
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार ने युवाओं पर अपना फोकस और तेज कर दिया है. स्वतंत्रता दिवस पर घोषित ‘इंटीग्रेटेड यूथ पॉलिसी’ इसी रणनीति का सबसे नया और बड़ा संकेत है.
सरकार की प्रस्तावित नीति 16 से 35 वर्ष के युवाओं को एक साझा फ्रेमवर्क में लाने की कोशिश है, जिसमें शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार, उद्यमिता, डिजिटल सशक्तिकरण, स्वास्थ्य, खेल, नेतृत्व और संस्कृति जैसे क्षेत्र शामिल होंगे. लेकिन इस पहल को केवल एक नई सरकारी नीति के तौर पर देखना अधूरा होगा.
इसके पीछे उस युवा बेचैनी को समझने की कोशिश भी है, जो पिछले कुछ महीनों में प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक, भर्ती में देरी और रोजगार के सवालों को लेकर सड़कों से सोशल मीडिया तक दिखाई दी है.
जुलाई में लखनऊ समेत कई शहरों में छात्रों के प्रदर्शन और देशव्यापी Gen Z आंदोलन ने राजनीतिक दलों को यह संकेत दे दिया कि नई पीढ़ी को केवल योजनाओं के लाभार्थी के रूप में संबोधित करना पर्याप्त नहीं होगा.
नौकरी-परीक्षा पर सीधा फोकस
योगी सरकार की नई पहल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें युवाओं की सबसे बड़ी चिंता, यानी रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं को सीधे केंद्र में रखा गया है. प्रस्तावित व्यवस्था में मुख्यमंत्री अभ्युदय कोचिंग योजना को विश्वविद्यालयों और कॉलेज परिसरों तक ले जाने की तैयारी है.

अभी प्रदेश के 75 जिलों में करीब 163 अभ्युदय कोचिंग सेंटर संचालित हैं. सरकार इनकी संख्या 300 से अधिक करने और सुविधा को तहसील स्तर तक पहुंचाने पर विचार कर रही है. यानी जिस युवा को UPSC, JEE, NEET या दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बड़े शहरों में महंगी कोचिंग का सहारा लेना पड़ता है, उसे अपने ही जिले या कॉलेज में तैयारी का विकल्प देने की कोशिश है.
ऑनलाइन कोचिंग और एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म की योजना भी इसी दिशा में है, जहां करियर गाइडेंस, छात्रवृत्ति, रोजगार और दूसरी युवा सेवाएं एक जगह उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है. इसमें IAS और IPS अधिकारियों को मेंटर बनाने का विचार भी महत्वपूर्ण है.
मेडिकल प्रवेश की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए नए डॉक्टरों को भी मेंटर के तौर पर जोड़ने पर विचार हो रहा है. इसका उद्देश्य सिर्फ पढ़ाई में मदद करना नहीं, बल्कि युवाओं को उन लोगों के अनुभव से जोड़ना है जो हाल ही में इसी प्रतिस्पर्धी व्यवस्था से निकलकर आए हैं.
युवा मामलों के जानकार और मेरठ विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर विवेक नौटियाल के मुताबिक ये बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज का प्रतियोगी छात्र केवल नौकरी नहीं मांग रहा. वह परीक्षा की निष्पक्षता, समय पर परिणाम, भर्ती कैलेंडर और सिस्टम में भरोसा भी चाहता है.
बेरोजगारी ऐसा मुद्दा है जो जाति, क्षेत्र और समुदाय की सीमाओं को पार कर युवाओं को जोड़ता है. इसका हवाला देते हुए विवेक नौटियाल कहते हैं, “कोई भी सरकार Gen Z को नजरअंदाज नहीं कर सकती.” यह बात यूपी के संदर्भ में और महत्वपूर्ण हो जाती है. 2024 के लोकसभा चुनाव में BJP के अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन के कारणों में भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक को लेकर युवाओं की नाराजगी को पार्टी के भीतर भी महत्वपूर्ण मुद्दा माना गया था.
युवा आयोग की तैयारी
इंटीग्रेटेड यूथ पॉलिसी के साथ प्रस्तावित राज्य युवा आयोग इस रणनीति का दूसरा बड़ा हिस्सा है. सरकार एक ऐसी संस्था बनाने पर विचार कर रही है जो युवाओं से जुड़ी योजनाओं की निगरानी करे, उनके प्रभाव का आकलन करे और बदलती जरूरतों के अनुसार सरकार को सुझाव दे.

इस बिंदू पर सरकार की रणनीति रोजगार या कोचिंग से आगे जाती दिखाई देती है. Gen Z की राजनीतिक आदत पिछली पीढ़ियों से अलग है. यह पीढ़ी सोशल मीडिया पर सवाल उठाती है, ऑनलाइन अभियान चलाती है और मुद्दे के आधार पर तेजी से संगठित हो सकती है.
ऐसे में सरकार के सामने चुनौती केवल उन्हें नौकरी या कोचिंग उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि उनके साथ संवाद का स्थाई तंत्र बनाने की भी है. लखनऊ में सरोजनीनगर से BJP विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने जुलाई में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर ‘यूथ एडवाइजरी काउंसिल’ बनाने का प्रस्ताव भेजा था.
डॉ. सिंह ने सुझाव दिया था कि 18 से 35 वर्ष के युवाओं को सीधे नीति निर्माण में शामिल किया जाए और परिषद में प्रतियोगी परीक्षा के अभ्यर्थियों, शोधकर्ताओं, स्टार्ट-अप उद्यमियों, वैज्ञानिकों, खिलाड़ियों और किसानों को प्रतिनिधित्व मिले.
राजेश्वर सिंह ने कहा था कि युवाओं को केवल सरकारी योजनाओं के लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि नीति निर्माण के सक्रिय साझेदार के रूप में देखना चाहिए. उनका तर्क है कि AI, बदलते रोजगार बाजार, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्ट-अप और प्रतियोगी परीक्षाओं की बदलती प्रकृति सरकार और युवाओं के बीच लगातार संवाद की मांग करती है.
प्रस्तावित युवा आयोग इसी जरूरत को संस्थागत रूप देने की कोशिश माना जा सकता है. युवा कल्याण और खेल राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार गिरीश चंद्र यादव कहते है कि सरकार मौजूदा पॉलिसी फ्रेमवर्क को मजबूत कर उसे युवाओं की आज की जरूरतों के अनुरूप बनाने की कोशिश कर रही है.

यादव के मुताबिक इंटीग्रेटेड यूथ पॉलिसी पर काम शुरू हो चुका है और युवा आयोग पर भी बातचीत होगी. सरकार के सामने हालांकि सबसे बड़ी चुनौती करीब 90 ऐसी योजनाओं को एक साझा फ्रेमवर्क में लाने की है, जिनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध युवाओं से है.
‘जॉब सीकर’ से ‘जॉब क्रिएटर’ तक
योगी सरकार की युवा रणनीति का एक दूसरा पहलू रोजगार को सरकारी नौकरी से आगे ले जाना है. 2026-27 के बजट में AI, डिजिटल अर्थव्यवस्था, कौशल विकास, उद्यमिता और नए रोजगार क्षेत्रों पर जोर दिया गया है.
मुख्यमंत्री ने भी यूपी को निवेश के साथ-साथ रोजगार पैदा करने वाली अर्थव्यवस्था बनाने की बात कही है. यह बदलाव जरूरी भी है क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं की दुनिया में सीमित सरकारी पदों के लिए लाखों युवाओं की दौड़ चल रही है.
हर युवा को सरकारी नौकरी मिलना संभव नहीं है इसलिए स्टार्ट-अप, स्वरोजगार, डिजिटल काम, AI और नई तकनीक आधारित रोजगार को समान महत्व देना सरकार के लिए दीर्घकालिक समाधान हो सकता है. लेकिन यहां भी Gen Z की अपेक्षाएं पारंपरिक योजनाओं से अलग हैं.
नई पीढ़ी सिर्फ प्रशिक्षण प्रमाणपत्र नहीं चाहता बल्कि प्रशिक्षण के बाद वास्तविक आय का रास्ता चाहती है. वह सिर्फ स्टार्ट-अप नीति नहीं, बाजार तक पहुंच चाहती है. वह केवल रोजगार मेले नहीं, स्थाई नौकरी चाहती है. इसीलिए सरकार की प्रस्तावित नीति की असली परीक्षा उसके क्रियान्वयन में होगी.
प्रयागराज में प्रतियोगी छात्र समिति के संयोजक अवनीश पांडेय कहते हैं, “अगर अभ्युदय कोचिंग कॉलेज तक पहुंचती है, लेकिन परीक्षा कैलेंडर और भर्ती प्रक्रिया समय पर नहीं चलती, तो कोचिंग का विस्तार नाराजगी को खत्म नहीं कर पाएगा. इसी तरह अगर डिजिटल प्लेटफॉर्म बनता है लेकिन उसमें रोजगार और छात्रवृत्ति की वास्तविक जानकारी समय पर अपडेट नहीं होती तो वह युवाओं का भरोसा हासिल नहीं कर पाएगा.”
‘गो मित्र’ से ग्रामीण Gen Z को जोड़ने की कोशिश
युवा आउटरीच केवल शहरों, कॉलेजों और प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित नहीं है. सरकार Gen Z को अपनी सांस्कृतिक और ग्रामीण नीतियों से भी जोड़ने की कोशिश कर रही है. इसका उदाहरण गांवों में लगभग 10 हजार ‘गो मित्र’ तैयार करने की योजना है.

उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग के अनुसार, गांव-स्तर पर युवाओं और बच्चों को देसी गायों, पशुपालन और गो-संरक्षण के बारे में प्रशिक्षण देने की योजना है. इसके लिए पहले मास्टर ट्रेनर तैयार किए जाएंगे और फिर वे गांवों में प्रशिक्षण देंगे.
आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता कहते हैं कि गो-संरक्षण को आश्रय स्थलों के संचालन तक सीमित रखने के बजाय इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था, प्राकृतिक खेती और रोजगार से जोड़ने की कोशिश की जा रही है. प्रदेश में 7,700 से अधिक गोशालाएं हैं और सरकार प्रति गोवंश प्रतिदिन 50 रुपए की सहायता दे रही है.
सरकार की गोबर और गोमूत्र आधारित गतिविधियों में गोबर लॉग, काऊ पेंट, वर्मीकम्पोस्ट, अगरबत्ती, प्लांटर, दीये और जैविक कृषि उत्पादों को बढ़ावा देने की योजना है. महिला स्वयं सहायता समूहों को भी इससे जोड़ने की कोशिश की जा रही है.
सरकार का तर्क है कि इससे गौ-संरक्षण को ग्रामीण रोजगार से जोड़ा जा सकता है. अलग-अलग जिलों में स्थानीय संसाधनों के आधार पर बायोगैस, जैविक खाद या गोबर आधारित उत्पादों की इकाइयां विकसित करने की योजना भी इसी सोच का हिस्सा है.
राजनीतिक तौर पर देखें तो ‘गो मित्र’ पहल युवा नीति से अलग दिखाई देती है, लेकिन दोनों के बीच एक साझा सूत्र है: युवाओं को किसी सरकारी कार्यक्रम का निष्क्रिय लाभार्थी न बनाकर उसे गतिविधि से जोड़ना. शहरी युवा के लिए यह भूमिका मेंटर, उद्यमी या डिजिटल प्रोफेशनल की हो सकती है, जबकि ग्रामीण युवा के लिए प्राकृतिक खेती, पशुपालन या स्थानीय अर्थव्यवस्था में भूमिका की.
यही योगी सरकार की Gen Z रणनीति का व्यापक राजनीतिक अर्थ है. BJP के लिए चुनौती अब केवल यह बताना नहीं है कि सरकार ने कितनी सड़कें, एक्सप्रेसवे या निवेश परियोजनाएं बनाई हैं. उसे यह भी बताना होगा कि उस विकास में युवा की जगह क्या है.

