दूरसंचार विभाग में सचिव रहे सिद्धार्थ बेहुरा सेवानिवृत्त होने के बाद दिल्ली में आराम की जिंदगी गुजार रहे थे. लेकिन 2 फरवरी को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) ने उन्हें और पूर्व केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ए.राजा के निजी सचिव आर.के. चंदोलिया को गिरफ्तार कर लिया. उसके बाद से वे तिहाड़ की जेल नंबर एक में कैद हैं. उनकी गिरफ्तारी के तीन दिन बाद उनकी पत्नी अंजू को स्तन के ऑपरेशन के लिए इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. वे अगले दो हफ्तों तक बेहुरा से नहीं मिल सकीं, क्योंकि इंफेक्शन के डर से उन्हें अलग रखा गया था.
एक ही झ्टके में उनके परिवार पर दोहरी मुसीबतें टूट पड़ीं- एक तरफ अस्पताल का बिल 8 लाख रु. हो गया तो दूसरी तरफ शुरुआती हफ्तों में ही कानूनी खर्च 15 लाख रु. पहुंच गया था.
बेहुरा 1 जनवरी, 2008 से 30 सितंबर, 2009 तक दूरसंचार सचिव थे. उन्हें सरकारी खजाने को घाटा पहुंचाने में सांठगांठ करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. सीएजी के मुताबिक यह घाटा 1.76 लाख करोड़ रु. का है. सीबीआइ के आरोप पत्र के अनुसार घाटे की रकम 22,000 करोड़ रु. है.
बेहुरा की दलील है कि जिस नीतिगत फैसले के कारण यह घाटा हुआ, वह मंत्रालय में उनके आने से पहले ही किया गया था. वे तो सिर्फ उस नीतिगत फैसले के अनुसार काम कर रहे थे, जिसकी जानकारी वित्त और कानून मंत्रालय के साथ-साथ प्रधानमंत्री कार्यालय को भी थी.
बेहुरा को जब चार महीने पहले गिरफ्तार किया गया तो उससे 18 महीने पहले वे रिटायर हो चुके थे. उनकी गिरफ्तारी ने परिवार को पूरी तरह झ्कझेर कर रख दिया. उनके एक रिश्तेदार के मुताबिक, ''परिवार के लोगों को बहुत कम समय में भारी रकम का इंतजाम करना पड़ा. उनके बच्चे इस खर्च को भर रहे हैं. जो कुछ बचत की गई थी, वह खत्म हो रही है.'' उधर, बेहुरा ने जेल के जीवन से तालमेल बैठा लिया है. एक रिश्तेदार बताते हैं, ''उन्होंने हमेशा सादगी भरा जीवन जिया, इसलिए शारीरिक रूप से जेल का जीवन जीना उनके लिए कठिन नहीं है...वे नाराज या कटु नहीं हैं, लेकिन आहत जरूर हैं. यह दुखद स्थिति है, जो उन्हें झेलनी पड़ रही है.
उन्हें उम्मीद थी कि सीबीआइ उन पर आरोप लगाने से पहले उनकी 35 साल की बेदाग सेवा को जरूर ध्यान में रखेगी. लेकिन कोई जांच नहीं की गई. उन्हें सीधे जेल में ठूंस दिया गया.''
बेहुरा की जमानत याचिका को यह कहकर दो बार खारिज कर दिया गया कि अगर उन्हें छोड़ा गया तो वे जांच पर उलटा प्रभाव डाल सकते हैं.
सीबीआइ ने अदालत में दलील दी कि बेहुरा, जो दूरसंचार सचिव के महत्वपूर्ण पद पर थे, चाहते तो राजा की किसी नीति पर अपनी असहमति होने पर कैबिनेट से शिकायत कर सकते थे. जांच एजेंसी ने सीबीआइ कोर्ट को बताया, ''सेवा नियमों के मुताबिक वे (बेहुरा) मंत्री (राजा) के गैरकानूनी आदेशों का पालन करने को बाध्य नहीं थे.''
बेहुरा के वकील अमन लेखी का तर्क था कि नीति में कोई भी ''दिखने वाली अवैधता'' नहीं थी. वे कहते हैं, ''सरकार में प्रधानमंत्री से ज्यादा क्या कोई और महत्वपूर्ण होता है? कोई नहीं. कोई नहीं हो सकता.'' अदालत ने बेहुरा की दलील को खारिज करते हुए सरकारी अधिकारियों के बीच फैले भ्रष्टाचार पर चिंता जाहिर की है, जिससे देश को क्षति पहुंच रही है.
अदालत कहती है, ''यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह देश की अर्थव्यवस्था पर विपरीत असर डाल रहा है और भ्रष्टाचार के आकार को देखते हुए कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत ये अपराध बेहद गंभीर हैं.''
दिल्ली सर्कल में स्वान टेलीकॉम को स्पेक्ट्रम आवंटित किया गया था, जबकि दोहरी तकनीकी की खातिर स्पेक्ट्रम के आवंटन के लिए टाटा टेलीसर्विसेज की ओर से एक आवेदन लंबित पड़ा था. टाटा सर्विसेज का कहना था कि मौजूदा लाइसेंसी होने के कारण वह इसका हकदार था. न्यायाधीश का कहना है कि मौजूदा सबूतों के आधार पर बेहुरा और राजा ने इस आवंटन में विशेष भूमिका निभाई.
लेखी का कहना है कि अदालतें आक्रामक मूड में हैं. ''मैं एक शो ट्रायल की प्रवृत्ति देख रहा हूं, जहां पहले से ही किसी को अपराधी मान लिया जाता है. अदालतें जन भावनाओं से प्रभावित हो रही हैं.'' जहां तक बेहुरा का मामला है, इस मुद्दे पर पूरी स्पष्टता है. बेहुरा के पूर्ववर्ती अधिकारी डी.एस. माथुर को, जो नीति निर्माण का हिस्सा थे और जिन्होंने लिखित रूप से नीति व मंत्री का बचाव किया था, आरोपित नहीं बनाया गया, बल्कि उस आदमी को आरोपित बनाकर जेल में डाल दिया गया जिसने सिर्फ उस नीति का पालन किया.
पटियाला हाउस कोर्ट में विशेष सीबीआइ जज ओ.पी. सैनी ने सुनवाई को 4 जुलाई तक टाल दिया है, इसलिए अंजू अपने पति से मिलने हफ्ते में दो बार जेल जाती हैं. वे अपने साथ घर का बना खाना ले जाती हैं. उनके दो बच्चे-एक बेटा और एक बेटी- विदेश में काम करते हैं. बेटा अनुपम (33 वर्ष) हांगकांग में बैंकर है और बेटी राधिका (29 वर्ष) बैंकॉक में संयुक्त राष्ट्र में काम करती है. अंजू को कीमोथेरेपी के लिए खुद ही अस्पताल जाना पड़ता है. बच्चों से मिलने वाली मदद के अलावा पति-पत्नी के पास पेंशन ही आय का एकमात्र स्त्रोत है.

