
उत्तर प्रदेश की शिक्षक राजनीति में एक दौर ऐसा था जब विधान परिषद के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में राजनीतिक दलों से ज्यादा शिक्षक संगठनों की ताकत मायने रखती थी. खासकर उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ के शर्मा गुट का दबदबा इतना मजबूत था कि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में उसके प्रत्याशियों की जीत लगभग संगठन की ताकत का पैमाना बन गई थी.
ओमप्रकाश शर्मा इस राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल थे. वे 1972 से मेरठ-सहारनपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से लगातार आठ बार विधान परिषद पहुंचे. करीब 48 वर्ष तक उनका प्रतिनिधित्व शिक्षक राजनीति में संगठन की मजबूत पकड़ का प्रतीक बना रहा. वर्ष 2000 में राजनाथ सिंह के मुख्यमंत्री रहते हुए वे विधान परिषद के सभापति भी बने थे. वर्ष 1997 में BJP-BSP की मिली-जुली सरकार के दौरान वे नेता प्रतिपक्ष भी रहे.
शर्मा गुट का प्रभाव केवल ओमप्रकाश शर्मा तक सीमित नहीं था. पंचानन राय जैसे नेताओं ने भी संगठन को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई. वर्ष 1972 में माध्यमिक शिक्षक संघ से शर्मा और पांडेय गुट अलग हुए थे. इसके बावजूद दोनों गुटों का शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में प्रभाव बना रहा.
एक समय ऐसा भी आया जब शर्मा गुट ने प्रदेश की सभी नौ शिक्षक सीटों पर अपना कब्जा जमा लिया था. वर्ष 2000 में उत्तराखंड के गठन के बाद उत्तर प्रदेश में आठ शिक्षक और आठ स्नातक निर्वाचन क्षेत्र रह गए. इसके बाद भी शर्मा गुट का प्रभाव कायम रहा और उसके पास सभी आठ शिक्षक सीटें थीं.
लेकिन संगठन के भीतर बढ़ती गुटबाजी ने इस मजबूत राजनीतिक आधार को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया. वर्ष 2007 में पंचानन राय के निधन के बाद संगठन को बड़ा झटका लगा. वर्ष 2008 के विधान परिषद चुनाव में चेतनारायण सिंह शर्मा गुट से अलग होकर चुनाव लड़े और जीतने के बाद उन्होंने अपना अलग संगठन बना लिया. वर्ष 2010 में राजबहादुर सिंह चंदेल भी शर्मा गुट से अलग हो गए. इसके बाद शिक्षक संगठनों के भीतर नए-नए गुट बनते गए.

वर्ष 2020 के चुनाव में BJP के श्रीचंद शर्मा ने ओमप्रकाश शर्मा को हराकर उनके लंबे राजनीतिक वर्चस्व को समाप्त कर दिया. इस हार को शिक्षक संगठनों की बदलती ताकत के संकेत के रूप में देखा गया. अब हालिया चुनाव ने इस बदलाव पर मुहर लगा दी है. छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में चार पर BJP और दो पर सपा ने जीत दर्ज की है. किसी भी सीट पर शिक्षक संगठन का प्रत्याशी जीत हासिल नहीं कर सका.
राजनीतिक दलों का बढ़ा असर
शिक्षक राजनीति के इस बदलाव की एक बड़ी वजह राजनीतिक दलों की बढ़ती सक्रियता भी है. पहले शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में प्रत्याशियों की जीत उनके संगठन, शिक्षक हितों के लिए किए गए आंदोलनों और शिक्षकों के बीच व्यक्तिगत संपर्क पर निर्भर करती थी.
अब राजनीतिक दल अपने संगठन, चुनाव प्रबंधन और संसाधनों के दम पर इस मुकाबले में उतर रहे हैं. इस चुनाव में इसका स्पष्ट उदाहरण भी देखने को मिला. आगरा शिक्षक सीट पर डॉ. आकाश अग्रवाल ने सपा के टिकट पर और गोरखपुर-फैजाबाद सीट पर ध्रुव कुमार त्रिपाठी ने BJP के समर्थन से जीत दर्ज की. पिछली बार दोनों निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीते थे. यानी शिक्षक राजनीति में सक्रिय रहे चेहरे अब राजनीतिक दलों के बैनर पर चुनाव लड़ रहे हैं.
शिक्षक संगठनों की कमजोरी का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इस चुनाव में शर्मा गुट, पांडेय गुट और अन्य संगठनों के अधिकांश प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा सके. शिक्षक संगठनों के प्रत्याशियों में वाराणसी से चंदेल गुट के चेतनारायण सिंह ही उल्लेखनीय प्रदर्शन कर सके. शर्मा गुट के चार प्रत्याशियों को 1500 से 2500 के बीच वोट मिले.
पांडेय गुट के तीन प्रत्याशियों में एक को करीब 1200 वोट मिले जबकि बाकी एक हजार से नीचे रहे. ठकुराई गुट के एक प्रत्याशी को करीब 2200 वोट मिले. चंदेल गुट के बाकी प्रत्याशियों को भी एक हजार से कम वोट मिले. यह आंकड़े बताते हैं कि कभी शिक्षक मतदाताओं के बीच मजबूत पकड़ रखने वाले संगठनों का चुनावी आधार अब कितना सीमित हो गया है.
इस बदलाव के पीछे शिक्षक मतदाता वर्ग का विस्तार भी एक वजह माना जा रहा है. पहले मुख्य रूप से सहायता प्राप्त विद्यालयों और कॉलेजों के शिक्षक ही इस चुनावी प्रक्रिया में शामिल थे. वर्ष 2014 में निजी स्कूलों के शिक्षकों को भी मतदाता बनने का अधिकार मिला. इससे शिक्षक मतदाताओं का दायरा बढ़ा और राजनीतिक दलों को अपने प्रभाव का विस्तार करने का अवसर मिला.
राजनीतिक दलों ने इस नए मतदाता वर्ग तक पहुंच बनाने के लिए अपने संगठन और चुनावी मशीनरी का इस्तेमाल किया. दूसरी ओर शिक्षक संगठन आपसी मतभेदों और गुटबाजी से बाहर नहीं निकल सके. पूर्व शिक्षक विधायक जगवीर किशोर जैन का मानना है कि शिक्षक राजनीति पर अब राजनीतिक दल हावी हो गए हैं. उनके मुताबिक, इस चुनाव में मुकाबला सीधे BJP और सपा के बीच था और शिक्षकों के मुद्दे कहीं नजर नहीं आए. वे कहते हैं, "ऐसे में इसे शिक्षक निर्वाचन कहना ही सही नहीं है. इसका नाम बदल देना चाहिए."
जगवीर के मुताबिक, शिक्षक संगठनों के राजनीतिकरण और वित्तविहीन शिक्षकों के मुद्दों के बजाय राजनीतिक प्रभाव में मतदान होने से यह स्थिति बनी है. जो लोग वित्तविहीन शिक्षकों (उन स्कूलों के शिक्षक जिन्हें कोई सरकारी मदद नहीं मिलती) के वोट से जीतकर सदन में पहुंच रहे हैं, वे भी उनकी आवाज नहीं उठा रहे हैं.
राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष गौतम शिक्षक संगठनों की कमजोर होती एकजुटता को बड़ी वजह मानते हैं. उनका कहना है कि प्रदेश में शिक्षकों के बहुत से संगठन बन गए हैं. इससे पहले जैसी एकजुटता नहीं रह गई है. संगठनों को अपने मुद्दों और हितों की लड़ाई के लिए आंदोलन और संघर्ष जारी रखने होंगे. छोटे-छोटे संगठनों में बंटने के बजाय उन्हें एकजुटता कायम करने के लिए गंभीर प्रयास करने चाहिए.
सदन में शिक्षकों के मुद्दे
शिक्षक राजनीति में आए इस बदलाव का असर अब विधान परिषद में प्रतिनिधित्व के स्वरूप पर भी दिखाई देने लगा है. हालिया चुनाव के बाद सदन में शिक्षक संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले एकमात्र सदस्य माध्यमिक शिक्षक संघ (चंदेल गुट) के संरक्षक राजबहादुर सिंह चंदेल रह गए हैं.
एक समय ऐसा था जब विधान परिषद में आधा दर्जन से अधिक सदस्य शिक्षक संगठनों से जुड़े होते थे. यहां तक कि दो खंड स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों से भी शिक्षक संगठनों के नेता चुनकर सदन में पहुंचते थे. अब स्थिति यह है कि शिक्षक संगठनों से जुड़े रहे ध्रुव कुमार त्रिपाठी और डॉ. आकाश अग्रवाल भी सदन में लौटे हैं, लेकिन इस बार वे क्रमशः BJP और सपा के टिकट पर पहुंचे हैं. ऐसे में उनका प्रतिनिधित्व अब किसी स्वतंत्र शिक्षक संगठन के बजाय राजनीतिक दलों के साथ जुड़ा होगा.
राजबहादुर सिंह चंदेल का शिक्षक राजनीति में लंबा अनुभव रहा है. वे 1992, 1998 और 2004 में शर्मा गुट से कानपुर-उन्नाव खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से विधान परिषद पहुंचे थे. बाद में शर्मा गुट से टिकट कटने के बाद उन्होंने अलग समूह बनाया और 2010 में निर्दलीय चुनाव लड़कर जीत दर्ज की.
इसके बाद 2017 और 2023 में भी वे निर्वाचित हुए. उन्होंने माध्यमिक शिक्षक संघ (चंदेल गुट) का नेतृत्व किया और फिलहाल संगठन के संरक्षक हैं. हालिया चुनाव के बाद शिक्षक संगठनों की ओर से सदन में उनकी भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई है.
उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ (शर्मा गुट) के प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. आरपी मिश्र इस स्थिति को संगठन के लिए बड़ी चुनौती मानते हैं. उनका कहना है कि पहली बार ऐसा हुआ है जब उनके संगठन का कोई प्रतिनिधि विधान परिषद में नहीं पहुंचा. पिछली बार ध्रुव कुमार त्रिपाठी शिक्षक प्रतिनिधि के रूप में सदन में थे, लेकिन इस बार वे BJP के टिकट पर चुनाव लड़े.
छह शिक्षक सीटों पर संगठन के चार प्रतिनिधियों ने चुनाव लड़ा, लेकिन किसी को सफलता नहीं मिली. डॉ. मिश्र के मुताबिक, प्रदेश में आठ खंड शिक्षक और आठ खंड स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था इसलिए की गई थी ताकि शिक्षकों और कर्मचारियों के हितों की आवाज सदन तक पहुंचे. अब शिक्षक संगठनों का एकमात्र प्रतिनिधि बचने से शिक्षकों के मुद्दों को उठाने के लिए ज्यादा मशक्कत करनी पड़ेगी.
शिक्षक संगठनों की भूमिका केवल विधान परिषद चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रही है. पुरानी पेंशन की बहाली, वित्तविहीन विद्यालयों के शिक्षकों के लिए मानदेय, सहायता प्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों की सेवा सुरक्षा और अन्य सेवा संबंधी मांगें लंबे समय से शिक्षक राजनीति के केंद्र में रही हैं. शिक्षक संगठन इन मुद्दों पर सरकार के सामने दबाव बनाने और आंदोलनों के जरिए अपनी मांगें उठाने का काम करते रहे हैं.
अब सवाल यह है कि जब सदन में उनका प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व लगभग समाप्त हो गया है तो इन मुद्दों की पैरवी कौन करेगा. लखनऊ खंड स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में अटेवा के प्रदेश अध्यक्ष विजय कुमार बंधु का चुनाव लड़ना भी इस बदलती राजनीति का संकेत रहा. हालांकि उन्हें 10832 वोट मिले और वे तीसरे स्थान पर रहे.
विधान परिषद में BJP की संख्या 79 पर बनी हुई है जबकि सपा के सदस्यों की संख्या बढ़कर 12 हो गई है. शिक्षक संगठनों से जुड़े रहे नेताओं का राजनीतिक दलों के टिकट पर जीतना यह भी बताता है कि शिक्षक राजनीति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है बल्कि उसका स्वरूप बदल रहा है.
अब शिक्षक संगठनों के सामने चुनौती केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि शिक्षकों के बीच अपनी विश्वसनीयता और स्वतंत्र पहचान कायम करने की है. अगर वे पुरानी पेंशन, सेवा सुरक्षा और वित्तविहीन शिक्षकों के मानदेय जैसे मुद्दों पर एकजुट होकर संघर्ष नहीं कर पाए तो शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में उनकी भूमिका और सीमित हो सकती है.
ऐसे में यूपी में शिक्षक राजनीति का दौर पूरी तरह खत्म होने के बजाय एक ऐसे संक्रमण से गुजरता दिख रहा है जिसमें संगठनों का परंपरागत वर्चस्व टूट चुका है और राजनीतिक दलों ने उसकी जगह लेनी शुरू कर दी है.

