
वाराणसी में शिक्षक और स्नातक विधान परिषद निर्वाचन क्षेत्रों के नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए राजनीतिक चुनौती बढ़ा दी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में शिक्षक एमएलसी चुनाव में समाजवादी पार्टी के लाल बिहारी यादव ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की जबकि स्नातक एमएलसी चुनाव में सपा के आशुतोष सिन्हा ने BJP के केदारनाथ सिंह पर निर्णायक बढ़त बनाकर जीत हासिल की.
29 अक्टूबर को उपलब्ध मतगणना के आंकड़ों के मुताबिक, नौ चक्रों की गणना के बाद आशुतोष सिन्हा को 50,462 और केदारनाथ सिंह को 33,478 मत मिले थे. इस तरह सपा प्रत्याशी 16,984 मतों से आगे थे. मतगणना के दौरान BJP की आपत्ति के बाद पांचवें चक्र में प्रक्रिया रोकनी पड़ी थी. एजेंटों की मौजूदगी को लेकर विवाद हुआ और BJP कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन भी किया.
रात में मतगणना दोबारा शुरू हुई. बाद की गणना में आशुतोष सिन्हा की जीत का परिणाम सामने आया. इस तरह वाराणसी की दोनों एमएलसी सीटों पर सपा ने BJP को पीछे छोड़ दिया.

शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का नतीजा BJP के लिए इसलिए भी चिंता बढ़ाने वाला है, क्योंकि पार्टी ने इस बार डॉ. प्रमोद कुमार मिश्रा को अपना प्रत्याशी बनाया था. वर्ष 2020 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे प्रमोद मिश्रा को 6,830 मत मिले थे लेकिन इस बार BJP के टिकट पर उन्हें 6,597 मत ही हासिल हुए. यानी उनके मत 233 कम हो गए.
इसके उलट, सपा के लाल बिहारी यादव के मत 7,766 से बढ़कर 11,612 हो गए. उन्होंने अपनी जीत का अंतर 936 से बढ़ाकर 5,015 मत कर लिया. पांच साल में जीत का अंतर 4,079 मत बढ़ना शिक्षक समुदाय के बीच सपा की स्थिति मजबूत होने का संकेत है.
यह परिणाम ऐसे समय आया है, जब उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी तेज हो रही है और BJP संगठन बूथ स्तर तक अपनी पकड़ मजबूत करने के दावे कर रहा है. वाराणसी से लेकर आसपास के जिलों तक राज्य और केंद्र सरकार में नौ मंत्रियों की मौजूदगी के बावजूद BJP का दोनों एमएलसी चुनावों में पिछड़ना कई सवाल खड़े करता है.
हालांकि शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाताओं का दायरा सामान्य विधानसभा या लोकसभा चुनाव से अलग है. इसलिए इन नतीजों को पूरे पूर्वांचल के मतदाताओं का रुझान मानना उचित नहीं होगा. फिर भी, प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में दोनों सीटों पर सपा की सफलता BJP के लिए संगठनात्मक और राजनीतिक समीक्षा का विषय जरूर बन गई है.
BJP क्यों पिछड़ी?
पूर्वांचल में BJP के पास सरकार और संगठन, दोनों स्तरों पर मजबूत राजनीतिक ढांचा है. योगी आदित्यनाथ सरकार में मऊ से अरविंद कुमार शर्मा, वाराणसी से रवींद्र जायसवाल, हंसराज विश्वकर्मा, अनिल राजभर और डॉ. दयाशंकर मिश्र दयालु, सोनभद्र से संजीव गौड़, जौनपुर से गिरीश चंद्र यादव और बलिया से दयाशंकर सिंह मंत्री हैं.
केंद्र सरकार में मिर्जापुर की सांसद अनुप्रिया पटेल मंत्री हैं. इन मंत्रियों का राजनीतिक प्रभाव पूर्वांचल के अलग-अलग हिस्सों में है. इसके बावजूद वाराणसी खंड शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में BJP का प्रदर्शन पार्टी के लिए असहज करने वाला रहा.
वाराणसी की आठ विधानसभा सीटों में सात पर BJP और एक पर उसकी सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) का प्रतिनिधित्व है. विधानसभा स्तर पर इस मजबूत स्थिति के बावजूद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में सपा की जीत का अंतर बढ़ना बताता है कि विधानसभा चुनावों में हासिल राजनीतिक बढ़त को हर चुनाव में दोहराना आसान नहीं है.

शिक्षक और स्नातक एमएलसी चुनाव में मतदाता एक विशिष्ट वर्ग से आते हैं. उनके मतदान व्यवहार पर प्रत्याशी से व्यक्तिगत संपर्क, शिक्षक समुदाय की समस्याएं, सेवा संबंधी मांगें, संगठन की सक्रियता और स्थानीय समीकरणों का असर पड़ सकता है.
शिक्षक सीट पर डॉ. प्रमोद मिश्रा के पिछले प्रदर्शन और इस बार BJP के प्रत्याशी के रूप में मिले मतों की तुलना भी महत्वपूर्ण है. वर्ष 2020 में वे निर्दलीय थे फिर भी उन्हें 6,830 मत मिले थे. इस बार पार्टी के चुनाव चिह्न और BJP संगठन की ताकत के बावजूद उन्हें इससे कम मत हासिल हुए. वहीं 2020 में BJP के प्रत्याशी रहे चेत नारायण सिंह इस बार निर्दलीय मैदान में उतरे और उन्हें 3,471 मत मिले. पिछली बार BJP के प्रत्याशी के रूप में उनके खाते में 4,858 मत आए थे. उनके मतों में 1,387 की कमी आई.
इन आंकड़ों से यह सवाल उठता है कि पिछले चुनाव में BJP से जुड़े प्रत्याशियों को मिले मत इस बार किस दिशा में गए और पार्टी अपने पुराने समर्थकों को एकजुट रखने में कितनी सफल रही.
वाराणसी के एक निजी कालेज में प्रार्चाय आशुतोष राय कहते हैं, “केवल इन आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं होगा कि BJP के सभी पुराने मतदाता सपा के पक्ष में चले गए. प्रत्याशी में बदलाव, निर्दलीय उम्मीदवारों की मौजूदगी और स्थानीय चुनावी समीकरणों से भी परिणाम प्रभावित हो सकते हैं. लेकिन BJP के लिए यह समझना जरूरी होगा कि उसके प्रत्याशी के मत घटने और सपा प्रत्याशी के मत बढ़ने के पीछे कौन से कारक काम कर रहे थे.”
BJP के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, एमएलसी चुनाव के नतीजों को पूरे जिले के मतदाताओं के रुझान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की प्रकृति अलग है और इनका परिणाम विधानसभा चुनावों से सीधे नहीं जोड़ा जा सकता.
हालांकि उन्होंने यह भी माना कि प्रत्याशी चयन, संगठन की पहुंच और शिक्षक मतदाताओं के बीच संपर्क अभियान की समीक्षा जरूरी है. पार्टी के लिए यह भी देखना होगा कि चुनाव से पहले आयोजित सम्मेलनों और बैठकों में जुटी भीड़ को वास्तविक मतों में बदलने में कहां कमी रह गई.
विपक्षी एकजुटता
वाराणसी में BJP के प्रदर्शन को समझने के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों पर भी नजर डालना जरूरी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार वाराणसी से सांसद चुने गए लेकिन उनकी जीत का अंतर 2019 और 2014 के मुकाबले काफी घट गया था. मोदी को 6,12,970 मत मिले थे जबकि इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय को 4,60,457 मत हासिल हुए थे. इस तरह मोदी की जीत का अंतर 1,52,513 मत रहा था.
2019 में मोदी ने सपा प्रत्याशी शालिनी यादव को 4,79,505 मतों से हराया था. वर्ष 2014 में उनकी जीत का अंतर 3,71,784 मत रहा था. यानी 2019 की तुलना में 2024 में उनकी जीत का अंतर 3.27 लाख से अधिक घट गया था. मोदी का मत प्रतिशत भी 2019 के 63.62 प्रतिशत से गिरकर 2024 में 54.24 प्रतिशत रह गया था.
इस चुनाव में विपक्षी एकजुटता BJP के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभरी थी. सपा और कांग्रेस के गठबंधन के तहत वाराणसी सीट कांग्रेस के खाते में गई थी. सपा ने अपना प्रत्याशी उतारने के बजाय अजय राय का समर्थन किया जिससे विपक्षी मतों के बंटवारे की आशंका कम हुई.
अजय राय को पिछले चुनावों के मुकाबले अधिक समर्थन मिला और उन्होंने मोदी को कड़ी चुनौती दी. राष्ट्रीय स्तर पर भी BJP का 400 पार का लक्ष्य पूरा नहीं हुआ था. उत्तर प्रदेश में पार्टी की लोकसभा सीटें 2019 की 62 से घटकर 2024 में 33 रह गई थीं.
आशुतोष राय के मुताबिक वाराणसी के लोकसभा चुनाव और हालिया एमएलसी चुनावों के बीच अंतर भी महत्वपूर्ण है. लोकसभा चुनाव में मतदाताओं का दायरा व्यापक होता है जबकि शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में पंजीकृत मतदाता ही मतदान करते हैं. इसलिए लोकसभा चुनाव के परिणाम को एमएलसी चुनावों से सीधे जोड़ना उचित नहीं होगा. फिर भी दोनों चुनावों में BJP के सामने उभरी चुनौतियां यह सवाल उठाती हैं कि क्या पार्टी की स्थानीय संगठनात्मक ताकत और सरकार की राजनीतिक लोकप्रियता हर मतदाता वर्ग तक समान रूप से पहुंच पा रही है.
BJP के सामने एक चुनौती यह भी है कि प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में पार्टी की राजनीतिक पकड़ का आकलन केवल विधानसभा सीटों या मंत्रियों की संख्या से नहीं किया जा सकता. शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के बीच सपा की लगातार सफलता यह संकेत देती है कि इस वर्ग में पार्टी ने अपना समर्थन बनाए रखा है और उसे बढ़ाने में भी कामयाब हुई है. सपा ने शिक्षकों से जुड़े मुद्दों को प्रचार में प्रमुखता दी थी.
BJP संगठन की परीक्षा
वाराणसी खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में लाल बिहारी यादव की लगातार दूसरी जीत और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में आशुतोष सिन्हा की सफलता ने सपा को राजनीतिक बढ़त दी है. आशुतोष सिन्हा ने 2020 के चुनाव में भी केदारनाथ सिंह को हराया था. इस बार फिर उनकी जीत ने संकेत दिया कि सपा इस निर्वाचन क्षेत्र में अपना आधार बनाए रखने में सफल रही.
शिक्षक सीट पर लाल बिहारी यादव के मतों में बढ़ोतरी और जीत का अंतर पांच गुना से अधिक बढ़ना भी पार्टी के लिए महत्वपूर्ण है. आशुतोष राय कहते हैं “इन परिणामों से BJP के सामने तीन स्तरों पर समीक्षा की जरूरत उभरती है. पहला, प्रत्याशी चयन में स्थानीय स्वीकार्यता और पिछले चुनावों के प्रदर्शन को कितनी अहमियत दी गई. दूसरा, शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के बीच संगठन का संपर्क कितना प्रभावी रहा. तीसरा, इन वर्गों से जुड़े मुद्दों को लेकर BJP की राजनीतिक पहल कितनी असरदार रही. मंत्रियों, विधायकों और संगठन के पदाधिकारियों की मौजूदगी अपने आप में चुनावी जीत की गारंटी नहीं है. उसे मतदाताओं के साथ निरंतर संपर्क और उनकी समस्याओं के समाधान से जोड़ना भी जरूरी है.”
वाराणसी में BJP के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, “चुनाव परिणाम को शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र तक सीमित रखकर देखना चाहिए, लेकिन संगठन के लिए यह समीक्षा का विषय है.” उन्होंने संकेत दिया कि आगामी बैठकों में प्रत्याशी, स्थानीय संगठन, शिक्षकों के मुद्दों और चुनावी संपर्क अभियान की भूमिका पर चर्चा की जाएगी. इस समीक्षा में यह भी देखना होगा कि पार्टी के कार्यक्रमों में जुटने वाली भीड़ और मतदान के दौरान मिले समर्थन के बीच अंतर क्यों रहा.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में BJP के सामने असली चुनौती केवल चुनाव हारने की नहीं बल्कि यह समझने की है कि मजबूत राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बावजूद कुछ मतदाता वर्गों में पार्टी का समर्थन क्यों नहीं बढ़ रहा. पूर्वांचल में नौ मंत्रियों की मौजूदगी, वाराणसी की सात विधानसभा सीटों पर BJP और एक पर सहयोगी दल का कब्जा तथा केंद्र और राज्य में सत्ता के बावजूद एमएलसी चुनावों में मिली शिकस्त ने इस सवाल को और प्रासंगिक बना दिया है.

