जहां तक मुझे याद है, ए.के. एंटनी की छवि ईमानदार व्यक्ति की रही है. मीडिया उन्हें 'मिस्टर क्लीन' और 'संत' कहता था. लेकिन इस तरह की घिसी-पिटी पदवियों के साथ दिक्कत यह है कि इन्हें देने वाले व्यक्ति चर्चा में आ जाते हैं और जिनकी छवि सचमुच साफ-सुथरी है, वे सोने चले जाते हैं. टाट्रा ट्रक घोटाला सोने वालों को झिंझोड़कर जगा रहा है. मैं एक राजनेता के रूप में एंटनी के आगे बढ़ने का लंबे समय तक गवाह रहा हूं. मैं अब भी कहूंगा कि उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर कोई शक नहीं किया जा सकता. लेकिन इससे एक सवाल भी पैदा होता हैः एंटनी सरीखे कद्दावर नेता के मामले में इस तरह की 'निजी' ईमानदारी के क्या निहितार्थ हैं?
इसका मतलब यह है कि एंटनी हजारों भारतीय नेताओं की तरह निजी तौर पर घूस लेने वाले नेता नहीं हैं. दूसरे शब्दों में, वे अपने और परिवार की खातिर दौलत जमा करने के लिए भ्रष्टाचार में शामिल नहीं होते. मैं लीक से हट कर यह बात कह रहा हूं, लेकिन मैं यह जोखिम उठाऊंगा. घिसे-पिटे मुहावरे उछालने के बावजूद मीडिया मूर्ख नहीं है और अगर एंटनी ने सत्ता के अलावा किसी और चीज पर ध्यान दिया है तो वह है अपने हाथों को साफ-सुथरा रखना और उनका प्रदर्शन करना.
कोई 2,000 साल पहले, रोमन जज पिलेट ने यहूदी कट्टरपंथियों के सामने अपने हाथों को धोया था और घोषणा की थी कि वह ईसा मसीह को सलीब पर चढ़ाए जाने के लिए जिम्मेदार नहीं है. इसमें कोई शक नहीं कि वह जीसस के प्रति अधिक ईमानदार था. वह चिढ़ कर यहूदियों और ईसा मसीह की दृढ़ता दोनों के आगे घुटने टेक रहा था. एक तरह से, एंटनी अपने पूरे करियर में पिलेट के अनुयायी रहे हैं और कई चीजों से हाथ धोते रहे हैं. वे चिड़चिड़े मिजाज वाले रोमन जज से इस मायने में भिन्न हैं कि वे केवल अपने प्रति ईमानदार रहे. या यों कहें कि साफ-सुथरे हाथों वाले फॉर्मूले पर मीडिया में सावधानी से बनाई गई अपनी छवि के प्रति ईमानदार रहे.
उन्हें हाथ साफ दिखाने की लत कैसे लग गई? इस सवाल का जवाब बहुत आसान है. सभी नेताओं की तरह एंटनी भी सत्ता की फसल काटते हैं. भारतीय राजनीति में, सत्ता कुछ विशेष जिम्मेदारी देती है. आप भले ही भ्रष्ट न बनें लेकिन सत्ता में बने रहने के लिए जरूरी है कि आप दूसरों को भ्रष्ट बनने की राह में रुकावट न पैदा करें. भ्रष्ट लोग क्या कर रहे हैं, आप इसे जान सकते हैं और नहीं भी जान सकते हैं. लेकिन यह कौन कहता है कि जब तक आप वह काम नहीं करते जो दूसरे कर रहे हैं तो उसके बारे में जानना या न जानना महापाप है? जानने या न जानने-दोनों स्थितियों में मिस्टर क्लीन की छवि रामबाण नुस्खा है. यदि कहीं कोई दुर्गंध हो तो उसे हमेशा दूर किया जा सकता है. साथ ही अपने हाथों को साफ-सुथरी छवि की शीट से पोंछा जा सकता है.
कुछ लोग यह सवाल उठा सकते हैं: क्या अपने प्रभाव क्षेत्र में भ्रष्टाचार को चलने देना अनैतिक काम नहीं है, भले ही आप उसमें शामिल न हों? खासकर उस समय जब आप भ्रष्टाचार रोकने के लिए अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकते हैं? एक बार फिर एंटनी और पिलेट के बीच अंतर यह है कि एंटनी जुगुप्सा में किसी चीज से हाथ नहीं धो रहे हैं. वे कांग्रेस के निष्ठावान सदस्य हैं और उसके लालच तथा अवसरवाद के बावजूद उसमें पड़े हुए हैं. वे वफादार सैनिक की तरह बड़े मधु-पात्र को ले आने में भी मदद करेंगे. लेकिन उसमें अपना हाथ नहीं डालेंगे. हां, किसी कांग्रेसी के लिए वे अजूबा हैं. लेकिन यही वजह है कि उन्हें रक्षा मंत्री बनाया गया और इस पद पर इतने लंबे समय तक रहने वाले वे शायद पहले व्यक्ति हैं.
अंध भक्ति की हद तक मुझे गर्व है कि एंटनी भारत के रक्षा मंत्री हैं. इतने बड़े और महत्वपूर्ण राजनैतिक पद पर वी.के. कृष्ण मेनन के बाद पहली बार कोई मलयाली बैठा है. वैसे, मेनन केवल नाम के लिए मलयाली थे. एंटनी ने बहुत मेहनत से अपनी जगह बनाई और मैकियाविली जैसी चतुराई से कांग्रेस की राजनीति में महारत हासिल की. उस महारत और मीडिया में अपने मित्रों की बनाई गांधीवादी छवि के बूते वे वहां तक पहुंचे जहां पहुंचना चाहते थे. उनके यहां तक पहुंचने में राजकाज करने की उनकी क्षमता का योगदान नहीं है. अब यदि वे केरल लौटते हैं तो मुझे बहुत दुख होगा क्योंकि मुख्यमंत्री ओमान चांडी ने चौबीसों घंटे कड़ी मेहनत कर स्थिति पर काबू पा लिया है और अपने को अलग किस्म का कांग्रेसी मुख्यमंत्री साबित किया है. शासन के मामले में उन्हें मात देना एंटनी के लिए मुश्किल होगा. दरअसल, मलयालियों को अच्युतानंदन के पांच खराब साल के बाद अच्छे शासन की जरूरत है.
ऐसा लगता है कि यहां डॉ. मनमोहन सिंह और एंटनी दोनों के लिए सबक है. दोनों ही व्यक्तिगत रूप से ईमानदार माने जाते हैं. लेकिन यदि आपके क्षेत्र में भ्रष्टाचार फूलता-फलता है और आप उसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाते हैं या उसके बारे में न जानने का बहाना करते हैं तो क्या यह क्षम्य है?
पॉल जकारिया मलयाली लेखक और राजनैतिक टिप्पणीकार हैं

