
लखनऊ में पिछले कई दिनों से धरना दे रहे 57 हजार से अधिक पंचायत सहायकों के लिए 16 सितंबर का दिन अहम रहा. सरकार ने उनका मासिक मानदेय 6,000 रुपए से बढ़ाकर 9,000 रुपए कर दिया. यानी सीधे 50 फीसदी की बढ़ोतरी. लेकिन घोषणा केवल मानदेय तक सीमित नहीं रही.
महिला पंचायत सहायकों को मातृत्व अवकाश, सहायकों और उनके परिवारों को कैशलेस इलाज, आंदोलन के दौरान दर्ज मुकदमों को वापस लेने और हटाए गए सहायकों को बहाल करने का फैसला भी हुआ. सरकार ने यह भी तय किया कि पंचायत सहायकों को मनमाने तरीके से हटाया नहीं जा सकेगा. इसके लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता वाली समिति की मंजूरी जरूरी होगी.
मानदेय का भुगतान डीबीटी के जरिए सीधे बैंक खाते में करने की बात भी कही गई है. इन आश्वासनों के बाद आंदोलन खत्म हुआ.
इस फैसले को सिर्फ 3,000 रुपए की मासिक बढ़ोतरी के तौर पर देखने के बजाय उस व्यापक नीति के हिस्से के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें कम वेतन या मानदेय पर सरकारी व्यवस्था में काम कर रहे लोगों को आर्थिक सुरक्षा के साथ स्वास्थ्य और सेवा संबंधी सुरक्षा देने की कोशिश हो रही है.
पंचायत सहायक गांव की प्रशासनिक व्यवस्था में ग्राम पंचायत और ग्रामीणों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं. ऐसे में उनका मानदेय बढ़ना और सेवा सुरक्षा का दायरा बढ़ना सीधे ग्रामीण क्षेत्र तक पहुंचने वाला फैसला है.
इससे पहले अगस्त में सरकार ने करीब 3.53 लाख मिड-डे मील रसोइयों का मानदेय 2,000 से बढ़ाकर 3,000 रुपए महीना किया. इसके साथ 5 लाख रुपए तक का कैशलेस स्वास्थ्य कवर, दुर्घटना में 2 लाख रुपए की सहायता और वर्दी के लिए मिलने वाली राशि को 500 से बढ़ाकर 1,000 रुपए करने का ऐलान हुआ.
रसोइयों को साल में दस महीने मानदेय मिलता है. यहां भी सरकार ने केवल रकम नहीं बढ़ाई. स्वास्थ्य खर्च और दुर्घटना जैसे जोखिम को भी सुरक्षा कवच में शामिल किया. खास बात यह है कि रसोइयों में बड़ी संख्या महिलाओं की है. इसलिए यह फैसला एक साथ रोजगार, महिला और सामाजिक सुरक्षा के सवाल से जुड़ता है.

सितंबर में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को लेकर भी इसी तरह का फैसला हुआ. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 8 सितंबर को अयोध्या में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का मानदेय 8,000 से बढ़ाकर 12,000 रुपए करने की घोषणा की.
सहायिकाओं के मानदेय में भी बढ़ोतरी और स्वास्थ्य बीमा की सुविधा की घोषणा हुई. कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं की संख्या क्रमशः करीब 1.89 लाख और 1.39 लाख बताई गई है.
राजनीतिक विश्लेषक और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रोफेसर सुशील पांडेय कहते हैं. “पंचायत सहायकों के मानदेय में 50 फीसदी बढ़ोतरी से लेकर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, मिड-डे मील रसोइयों और आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए बढ़ी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा तक, उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले योगी सरकार की कल्याणकारी राजनीति का एक नया पैटर्न उभर रहा है.”
पांडेय के मुताबिक सरकार का जोर केवल खाते में रकम पहुंचाने पर नहीं, बल्कि नियमित मानदेय, पेंशन, कैशलेस इलाज, बीमा और नौकरी की सुरक्षा जैसे ऐसे लाभों पर है जिनका असर लंबे समय तक बना रहे. यह परिवर्तन ‘लाभार्थी राजनीति’ अब ‘सुरक्षा के लाभार्थी’ की ओर बढ़ रहा है.”
लाभार्थी का दायरा बड़ा
योगी सरकार की इस रणनीति का दूसरा बड़ा हिस्सा सामाजिक पेंशन है. वृद्धावस्था, निराश्रित महिला और दिव्यांगजन पेंशन को 1,000 रुपए से बढ़ाकर 1,500 रुपए प्रतिमाह करने की घोषणा 2026 के बजट सत्र में की गई थी. सरकार के आंकड़ों के मुताबिक इन तीन योजनाओं में करीब 1.18 करोड़ लाभार्थी हैं. इनमें लगभग 67.50 लाख वृद्धावस्था पेंशन, 38.58 लाख निराश्रित महिला और 11.50 लाख से अधिक दिव्यांगजन पेंशन के लाभार्थी बताए गए हैं.
पेंशन की यह बढ़ोतरी भी सीधे नकद लाभ है, लेकिन इसकी प्रकृति एकमुश्त सहायता की नहीं बल्कि नियमित सामाजिक सुरक्षा की है. 2017 से पहले इन योजनाओं में 300 या 500 रुपए की मासिक सहायता थी.

योगी सरकार ने इसे पहले 1,000 रुपए किया और 2022 के विधानसभा चुनाव के संकल्प पत्र में 1,500 रुपए करने का वादा किया था. सरकार ने अब उसी वादे को लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया है.
इसी तरह कैशलेस इलाज का दायरा भी लगातार बढ़ाया जा रहा है. फरवरी में विधानसभा में मुख्यमंत्री ने आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं के मानदेय में बढ़ोतरी के साथ शिक्षामित्रों और अनुदेशकों की चिंताओं का भी उल्लेख किया था. उन्होंने यह भी कहा था कि कर्मचारियों और संबंधित वर्गों को पांच लाख रुपए तक कैशलेस इलाज की सुविधा दी जा रही है.
अगस्त में मिड-डे मील रसोइयों को पांच लाख रुपए तक का कैशलेस स्वास्थ्य कवर दिया गया और सितंबर में शिक्षकों, पीआरडी जवानों, रसोइयों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं समेत कई वर्गों तक परिवार सहित कैशलेस चिकित्सा सुविधा का विस्तार किया गया.
स्वास्थ्य सुविधा को 2027 की चुनावी राजनीति में प्रमुख मुद्दे के तौर पर पेश करने की कोशिश के रूप में भी इस विस्तार को देखा जा रहा है. सुशील पांडेय कहते हैं, “यहां सरकार की नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है. लाभार्थी को केवल यह नहीं बताया जा रहा कि उसे सरकार से कितने रुपए मिले, बल्कि यह भी कि बीमारी की स्थिति में इलाज का खर्च कैसे बचेगा, दुर्घटना की स्थिति में परिवार को कितनी सहायता मिलेगी और नौकरी या मानदेय का भुगतान किस तरह नियमित किया जाएगा.”
आउटसोर्स कर्मचारी भी नए सुरक्षा घेरे में
इस मॉडल का सबसे व्यापक प्रयोग आउटसोर्स कर्मचारियों के मामले में दिखाई देता है. सितंबर में उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम यानी UPCOS की शुरुआत की गई. सरकार के मुताबिक इसका लक्ष्य करीब 3.5 लाख आउटसोर्स कर्मचारियों और उनके परिवारों को एक अधिक व्यवस्थित सामाजिक सुरक्षा ढांचे में लाना है.
नई व्यवस्था में कर्मचारियों का पारिश्रमिक सीधे बैंक खाते में पहुंचाने, ईपीएफ और ईएसआई का नियमित भुगतान सुनिश्चित करने, सर्विस चार्ज के नाम पर कर्मचारी के वेतन से कटौती रोकने और भर्ती, उपस्थिति, भुगतान तथा शिकायतों की डिजिटल निगरानी की बात कही गई है.
दुर्घटना की स्थिति में श्रेणी के अनुसार 20 से 40 लाख रुपए तक का बीमा कवर प्रस्तावित है. इसके अलावा स्वास्थ्य बीमा, आपात चिकित्सा, शिक्षा और परिवार से जुड़ी दूसरी सहायता का भी प्रावधान बताया गया है.

आउटसोर्स कर्मचारियों का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह युवाओं और रोजगार से सीधे जुड़ा है. सरकारी विभागों में काम करने वाला कर्मचारी सरकारी तंत्र का हिस्सा होते हुए भी नियमित सरकारी कर्मचारी नहीं होता. इसलिए वेतन में कटौती, भुगतान में देरी, एजेंसी बदलने पर नौकरी का संकट और सामाजिक सुरक्षा का अभाव लंबे समय से इस वर्ग की प्रमुख चिंताओं में रहे हैं. UPCOS के जरिए सरकार इन्हीं कमजोरियों को संबोधित करने का दावा कर रही है.
राजनीतिक अर्थशास्त्र के स्तर पर इसे ‘लाभार्थी’ की परिभाषा के विस्तार के तौर पर देखा जा सकता है. पहले लाभार्थी का मतलब गरीब परिवार, किसान, महिला, बुजुर्ग या किसी विशेष सरकारी योजना का पात्र व्यक्ति था. अब सरकारी व्यवस्था में काम करने वाला मानदेय कर्मी और आउटसोर्स कर्मचारी भी एक विशिष्ट लाभार्थी समूह के रूप में सामने है.
विपक्ष की नकद गारंटी
दिलचस्प बात यह है कि सरकार की कल्याणकारी घोषणाओं के जवाब में विपक्ष भी अपनी योजनाओं और गारंटियों का खाका सामने ला रहा है. समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अगस्त में घोषणा की कि सत्ता में आने पर समाजवादी पेंशन योजना फिर शुरू की जाएगी और महिलाओं को सालाना 40 हजार रुपए दिए जाएंगे.
आंगनबाड़ी मानदेय बढ़ाने के सरकार के फैसले पर अखिलेश यादव ने सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार ने इतने वर्षों में इन कर्मियों की समस्याओं का समाधान क्यों नहीं किया. अप्रैल में शिक्षामित्रों के मानदेय में वृद्धि पर भी उन्होंने इसे दिखावटी बताया था.
दूसरी तरफ BJP इसे अपनी सरकार की सामाजिक सुरक्षा नीति और शासन के कामकाज से जोड़ रही है. यानी 2027 के विधानसभा चुनाव की राजनीति में अब सवाल केवल यह नहीं है कि सरकार कितनी रकम सीधे खाते में भेजती है.
सवाल यह भी है कि किस वर्ग को कितनी नियमित आय मिल रही है, किसे स्वास्थ्य सुरक्षा मिल रही है, किसके परिवार को दुर्घटना या बीमारी के समय आर्थिक सहारा मिलेगा और किस कर्मचारी को अपने मानदेय या नौकरी की सुरक्षा का भरोसा है.
यहीं योगी सरकार के मौजूदा फैसलों को ‘नकद नहीं, सुरक्षा का सहारा’ वाले मॉडल के रूप में देखा जा सकता है. हालांकि इसे सीधे चुनावी लाभ में बदलने का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी.
2024 के लोकसभा चुनाव ने भी दिखाया था कि सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने के बावजूद मतदाता रोजगार, महंगाई, आरक्षण, स्थानीय समस्याओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे दूसरे मुद्दों पर अपनी राय बना सकते हैं.
कल्याणकारी योजनाएं राजनीतिक व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन उनका असर एक जैसा या स्वतः निर्धारित नहीं होता. वास्तविक राजनीतिक असर आखिरकार घोषणाओं से ज्यादा इस बात पर निर्भर करेगा कि घोषित सुविधाएं कितनी नियमित, पारदर्शी और व्यापक रूप से जमीन पर पहुंचती हैं.

