उस रोज पंजाब में एक बार फिर भयावह यादें ताजा हो गईं. 28 मार्च को प्रदेशभर में भड़क उठे उग्र प्रदर्शनों से 1980 के दौर जैसा सांप्रदायिक तनाव खतरनाक ढंग से फिर उभरने के करीब पहुंच गया. ये प्रदर्शन बेअंत सिंह की हत्या के षड्यंत्र में दोषी पाए गए बब्बर खालसा इंटरनेशनल (बीकेआइ) के आतंकी के मृत्युदंड पर आसन्न अमल को लेकर भड़के थे.
10 मार्च को चंडीगढ़ की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शालिनी नागपाल ने आदेश दिया था कि अगस्त, 1995 में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह एवं 17 अन्य को बम हमले में मौत की नींद सुला देने के लिए जिम्मेदार हत्यारों में से एक, बलवंत सिंह राजोआना को पटियाला जेल में 31 मार्च को फांसी दे दी जाए.
दल खालसा और खालसा एक्शन कमेटी जैसे कट्टरपंथी सिख संगठन इस अलगाववादी संघर्ष में एकजुट हो गए. उन्होंने राजोआना को क्षमादान की मांग शुरू कर दी. इससे पहले इन संगठनों ने मई, 2007 में उत्पात मचाया था.
सिरसा के सच्चा सौदा डेरा प्रमुख राम रहीम सिंह ने अंतिम सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह की नकल का प्रयास किया था और सिख समुदाय इससे नाराज हो गया था. इन संगठनों ने उनके विरुद्ध हिंसात्मक प्रतिक्रिया का नेतृत्व किया था. बेअंत के हत्यारे को फांसी से बचाने के लिए ये संगठन एक बार फिर सक्रिय हो गए.
राज्य सरकार को हस्तक्षेप करने के लिए तब मजबूर होना पड़ा जब सिखों की सर्वोच्च धार्मिक और लौकिक पीठ अकाल तख्त ने घोषणा की कि जेल में बंद हत्यारा 'जिंदा शहीद' है. जत्थेदार गुरुबचन सिंह ने भी मुख्यमंत्री की हत्या करने वाले आत्मघाती हमलावर दिलावर सिंह को मरणोपरांत 'कौमी शहीद' का दर्जा देकर परोक्ष रूप से बेअंत सिंह हत्याकांड से दोषमुक्त कर दिया. उन्होंने 28 मार्च को धार्मिक फरमान जारी कर सिखों से सारे काम बंद करके केसरिया वस्त्र पहनने एवं राजोआना की जिंदगी के लिए अरदास (प्रार्थना) करने को कहा.
सिखों की धार्मिक पीठ के इस अप्रत्याशित हस्तक्षेप से स्थिति के और विस्फोटक होने की आशंका ने प्रदेश के नेतृत्व के लिए एक सजायाफ्ता हत्यारे को फांसी के तख्ते से बचाना अत्यावश्यक बना दिया. राज्य सरकार ने कानूनी हवाला देते हुए राजोआना के मौत के वारंट को लौटा दिया था. लेकिन अदालत ने सरकार के दो प्रयासों को पहले 20 मार्च और फिर 27 मार्च को खारिज कर दिया.
स्पष्ट दबाव और क्षमादान के लिए बढ़ते हुए जनसमर्थन के बीच मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने बेअंत सिंह हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा पाए दो अन्य दोषियों जगतार सिंह हवारा और लखविंदर सिंह की सुप्रीम कोर्ट में लंबित अपीलों का हवाला देते हुए विधानसभा में एक बयान दिया. पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह और बेअंत सिंह का परिवार भी राजोआना को क्षमादान का समर्थन कर रहा है.
28 मार्च को मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से राजोआना को क्षमादान देने का व्यक्तिगत निवेदन करने के लिए मिले. ‘हजारों मासूम जिंदगियों को लील लेने वाली भारी सामाजिक एवं राजनैतिक उथलपुथल’ को याद करते हुए मुख्यमंत्री ने राजोआना के मौत के वारंट से उपजी स्थिति से ‘बुद्धिमानी और दूरदर्शितापूर्वक’ निबटने का आग्रह किया.
उसी शाम राष्ट्रपति ने हत्यारे की तरफ से शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के प्रमुख अवतार मक्कड़ की ओर से दायर दया याचिका गृह मंत्रालय को भेज दी. ऐसे मामलों के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए गृह मंत्रालय ने तत्काल 31 मार्च को फांसी पर अमल करने के आदेश पर तब तक के लिए रोक लगा दी जब तक कि राष्ट्रपति पाटिल एसजीपीसी की याचिका का निबटारा नहीं कर लेतीं.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 29 मार्च को राजोआना मामले में पंजाब सरकार की भूमिका की आलोचना की. न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी और एस.जे. मुखोपाध्याय की पीठ ने कहा, ‘एक मुख्यमंत्री की दिन-दहाड़े हत्या की गई. ऐसे ढेरों मामले हैं जिनमें आतंकी मामलों के दोषी व्यक्तियों ने राजनैतिक समर्थन हासिल कर लिया. ऐसे नेता हैं जो समर्थन हासिल करके सत्ता में आ गए. वे उन्हें कैसे छोड़ सकते हैं?’
इस बीच पंजाब के कट्टरपंथियों की बन आई. उन्होंने अकाल तख्त के 28 मार्च के केसरिया आह्वान को भुनाते हुए असरदार ढंग से बंद आयोजित करवाया, जिससे पंजाब के ज्यादातर कस्बों का जनजीवन ठप पड़ गया. 29 मार्च को गुरदासपुर में एक व्यक्ति की मौत हो गई. शिवसेना के कार्यकर्ताओं ने सरकार के फैसले के विरुद्ध बंद का आयोजन किया था.
पांच साल पहले सीबीआइ की विशेष अदालत ने राजोआना और बब्बर खालसा इंटरनेशनल के प्रमुख आतंकी हवारा को सजा सुनाई थी. बम हमले के तुरंत बाद गिरफ्तार राजोआना ने प्रथम प्रयास के विफल रहने की दशा में सहायक आत्मघाती हमलावर की अपनी भूमिका कबूल की थी.
हवारा की सजा को घटाकर आजीवन कारावास में तब तब्दील कर दिया गया था जब उसने अक्तूबर 2010 में पंजाब हाइकोर्ट में अपनी सजा को चुनौती दी थी. पंजाब पुलिस के पूर्व सिपाही राजोआना ने अपील दायर करने से इनकार किया और अदालत से फांसी के लिए जल्दी की कोई तिथि तय करने की प्रार्थना की थी. यदि उसे फांसी की सजा दी जाती तो 2004 के बाद भारत में यह पहली फांसी होती.

