scorecardresearch
डार्क मोड

तलाक पीड़ित महिलाओं के लिए उत्तराखंड वक्फ बोर्ड की योजना BJP की चुनावी रणनीति?

उत्तराखंड वक्फ बोर्ड का प्रस्ताव तलाक, हलाला और पारिवारिक विवादों से प्रभावित महिलाओं को वक्फ संपत्तियों में आवास देने का है. विधानसभा चुनाव से पहले सामने आई इस योजना को BJP की मुस्लिम महिलाओं तक पहुंच और चुनावी रणनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है

वकील पत्नी को दिया तीन तलाक (सांकेतिक तस्वीर)
उत्तराखंड वक्फ बोर्ड इस योजना का प्रस्ताव अक्टूबर के पहले हफ्ते में पेश करेगा (सांकेतिक तस्वीर)
अपडेटेड 30 सितंबर , 2026

उत्तराखंड वक्फ बोर्ड ने हाल ही में ऐलान किया कि तीन तलाक या हलाला के बाद मुश्किलों से घिरी महिलाओं और बेसहारा विधवाओं को सम्मानजनक जिंदगी देने की कोशिश के तहत बोर्ड की संपत्तियों में आश्रय दिया जाएगा.

यह कल्याणकारी प्रस्ताव अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी के बीच सामने आया है. इसे मुस्लिम समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए राज्य सरकार और BJP के मुस्लिम नेताओं की एक नई कोशिश माना जा रहा है.

उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स का कहना है कि बोर्ड अक्टूबर के पहले हफ्ते में होने वाली अपनी बैठक में एक प्रस्ताव रखेगा. इसके तहत वैवाहिक विवादों के बाद बेसहारा हुई महिलाओं के रहने के लिए वक्फ संपत्तियों का इस्तेमाल किया जाएगा. यह योजना अभी प्रस्ताव के स्तर पर है और इसके कानूनी व व्यावहारिक पहलुओं की जांच की जानी बाकी है.

शम्स ने कहा है कि जांच प्रक्रिया के जरिये पात्र महिलाओं की पहचान की जाएगी इसके अलावा, बोर्ड देहरादून में स्थित अपने कुछ आवासीय मकानों का इस्तेमाल भी इस मकसद के लिए करने पर विचार कर रहा है.

BJP नेता शादाब शम्स ने इंडिया टुडे को बताया कि कई मामलों में अपने पति से अलग होने के बाद महिलाएं बेघर हो जाती हैं और अक्सर उनके साथ बच्चे भी होते हैं. उनका कहना है कि वक्फ बोर्ड के साथ-साथ केंद्र और उत्तराखंड की BJP सरकारें ऐसी महिलाओं को सहारा दे सकती हैं. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यह प्रस्ताव मुस्लिम समुदाय के पीड़ित और जरूरतमंद लोगों के फायदे के लिए वक्फ संपत्तियों का इस्तेमाल करने का एक तरीका है.

पुष्कर सिंह धामी सरकार उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू कर चुकी है (फाइल फोटो)
पुष्कर सिंह धामी सरकार उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू कर चुकी है (फाइल फोटो)

यह घोषणा मुस्लिम महिलाओं से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए बोर्ड की तरफ से उठाए गए एक और कदम के बाद हुई है. बोर्ड एक नए संशोधित निकाहनामा (इस्लाम में विवाह अनुबंध) पर काम कर रहा है, जिसमें तीन तलाक, हलाला और बेटियों के संपत्ति के अधिकारों जैसे मामलों को हल करने का प्रयास किया गया है. इस पहल को मुस्लिम विवाह में लैंगिक समानता लाने की एक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.

आवास से जुड़े इस प्रस्ताव का एक व्यापक संदर्भ है. पुष्कर सिंह धामी सरकार उत्तराखंड में पहले ही समान नागरिक संहिता (UCC) लागू कर चुकी है. इसमें शादी, तलाक, विरासत, गोद लेने और उत्तराधिकार से जुड़े नियम हैं और राज्य में ये नियम सभी समुदायों पर लागू होते हैं.

वक्फ बोर्ड के इस रुख का राजनीतिक महत्व इस बात में है कि यह BJP को केवल अल्पसंख्यक राजनीति के माध्यम से नहीं बल्कि कल्याण और सुधार के मुद्दों के जरिए मुस्लिम मतदाताओं से जुड़ने का मौका देता है.

2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 14 प्रतिशत है. हरिद्वार और उधम सिंह नगर जिलों में इनकी आबादी सबसे ज्यादा है जबकि देहरादून और नैनीताल जिलों में भी ये अच्छी संख्या में हैं. राज्य का मुस्लिम मतदाता पारंपरिक रूप से कांग्रेस के प्रति अधिक झुकाव रखता रहा है.

ऐसे में BJP के लिए राज्य के मैदानी इलाकों की कड़े मुकाबले वाली सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं के एक छोटे हिस्से का झुकाव भी काफी मायने रख सकता है. लेकिन इसका तात्कालिक राजनीतिक मकसद ऐसे मुस्लिम मंच तैयार करना हो सकता है जो सीधे इस समुदाय तक पार्टी की नीतियों को पहुंचा सकें.

वक्फ बोर्ड कुछ समय से इस दिशा में कदम बढ़ा रहा था. शम्स के नेतृत्व में बोर्ड ने नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) का पाठ्यक्रम लागू करने और बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाकर मदरसों के आधुनिकीकरण पर जोर दिया है. उसने संस्कृत को भी बढ़ावा दिया और विवादास्पद रूप से कुछ ‘आधुनिक’ मदरसों में भगवान राम की कहानी पढ़ाने की शुरुआत की. बोर्ड ने इन पहलों को धार्मिक शिक्षा को मुख्यधारा की स्कूली शिक्षा के साथ जोड़ने और सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देने की कोशिश बताया है.

यह सब उत्तराखंड में एक बड़े राजनीतिक माहौल के बीच हो रहा है. अपने दूसरे कार्यकाल में धामी सरकार ने कई ऐसे फैसले लिए हैं जिनसे धर्म, पहचान और समुदायों के आपसी रिश्तों से जुड़े सवाल सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन गए हैं. UCC के साथ-साथ राज्य ने धर्म परिवर्तन के कानून को और सख्त किया है और ऐसे बदलाव किए हैं, जिन्हें अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर नकारात्मक असर डालने वाला माना जा रहा है. विपक्षी दलों ने BJP की नीयत पर सवाल उठाए हैं लेकिन सरकार का कहना है कि ये प्रशासनिक या सामाजिक सुधार से जुड़े कदम हैं.

इससे पहले सरकार ने हरिद्वार, देहरादून, नैनीताल और उधम सिंह नगर में 'इस्लामिक' नाम वाली कई जगहों के नाम बदलने का ऐलान किया था. सरकार का तर्क था कि ये बदलाव जनता की भावनाओं और भारतीय सांस्कृतिक विरासत को ध्यान में रखकर किए गए हैं. वहीं आलोचक इनमें से कुछ बदलावों को राज्य की व्यापक पहचान की राजनीति के नजरिए से देखते हैं.

इसी के साथ सरकार ने पिछले 25 सालों में अल्पसंख्यक समुदायों की सामाजिक-आर्थिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए एक कमिटी बनाई है. इसकी जिम्मेदारी भले ही प्रशासनिक है लेकिन 2027 के चुनावों से पहले और वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण के दौरान इसे बनाए जाने से इसका राजनीतिक महत्व बढ़ गया है.

इसलिए वक्फ बोर्ड का यह नया प्रस्ताव एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ा है. एक तरफ राज्य सरकार है, जिसने UCC, सांस्कृतिक पहचान और अल्पसंख्यक संस्थानों से जुड़े नियमों को अपने कामकाज का अहम हिस्सा बनाया है. दूसरी तरफ BJP नेतृत्व है, जिसे यह साबित करने की जरूरत है कि उसकी मुस्लिम समुदायों तक पहुंच सिर्फ दिखावे या सांकेतिक कदमों तक सीमित नहीं है.

वक्फ बोर्ड का यह प्रस्ताव लागू होता है या नहीं, आखिरकार कितनी महिलाओं को इसका फायदा मिलता है और क्या इसे आवास से आगे बढ़ाकर रोजगार और वित्तीय मदद तक ले जाया जा सकता है, यही बातें तय करेंगी कि यह एक ठोस कल्याणकारी योजना बनती है या सिर्फ एक चुनावी संदेश.

ADVERTISEMENT
Advertisement