतीजे

उपचुनाव के नतीजे इस बात की तरफ इशारा करेंगे कि योगी सरकार पर लगाए जा रहे विरोधी दलों के आरोपों का जनता के बीच क्या असर है.

देवरिया में चुनावी रैली को संबोधित करते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
देवरिया में चुनावी रैली को संबोधित करते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
अपडेटेड 4 नवंबर , 2020

उत्तर प्रदेश के सात विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के लिए मतदान तीन नवंबर को हो गया है. पिछली बार इन विधानसभा सीटों में छह सीटें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और एक सीट समाजवादी पार्टी (सपा) ने जीती थी. अब 10 नवंबर को इन उपचुनावों के नतीजे प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के कामकाज पर जनता के मूल्यांकन को जाहिर करेंगे. उपचुनाव के नतीजों से यह भी संकेत मिलेगा कि वर्ष 2022 में होने विधानसभा चुनाव में भाजपा विरोधी दलों की राजनीति किस तरफ रहने वाली है. मोदी लहर में भाजपा ने इन सात विधानसभा सीटों में से छह भले ही जीत ली हो लेकिन इनपर विपक्षी पार्टियों की जीत का लंबा इतिहास रहा है. उपचुनाव के नतीजे इस बात की तरफ इशारा करेंगे कि योगी सरकार पर लगाए जा रहे विरोधी दलों के आरोपों का जनता के बीच क्या असर है.

ये उपचुनाव उस वक्त पर हुए हैं जब अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू हो चुका है. ऐसे में हिंदुत्व से जुड़े मुद्दे पर उपचुनाव के नतीजे एक जनमत के रूप मे आएंगे. विपक्ष ने कानपुर के बिकरू कांड में पुलिस की भूमिका को लेकर प्रदेश के कई जिलों में घटी घटनाओं को लेकर ब्राह्मण उत्पीड़न का मुद्दा उठाकर योगी सरकार को घेरने की कोशि‍श की है. इसके अलावा हाथरस की घटना के बाद से दलितों के बीच पकड़ मजबूत करने की योगी सरकार की कवायद कितना रंग लाई है इसका पैमाना भी विधानसभा उपचुनाव के नतीजे होंगे. रोजगार और किसान के मुद्दे पर योगी सरकार द्वारा हाल मे शुरू की गई योजनाएं जनता का विश्वास जीतने में कितना कामयाब हो पाई हैं, चुनाव नतीजे इसका भी आकलन जाहिर करेंगे. 

बुलंदशहर: भाजपा और रालोद में जबरदस्त टक्कर 
बुलंदशहर सदर सीट भाजपा विधायक वीरेंद्र सिंह सिरोही के निधन की वजह से खाली हुई थी. उपचुनाव में इस सीट पर भाजपा ने वीरेंद्र सिंह सिरोही की पत्नी उषा सिरोही, बसपा से हाजी यू‍नुस, कांग्रेस से सुशील चौधरी और सपा से समर्थि‍त राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) उम्मीदवार प्रवीण कुमार का भाग्य 3 नवंबर को हुए मतदान के बाद इवीएम में कैद हो गया है. भाजपा, रालोद और कांग्रेस ने जाट उम्मीदवार उतारे हैं. जबकि बसपा, आजाद समाज पार्टी और एआइएमआइएम ने मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं. यहां कुल 3.88 लाख मतदाता हैं.

स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, सदर सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 33 फीसद से कुछ अधि‍क है. वहीं दलित वोटर 18 फीसद के करीब हैं. इस विधानसभा सीट पर पिछड़ा वर्ग के कुल 31 प्रतिशत से कुछ अधि‍क मतदाता हैं जिनमें जाट 11 प्रतिशत, लोधी समाज 8 प्रतिशत और गुर्जर समाज के करीब 5 फीसद मतदाता हैं जबकि सात प्रतिशत के करीब पिछड़ा वर्ग की अन्य जातियां हैं. यहां पर सामान्य वर्ग में एक तिहाई मुस्लिम, 17-18 फीसद दलित, 11 से 12 फीसदी जाट और लगभग 8 फीसद लोधी हैं. वहीं, 17 फीसद सामान्य वर्ग के मतदाताओं में वैश्य, राजपूत व ब्राह्मण मुख्य हैं. 3 नवंबर को हुए विधानसभा उपचुनाव के मतदान ने बुलंदशहर सदर का मत प्रतिशत 52.10 था जबकि वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर 64.31 प्रतिशत वोट पड़े थे. इस सीट पर भाजपा ने सहानुभूति वोटों के जरिए मुकाबला जीतने की आस लगाई है. चुनाव की घोषणा के बाद भाजपा के सामने मुख्य मुकाबले में बसपा दिखाई दे रही थी लेकिन राज्यसभा चुनाव के दौरान मायावती के भाजपा को समर्थन से जुड़ा बयान सामने आने से इस सीट पर मुस्लिमों का झुकाव सपा समर्थिकत रालोद उम्मीदवार प्रवीण कुमार की तरफ होने से रालोद और भाजपा में कांटे की टक्कर है. 

नौगावां सादात: भाजपा-सपा के बीच मुख्य मुकाबला
नौगावां सादात सीट पर वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव की तरह भाजपा और सपा के बीच सीधा मुकाबला हुआ है. हालांकि बसपा ने चुनाव को त्रिकोणात्मक बनाने की असफल कोशि‍श की है. पूर्व क्रिकेटर व मंत्री चेतन चौहान के निधन के कारण हुए उपचुनाव में भाजपा ने उनकी पत्नी संगीता चौहान को उम्मीदवार बनाया था. सपा व बसपा से क्रमश: मौलाना जावेद आब्दी और फुरकान अहमद चुनाव मैदान में थे. 3 नवंबर को हुए मतदान के बाद उम्मीदवारों का भविष्य ईवीएम में कैद हो गया है. भाजपा ने यहां भी सहानुभूति वोटों को पाने की उम्मीद लगाई है. यहां पर इस बार उपचुनाव में कुल 61.60 प्रतिशत वोट पड़े जो वर्ष 2017 के विधानसभा आम चुनाव में पड़े वोटों से 14.72 प्रतिशत कम है. इस विधानसभा सीट पर कुल 3.1 लाख मतदाताओं में सर्वाधिक तादाद 1.1 लाख मुस्लिम वोटरों की है. इसके बाद ठाकुर और दलित मतदाताओं की आबादी 45-45 हजार है. सैनी और जाट मतदाताओ की संख्या 30-30 हजार है. इसके बाद 25 हजार पाल, 13 हजार यादव और 10 हजार गुर्जर मतदाता हैं.  

टूंडला : मजबूत भाजपा को बसपा की चुनौती
वर्ष 2017 के विधानासभा चुनाव में टूंडला विधानसभा सीट से भाजपा के एस.पी. सिंह बघेल बसपा के राकेश बाबू को हराकर चुनाव जीते थे. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में बघेल के सांसद बनने के बाद से यह सीट खाली थी. हालांकि इसके बाद से कोर्ट में बघेल की जाति को लेकर चले विवाद के बाद इस विधानसभा सीट पर उपुचनाव लंबित हो गया था. अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित टूंडला सीट पर भाजपा से प्रेमपाल धनगर, सपा से महाराज सिंह धनगर, बसपा से संजीव चाक और कांग्रेस से स्नेहलता उर्फ बबली चुनाव मैदान में हैं. 3.6 लाख मतदाताओं वाली इस आरक्षि‍त विधानसभा सीट पर जाटव और धनगर (बघेल) प्रमुख जातियां हैं. यहां पर 65 हजार मतदाता जाटव है तो धनगर जाति के मतदाताओं की संख्या 62 हजार हैं. इसके अलावा ठाकुर मतदाता 35 हजार, यादव मतदाता 30 हजार, मुस्लि‍म मतदाता 21 हजार, ब्राह्मण 20 हजार, निषाद और कुशवाहा मतदाता 18-18 हजार, जाट 15 हजार और वाल्मीकि मतदाता 10 हजार हैं. तीन नवंबर को हुए उपचुनाव में यहां का मतप्रतिशत 54 प्रतिशत रहा जबकि वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में यहां 69.66 प्रतिशत मतदान हुआ था. धनगर, ठाकुर मतदाताओं की जुगलबंदी से भाजपा यहां पर मजबूत स्थिति में हैं. हालांकि भाजपा को बसपा से चुनौती मिली है. 

उन्नाव : भाजपा को सपा की तगड़ी चुनौती
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्नाव के बांगरमऊ सीट से भाजपा उम्मीदवार कुलदीप सिंह‍ सेंगर ने 44 प्रतिशत वोट पाकर सपा के बदलू खान को बुरी तरह हराया था. रेप के मामले में कुलदीप सेंगर को सजा मिलने के बाद यह सीट रिक्त हुई थी. भाजपा ने इस सीट पर उन्नाव के जिला अध्यक्ष और कुर्मी बिरादरी से आने वाले नेता श्रीकांत कटियार को चुनाव में उतारा है. सपा ने सुरेश पाल, बसपा ने महेश पाल और कांग्रेस ने पूर्व मंत्री गोपीनाथ दीक्षित की बेटी आरती दीक्षित को उम्मीदवार बनाया है. कुलदीप सेंगर की पत्नी संगीता सेंगर ने इस उपचुनाव में श्रीकांत के समर्थन में प्रचार किया है. बांगरमऊ सीट पर कुल 3.4 लाख मतदाता हैं. इनमें एक लाख ओबीसी, 76 लाख मुस्लि‍म, 50 हजार दलित, 35 हजार ठाकुर, 25 हजार ब्राह्मण और 10 हजार दूसरे अपर कास्ट के मतदाता हैं. 3 नवंबर को हुए उपचुनाव में बांगरमऊ विधानसभा सीट पर कुल 50.59 प्रतिशत वोट पड़े जो वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव की तुलना में नौ फीसद कम हैं. चुनाव के दौरान उन्नाव की इस सीट पर जमकर राजनीतिक उलट-पलट होती रही. कांग्रेस की पूर्व सांसद अन्नू टंडन मतदान से एक दिन पहले सपा की साइकिल पर सवार हो गईं. यहां पर कांग्रेस की उम्मीदवार आरती दीक्षि‍त को ब्राह्मण मतदाताओं को अच्छा समर्थन मिला है. तीन नवंबर को मतदान के बाद जो राजनीतिक आकलन सामने आया है उसके अनुसार भाजपा उम्मीदवार को सपा से तगड़ी चुनौती मिली है.

घाटमपुर: भाजपा, सपा, बसपा के बीच त्रिकोणीय मुकाबला 
कानपुर नगर की घाटमपुर सुरक्षित सीट पर प्रदेश सरकार की मंत्री कमलरानी वरुण के निधन के कारण चुनाव हुआ है. यहां भाजपा से उपेंद्रनाथ पासवान, सपा से पूर्व विधायक इंद्रजीत कोरी, बसपा से कुलदीप शंखवार और कांग्रेस से डॉ. कृपा शंकर उम्मीदवार थे जिनका फैसला 3 नवंबर को हुए मतदान के बाद ईवीएम में कैद हो गया है. इस सीट पर कुल 49.42 प्रतिशत वोट पड़े जो वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव से करीब 12 प्रतिशत कम है. घाटमपुर विधानासभा सीट पर कुल 3.07 लाख मतदाता हैं. इनमें दलित मतदाता 1.08 लाख, ब्राह्मण मतदाता 45 हजार, मुस्लिम 28 हजार, निषाद 22.5 हजार, ठाकुर और यादव मतदाता 22-22 हजार, कुर्मी और पाल 18-18 हजार, कुशवाहा 4,200 और अन्य जाति के मतदाता 20 हजार के करीब हैं. यमुना पट्टी की इस विधानसभा सीट पर पहली बार हुए उपचुनाव में जाति के अलावा कोई भी मुद्दा नहीं दिखा है. इस चुनाव में भाजपा और सपा के बीच मुख्य मुकाबला हुआ है. भाजपा के आधार वोट सवर्ण को पाले में करने के लिए कांग्रेस प्रत्याशी ने भी जोर आजमाइश की है. बसपा प्रत्याशी भी दलित और मुस्लि‍म मतों के सहारे अपनी नैया पार लगाने में जुटे थे लेकिन राज्य सभा चुनाव के दौरान बसपा सुप्रीमों मायावती के भाजपा का समर्थन करने से जुड़े बयान से कुलदीप शंखवार को नुकसान हुआ है. ऐसे में मुख्य रूप से मुकाबला सपा और भाजपा के बीच ही हुआ है. 

मल्हनी: तेज चली है साइकिल 
जौनपुर जिले की मल्हनी सीट पर अहम सवाल यह है कि सात बार विधायक रहे और वर्ष 2012 और 2017 में लगातार दो बार मल्हनी सीट से जीतने वाले सपा नेता पारसनाथ यादव की विरासत उनके बेटे लकी यादव को सौंपती है या नहीं. उपचुनाव पारसनाथ के निधन के कारण हुआ है. सपा उम्मीदवार लकी यादव, भाजपा के उम्मीदवार मनोज सिंह, बसपा के जयप्रकाश दुबे, कांग्रेस के राकेश मिश्र समेत पूर्व सांसद और निर्दलीय उम्मीदवार धनंजय सिंह की किस्मत का फैसला 3 नवंबर को ईवीएम में बंद हो चुका है. मल्हनी विधानसभा उपचुनाव में 56.65 प्रतिशत वोट पड़े जो वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में 60.04 प्रतिशत मतदान हुआ था. वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में पारसनाथ यादव ने 42.1 प्रतिशत वोट पाकर चुनाव जीता था. धनंजय सिंह की पत्नी डॉ. जागृति सिंह और बसपा के उम्मीदवार ने क्रमश: 25.8 प्रतिशत और 23.6 प्रतिशत वोट पाए थे. पांच साल बाद वर्ष 2017 में भी पारसनाथ के लिए स्थि‍तियां नहीं बदलीं. वह 33.6 प्रतिशत वोट पाकर जीते जबकि धनंजय सिंह‍ और बसपा उम्मीदवार क्रमश: दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे थे. मल्हनी विधानसभा सीट पर यादव मतदाता प्रभावशाली हैं. इसके बाद दलित, ठाकुर और ब्राह्मण मतदाताओं का नंबर आता है. सपा उम्मीदवार लकी यादव को अपने पिता की मृत्यु से सहानुभूति वोट तो मिले हैं साथ ही यादव और ब्राह्मण मतदाताओ के एक बड़े वर्ग का समर्थन मिलने से इनकी स्थि‍ति मजबूत है. 

देवरिया: भारी पड़ रहे ब्रह्माशंकर त्रिपाठी 
देवरिया सदर सीट पर भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस के ब्राह्मण उम्मीदवारों ने अपना भाग्य आजमाया है. भाजपा ने डॉ. सत्यप्रकाश मणि त्रिपाठी, सपा ने पूर्व मंत्री ब्रह्माशंकर त्रिपाठी, बसपा ने अवधनाथ त्रिपाठी और कांग्रेस ने मुकुंद भास्कर मणि त्रिपाठी पर दांव लगाया है. यहां से वर्ष 2012 और 2017 में विधायक रहे जनमेजय सिंह के निधन के कारण उपचुनाव हुआ है, उनके बेटे पिंटू सिंह ने बतौर निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव मैदान में हाथ आजमाया है. 3 नवंबर को हुए मतदान में देवरिया विधानसभा सीट पर कुल 51.05 प्रतिशत मतदान हुआ है जो कि वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव के 56.64 प्रतिशत से साढ़े पांच फीसद ही कम है. देवरिया विधानसभा सीट पर 50-55 हजार ब्राह्मण मतदाता हैं. इसके बाद वैश्य मतदाता 45-50 हजार, यादव 25-30 हजार, मुस्लिम 20-25 हजार, निषाद 20-22 हजार, ठाकुर 18-20 हजार, मौर्य व कुशवाहा 15-16 हजार, सैंथवार 12-13 हजार, राजभर 8-10 हजार और चौरसिया जाति के मतदाता 8-10 हजार हैं. ब्राह्मणों के कद्दावर नेता ब्रह्माशंकर त्रिपाठी ने ब्राह्मण, यादव और मुस्लिम मतदाताओं पर पकड़ बनाकर दूसरे उम्मीदवारों को कड़ी चुनौती दी है.

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