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गुरूर और गफलत से टीम इंडिया का बेड़ा गर्क

बेपरवाह कप्तान, टीम में आपसी फूट, मेहनत के नाम से बुखार और खुद को खुदा समझने वाले चयनकर्ता और आइपीएल के नाम के बटुए ने भारत के राष्ट्रीय खेल की तस्वीर बिगाड़ी.

महेंद्र सिंह धोनी
महेंद्र सिंह धोनी
अपडेटेड 7 फ़रवरी , 2012

पर्थ में तीसरे क्रिकेट टेस्ट का तीसरा दिन. भारतीय टीम के 30 वर्षीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने रोजाना 200 डॉलर के किराए वाला हयात रीजेंसी होटल का अपना कमरा दो घंटे से ज्‍यादा देर तक खुला रखा. टीम इंडिया के लिए चार टेस्ट की सीरीज में लगातार तीसरी हार का यह दिन था. दरवाजे पर टीम के दो सदस्य आए और पूछा, क्या कोई आने वाला है? धोनी बोले, ‘मैं आप सबका इंतजार कर रहा हूं. क्या हम इस पर बात कर सकते हैं कि आखिर यह हो क्या रहा है?’ लेकिन कोई उनके कमरे में नहीं आया.

तब तक शून्य के मुकाबले तीन मैचों से सीरीज हार चुके ये क्रिकेटर शायद 4 फरवरी से बंगलुरू में शुरू हो रहे इंडियन प्रीमियर लीग (आइपीएल) में अपनी नीलामी के सपने देख रहे थे. जब से 2008 में पैसों का यह खेल शुरू हुआ है, भारत के बड़े खिलाड़ियों के लिए इससे होने वाली कमाई कहीं ज्‍यादा अहम हो गई है. खेल-खेल में शुरू हुआ यह खेल अब असली खेल पर कब्जा करने की स्थिति में आ गया है. ब्रांड फाइनेंस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2011 में आइपीएल की ब्रांड वैल्यू 3.67 अरब डॉलर यानी 18,350 करोड़ रु. थी. ऐसा लग रहा है कि यह तमाशा अब खेल पर भारी पड़ रहा है.

पिछले साल आइपीएल के चौथे सीजन में चेन्नै सुपर किंग्स और मुंबई इंडियंस से खेलते हुए धोनी और सचिन दोनों ने नौ-नौ करोड़ रु. कमाए, जबकि कोलकाता नाइट राइडर्स की कप्तानी करने वाले गौतम गंभीर ने पिछले साल सबसे ज्‍यादा 11 करोड़ रु. की कमाई की. पिछले साल टेस्ट, एकदिवसीय और टी-20 से होने वाली कमाई को मिला लें तो यह उसका पांच गुना बैठती है. प्रथम श्रेणी के बड़े खिलाड़ी टीम में रहने के एवज में सालाना एक करोड़ और प्रति टेस्ट मैच 7 लाख, प्रति एकदिवसीय 4 लाख और प्रति टी-20 मैच 2 लाख कमाते हैं. पिछले साल कुछ क्रिकेटरों ने औसतन 15 टेस्ट और 30 एकदिवसीय मैच खेले और मैच फीस के रूप में उनकी अधिकतम कमाई 2.25 करोड़ रु. रही.

क्रिकेट की इस नई कारोबारी संस्कृति में अच्छे खिलाड़ियों के पास ऐसा कोई मौका नहीं है कि वे अपने खेल को सुधार सकें और टीम इंडिया नाम के एलीट क्लब का हिस्सा बन सकें. यूसुफ पठान को ही लें, जिन्होंने अब तक कोई टेस्ट मैच नहीं खेला लेकिन 2011 में कोलकाता नाइट राइडर्स से आइपीएल में खेलकर 10 करोड़ रु. कमा लिए. या फिर रॉबिन उथप्पा को देखिए जिन्होंने अब तक कोई टेस्ट मैच नहीं खेला है और एकदिवसीय मैच खेले भी उन्हें चार साल हो रहे हैं, बावजूद इसके पुणे वॉरियर्स से पिछले साल खेलकर उन्होंने 10 करोड़ रु. बटोर लिए. अब जरा आइपीएल से होने वाली कमाई की तुलना उस राशि से कर लें जो खिलाड़ियों को क्रिकेट बोर्ड से मिलती है. क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के सबसे ज्‍यादा कमाने वाले खिलाड़ी की आमदनी 7 करोड़ रु. है. इंग्लैंड और वेल्स क्रिकेट बोर्ड की अधिकतम सालाना कांट्रेक्ट राशि 3 करोड़ रु. है. इस विडंबना के सबसे ताजा उदाहरण हैं तेज गेंदबाज 24 वर्षीय उमेश यादव, जो भारतीय क्रिकव्ट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआइ) की कांट्रेक्ट प्रणाली में तीसरी श्रेणी के खिलाड़ी हैं जिन्हें साल में 25 लाख रु. मिलते हैं. इस खिलाड़ी ने 2011 में डेल्ही डेयरडेविल्स से खेलकर 3 करोड़ रु. कमाए. ऑस्ट्रेलिया में उनका प्रभावशाली प्रदर्शन इस बार आइपीएल में उनके दाम को कई गुना बढ़ा देगा. किसी होनहार नौजवान क्रिकेटर के लिए आइपीएल प्रोत्साहनकारी है, तो आलसी खिलाड़ी के प्रदर्शन पर यह बट्टा भी लगा सकता है.

अकेले क्रिकेटर ही नहीं, बीसीसीआइ भी आइपीएल की मुरीद है. बीसीसीआइ ने 2010-11 में 1,667 करोड़ रु. कमाए, जिसमें से 973 करोड़ रु. आइपीएल से आए. बीसीसीआइ की साठ फीसदी कमाई टीवी से होती है और टीवी इंडियन पैसा लीग को बेशुमार प्यार करता है. आइपीएल-4 की औसत टीआरपी 3.91 थी जो पिछले तीनों सीजन के मुकाबले सबसे कम रही. हालांकि भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच शुरुआती तीन टेस्ट के टीआरपी आंकड़ों-0.89, 0.7 और 0.6 के मुकाबले तो यह बेहतर ही थी. आइपीएल-4 में साठ दिन तक चले क्रिकेट के थकाऊ सर्कस से सेट मैक्स को 900 करोड़ रु. की कमाई हुई जिस पर 60 सेकंड विज्ञापन की दर डेढ़ लाख रु. थी. भारत-इंगलैंड सीरीज से ईएसपीएन स्टार स्पोर्ट्स ने 24 दिन में हर 10 सेकंड के लिए 80,000 रु. की दर से 100 करोड़ रु. कमाए.

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व प्रशिक्षक अंशुमन गायकवाड़ कहते हैं, ‘यहां तक कि चयनकर्ता भी जानते हैं कि खिलाड़ी कम-से-कम अवधि में ज्‍यादा से ज्‍यादा कमाना चाहते हैं. टेस्ट में हार की चिंता किसी को नहीं है.’ भारतीय टीम के पूर्व गेंदबाज मनोज प्रभाकर कहते हैं, ‘सबको आइपीएल का एक टुकड़ा चाहिए. आइपीएल से ढेर सारा पैसा आता है जबकि टेस्ट में सिर्फ कांट्रेक्ट और मैच की फीस मिलती है.’

अक्सर आइपीएल का खेल लालच पैदा करने का काम करता है. यहां तक कि कुछ खिलाड़ियों ने लालच में जब अपने देश को छोड़कर किसी क्लब को चुना, तो इस पर काफी विवाद भी हुआ. गंभीर को विश्व कप में कंधे की चोट आ गई थी. यह जानते हुए कि वे फिट नहीं हैं, उन्होंने आइपीएल-4 के सभी 15 मैच खेले. नतीजाः वेस्टइंडीज के जिस दौरे पर उन्हें एकदिवसीय टीम का नेतृत्व करना था, वहां वे नहीं जा सके और दर्द बढ़ने के बाद इंग्लैंड में दो टेस्ट खेलकर बीच में ही लौटना पड़ा.

पैसे और लालच में जब अहं जुड़ जाता है तो यह जहरीला हो जाता है. यही अहं भारतीय क्रिकव्ट की आत्मा को लूट रहा है. यह जहर ऊपर से फैलना शुरू होता है, उस शख्स के साथ जिसने 2007 में टी-20 की पहली श्रृंखला से लेकर आइसीसी विश्व कप 2011 तक भारत को अविजित बनाए रखा और दुनिया में अव्वल टेस्ट टीम का दर्जा भी दिलवाया. टेस्ट मैचों में लगातार आठ बार हारने के बाद (विश्व कप के तुरंत बाद इंग्लैंड में 0-4 से हार और अब ऑस्ट्रेलिया में 0-4 से हार) यह शख्स न केवल हारा हुआ बल्कि खीझा हुआ भी लगता है. पर्थ में भारत को एक पारी और 37 रनों से समेटने के कुछ मिनट बाद ही धोनी ने पुरस्कार समारोह में टीम के साथ जाने से इनकार कर दिया. कोच डंकन फ्लेचर के मनाने पर वे इसमें आए.

लगातार हुई हार ने नौजवानों से बनी एक अव्वल टीम को थकी-हारी सवारियों के झुंड में तब्दील कर डाला है. इनमें न मैदान पर, न नेट पर और न ही होटल में कोई सामूहिकता दिखती है. टीम में कुछ ने यह भांपते हुए कि टेस्ट टीम की कमान उप-कप्तान वीरेंद्र सहवाग को दे दी जाएगी, उनका दामन थाम लिया है लेकिन इससे नुकसान ही हुआ है. इसको लेकर कई अफवाहें भी उड़ी हैं लेकिन धोनी ने बीसीसीआइ के अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन को यह बात बताने की कोई जरूरत नहीं महसूस की कि इससे उन्हें कोई दिक्कत हो रही है. कभी खिलाड़ियों को प्रेरक एसएमएस भेजने वाले धोनी अब होटल के कमरे में अपनी पत्नी साक्षी के साथ पड़े रहते हैं. श्रीनिवासन हालांकि टीम में पड़ रही इस फूट से वाकिफ हैं. उन्होंने इंडिया टुडे को बताया, ‘मैं ड्रेसिंग रूम में अहं के टकराव की बातें सुनता रहता हूं. हालांकि ये दोनों (धोनी और सहवाग) किसी भी मतभेद को सुलझा पाने में सक्षम हैं.’

लेकिन धोनी की निराशा काफी गहरी है. दोस्तों से निजी बातचीत में उन्होंने कई बार के. श्रीकांत के नेतृत्व वाली चयन समिति के प्रति अपनी निराशा जताई है. धोनी के प्रायोजकों का प्रबंधन करने वाली कंपनी रिती स्पोर्ट्स मैनेजमेंट में उनके पार्टनर अरुण पांडे कहते हैं, ‘मैंने अकसर उससे कहा है कि उन्हें अपनी चिंताएं जाहिर करनी चाहिए, लेकिन मुझे शक है कि वे बोलेंगे.’ धोनी के पुराने साथी और झारखंड रणजी टीम के सदस्य संतोष लाल कहते हैं, ‘मुझे शक है कि वे हालात ठीक कर पाएंगे. टीम में कोई भी उनके हिसाब से नहीं सोचता.’

धोनी ने मोटे तौर पर अपनी निराशा के संकेत भी दिए हैं. पिछले साल जून में इंग्लैंड के खिलाफ पहले टेस्ट के पहले दिन जब जहीर खान की नस खिंच गई, तो धोनी ने अपने विकेटकीपिंग पैड उतारकर खुद गेंदबाजी संभाल ली. खान के बाद टीम में सिर्फ तीन गेंदबाज रह गए थे. भारतीय टीम के पूर्व कप्तान कपिल देव कहते हैं, ‘जिस टीम में चार विशेषज्ञ गेंदबाज थे, उसमें जख्मी खान को रखना जोखिम भरा काम था. आखिर चयनकर्ताओं से वे बात क्यों नहीं कर सकते?’

इसका जवाब यह है कि शायद चयनकर्ता धोनी की सुनते नहीं हैं. पिछले साल अगस्त-सितंबर में इंग्लैंड की हार को लें. धोनी ने पहले ही चेतावनी दी थी कि चोटिल खिलाड़ियों को न रखा जाए, इसके बावजूद चयनकर्ताओं ने खान, गंभीर, सहवाग, युवराज और हरभजन को टीम में शामिल किया. सूची में नाम आते ही उन्हें फिट घोषित कर दिया गया. लेकिन इसके तुरंत बाद दिक्कतें शुरू हो गईं. पहले खान नस खिंचने के कारण बाहर गए, उसके दो मैच बाद गंभीर को जाना पड़ा. कान में रुई डालकर बैटिंग कर रहे सहवाग को बाद में सुनने की दिक्कत के कारण बाहर जाना पड़ा. टूटे हुए अंगूठे के साथ पहले युवराज और बाद में नस खिंचने के चलते हरभजन को टीम से बाहर निकलना पड़ा. गायकवाड़ कहते हैं, ‘चयनकर्ता इसके लिए बोर्ड के प्रति जवाबदेह होने चाहिए.’

इंग्लैंड में विश्व कप जीतने और आइपीएल का चौथा सीजन खेलने के बाद ऐसा लगा जैसे भारतीय क्रिकेटर काफी संतुष्ट हो चुके हैं. उनके लिए टेस्ट मैच जरूरी नहीं रह गया था. ईएसपीएन के कमेंटेटर हर्ष भोगले कहते हैं, ‘इंग्लैंड में क्रिकेट नहीं हुआ, वह तो बड़ी पार्टी थी.’ चार टेस्ट हारने वाली भारतीय क्रिकेट टीम का चयन 26 नवंबर को बंगलुरू में हुआ था. धोनी ने तमिलनाडु के बल्लेबाज अभिनव मुकुंद और हरभजन को लाने के लिए पूरा जोर लगाया था, लेकिन उनकी नहीं मानी गई. चयन प्रक्रिया में उनके मत को शामिल करने की मांग को भी खारिज कर दिया गया. पांचों चयनकर्ता-मोहिंदर अमरनाथ, राजा वेंकट, नरेंद्र हिरवानी, सुरेंद्र भावे और मुख्य चयनकर्ता के. श्रीकांत वी.वी.एस. लक्ष्मण और राहुल द्रविड़ को हटाने के खिलाफ थे. सचिन को तो खैर टीम में होना ही था. इन तीनों को रखा जाना महज भावना का सवाल नहीं है-बीसीसीआइ जानता है कि टीवी के दर्शक परिचित चेहरों को ही देखना पसंद करते हैं.

इस सबका नतीजा यह हुआ है कि धोनी के नेतृत्व पर असर पड़ा है. अब वे खेल को पलट देने वाले शख्स नहीं रहे, जिनके बारे में पूर्व ऑस्ट्रेलियाई कप्तान इयान चैपल कहते हैं कि वे कभी ‘साहसिक फैसले करते थे.’ लेकिन अब प्रयोग किए जा रहे हैं. पर्थ टेस्ट में ऑफ स्पिनर आर. अश्विन को बाहर रखते हुए धोनी ने 27 वर्षीय तेज गेंदबाज विनय कुमार को लिया और सिर्फ तेज गेंदबाजों को आक्रमण पर लगाया. भारतीय टीम के पूर्व प्रशिक्षक गैरी कर्स्टन ने केपटाउन से इंडिया टुडे को बताया, ‘ऑस्ट्रेलिया में धोनी के हाथ में कमान नहीं थी.’

यदि टीम में एक स्पिनर को रख लिया जाता तो वह पर्थ में कम से कम एक दिन तो निकाल ही देता. गेंदबाजी के नए प्रशिक्षक दक्षिण अफ्रीकी एरिक साइमंस भी इस मामले में बराबर के दोषी हैं. दूसरी ओर, मुख्य प्रशिक्षक फ्लेचर चुप्पी ओढ़े हुए हैं जिससे किसी को कोई फायदा नहीं हो रहा. टीम में प्रेरक भाषण देने वाले पैडी अपटन कर्स्टन के साथ ही चले गए थे. मैदान में पूरी टीम ढीली दिखी और क्षेत्ररक्षण लचर था, लेकिन किसी ने भी फिटनेस प्रशिक्षक रामजी श्रीनिवासन पर उंगली नहीं उठाई. टेस्ट श्रृंखला के दौरान कम से कम चार बार टीम ने अभ्यास नहीं किया. मैदान में पसीना बहाने की बजाए मेलबर्न के समुद्र तट पर आराम फरमाती टीम की तस्वीरों ने लापरवाही की झलक पेश कर दी.

क्रिकेट प्रेमियों को जो संदेश गया वह साफ हैः पैसा बेरुखी पैदा करता है. विडंबना देखिए कि यही पैसा बीसीसीआइ को मजबूर कर रहा है कि वह चीजों को दुरुस्त करे. बोर्ड ने ऑस्ट्रेलिया में हुई हार समेत कई चीजों पर चर्चा के लिए 12 फरवरी को एक बैठक बुलाई है. राष्ट्रीय स्तर पर चयन को आकार देने के लिए बैठक में बोर्ड की तकनीकी कमेटी के अध्यक्ष और कमेंटेटर सौरव गांगुली को भी बुलाया गया है.

हो सकता है कि धोनी इस मुश्किल में भी कोई मौका तलाश रहे हों कि बोर्ड टेस्ट टीम के लिए अलग कप्तान नियुक्त कर दे ताकि वे एकदिवसीय और छोटे संस्करणों पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकें. अगर 31 जनवरी की उनकी टिप्पणी को देखें तो ऐसा लगता है कि उनकी ऐसी ही योजना है, ‘कप्तानी सिर्फ एक पद है जिस पर मैं हूं. अगर मेरी जगह कोई बेहतर आता है, तो उसका स्वागत है.’ उनके पिता पान सिंह ने रांची में कहा कि ‘मेरा बेटा किसी चीज से चिपका नहीं रहेगा’. धोनी ने इससे पहले 12 जनवरी को टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेने का संकेत दिया था ताकि वे 2015 के विश्व कप पर अपना ध्यान लगा सकें. पिछले साल 26 अक्तूबर को कोलकाता में बीसीसीआइ की सालाना आम बैठक में अलग-अलग कप्तानों पर चर्चा भी हुई, लेकिन कोई निष्कर्ष नहीं निकला. हालांकि इस बात कि चर्चा आम है कि टेस्ट को अलविदा कहने की धोनी की योजना को बीसीसीआइ अध्यक्ष श्रीनिवासन का समर्थन हासिल है.

सवाल है कि क्या आइपीएल भारत में टेस्ट क्रिकेट को खा जाएगा? इतना तय है कि यह खिलाड़ियों को थका जरूर देगा. पिछले साल 2 अप्रैल को विश्व कप का प्रचार थमने के बाद से भारत ने 10 टेस्ट , 20 एकदिवसीय और 3 टी-20 खेले हैं. इसके मुकाबले ऑस्ट्रेलिया ने सात टेस्ट, 11 एकदिवसीय और 2 टी-20 खेले हैं. उस पर भी यह मत भूलिए कि चीयरलीडरों, ऐयाशी भरी पार्टियों और अपने निवेश को चूस लेने के लिए बेताब टीम मालिकों के बीच ऐसे कई खिलाड़ी हैं जिनकी तपस्या भंग नहीं हुई है. ऐसे में 2011 के चैंपियनों के चेहरे पर 2012 में निराशा दिखती है, तो इसमें आश्चर्य कैसा!
-साथ में कौशिक डेका

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