
शहरों में बढ़ते ट्रैफिक और पैदल यात्रियों की सुरक्षा के बीच स्काईवॉक को आधुनिक शहरी परिवहन व्यवस्था का अहम हिस्सा माना जा रहा है. मेट्रो स्टेशनों को जोड़ने से लेकर पर्यटन स्थलों पर नई सुविधा विकसित करने तक, उत्तर प्रदेश में कई स्काईवॉक परियोजनाओं का ऐलान हुआ.
इनका मकसद भी साफ था, पैदल यात्रियों को सुरक्षित रास्ता देना, सार्वजनिक परिवहन को आपस में जोड़ना और पर्यटन स्थलों को नया आकर्षण देना. लेकिन जमीन पर तस्वीर इन दावों से अलग है. कहीं निर्माण पूरा होने के बावजूद उद्घाटन नहीं हो पा रहा है तो कहीं परियोजना बनने के बाद भी उसका संचालन शुरू नहीं हुआ.
इसके अलावा कई जगह डिजाइन में खामियां सामने आने के बाद निर्माण के दौरान बदलाव करने पड़े और कहीं एजेंसी तय होने के बाद भी परियोजना उपयोग में नहीं आ सकी.
नोएडा का सेक्टर-51 और सेक्टर-52 मेट्रो स्टेशनों को जोड़ने वाला स्काईवॉक इसकी सबसे ताजा मिसाल है. 16 अगस्त को इसे यात्रियों के लिए खोलने की 11वीं समयसीमा भी निकल गई. मौके पर शाम तक वेल्डिंग, रंगाई-पुताई और फिनिशिंग का काम चलता रहा.
ढांचा तैयार है, दस ट्रैवलेटर भी चल रहे हैं और एसी का संचालन शुरू हो चुका है लेकिन यात्रियों के लिए इसे खोलने से पहले दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) और नोएडा मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (NMRC) की सुरक्षा संबंधी सहमति जरूरी है.

प्राधिकरण के वर्क सर्कल-3 के वरिष्ठ प्रबंधक आरके शर्मा के मुताबिक दोनों मेट्रो कॉरपोरेशन की सहमति अभी बाकी है और जल्द बैठक होगी. करीब 400-420 मीटर लंबे इस एयरकंडीशंड स्काईवॉक को शुरू में कम समय में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था. लेकिन जमीन के नीचे गैस पाइपलाइन और बिजली की लाइनें मिलने के बाद डिजाइन बदलना पड़ा.
बाद में सेक्टर-51 स्टेशन की दीवार तोड़ने पर मेट्रो की बीम सामने आ गई. यानी जिस संरचना से यात्रियों को स्टेशन तक पहुंचना था, उसके प्रवेश बिंदु पर ही एक ऐसी बाधा सामने आ गई जिसका निर्माण से पहले आकलन नहीं किया गया था. इस वजह से रास्ता घुमाकर जोड़ना पड़ा.
एजेंसियों में तालमेल का अभाव
नोएडा की कहानी केवल एक बीम या एक डिजाइन की गलती की कहानी नहीं है. यह सवाल भी उठाती है कि इतनी बड़ी परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करते समय जमीन के ऊपर और नीचे मौजूद मौजूदा ढांचे का पूरा सर्वे क्यों नहीं हुआ. स्काईवॉक का एक सिरा मेट्रो स्टेशन से और दूसरा दूसरे मेट्रो स्टेशन से जुड़ना था.
ऐसे में मेट्रो की संरचना, भूमिगत पाइपलाइन, बिजली की लाइन, मौजूदा एफओबी और स्टेशन के प्रवेश-निकास की स्थिति का संयुक्त अध्ययन परियोजना शुरू होने से पहले होना चाहिए था. इस मामले में पहले भूमिगत सेवाएं सामने आईं और बाद में स्टेशन की बीम.
नतीजा यह हुआ कि परियोजना का डिजाइन निर्माण के दौरान बदलता गया. मार्च 2026 की रिपोर्टों में भी सामने आया था कि बीम की वजह से प्रवेश मार्ग अटक गया और समाधान के लिए तकनीकी राय तक लेनी पड़ी. बाद में बीम को हटाने के बजाय स्काईवॉक का रास्ता बदलने का विकल्प चुना गया.

अर्बन प्लानिंग विशेषज्ञ अजय मिश्र के मुताबिक, इंटरचेंज प्रोजेक्ट में सबसे जरूरी चीज 'इंटीग्रेटेड प्लानिंग' है. जब एक परियोजना कई एजेंसियों से जुड़ी हो तो केवल निर्माण एजेंसी की ड्राइंग पर्याप्त नहीं होती. मेट्रो, सड़क, बिजली, जल, गैस और यातायात से जुड़ी एजेंसियों की संयुक्त तकनीकी जांच पहले होनी चाहिए.
नोएडा में अब स्थिति यह है कि निर्माण पूरा होने के बाद भी उसे यात्रियों के लिए खोलने से पहले सुरक्षा परीक्षण और दोनों मेट्रो निगमों की सहमति जरूरी है. यानी परियोजना का निर्माण पूरा होना और उसका सार्वजनिक उपयोग में आना दो अलग-अलग चरण बन गए हैं.
इसका असर लागत पर भी पड़ा है. जिस परियोजना की शुरुआती लागत करीब 25 करोड़ रुपए बताई गई थी, वह बढ़कर 33.50 करोड़ रुपए से अधिक पहुंच चुकी है. समय बढ़ने के साथ डिजाइन बदलाव, अतिरिक्त निर्माण और दूरी बढ़ने ने खर्च बढ़ाया है. दूसरे शब्दों में, शुरुआती योजना में जितनी सावधानी बरती जाती, उतनी ही लागत और समय दोनों बचाए जा सकते थे.
जहां तैयार वहां उपयोगी नहीं
बरेली का पटेल चौक स्काईवॉक इससे अलग लेकिन ज्यादा गंभीर समस्या दिखाता है. स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत करीब 12 करोड़ रुपए की लागत से बना यह स्काईवॉक तीन साल बाद भी अपनी उपयोगिता साबित नहीं कर सका. यहां समस्या निर्माण की नहीं, संचालन और व्यावसायिक मॉडल की है.
योजना थी कि स्काईवॉक पर करीब 80 दुकानों के जरिए इसे आधुनिक व्यावसायिक हब बनाया जाएगा. राहगीरों को सुरक्षित रास्ता देने के साथ खानपान और खरीदारी की सुविधा भी उपलब्ध कराई जानी थी.
नगर निगम ने निजी एजेंसी के जरिए इसके संचालन की कोशिश की. टेंडर हुआ और आनंदी इंटरप्राइजेज ने करीब दो करोड़ रुपए सालाना की बोली लगाकर 15 साल के लिए संचालन की जिम्मेदारी ली. लेकिन एजेंसी ने काम शुरू नहीं किया.
निगम की ओर से नोटिस भी जारी किए गए लेकिन परियोजना जमीन पर उपयोगी सुविधा में नहीं बदल सकी. नतीजा यह हुआ कि जिस स्काईवॉक से नगर निगम को हर साल करीब दो करोड़ रुपए की आय की उम्मीद थी, उसके संचालन न होने से तीन साल में छह करोड़ रुपए के राजस्व नुकसान का अनुमान सामने आया है.
यह मामला बताता है कि किसी भी सार्वजनिक परियोजना को केवल निर्माण पूरा होने के आधार पर सफल नहीं माना जा सकता. सवाल यह है कि उसके बाद उसका संचालन कौन करेगा, रखरखाव कैसे होगा, सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी होगी और लोग उसे इस्तेमाल क्यों करेंगे. देश के दूसरे शहरों के अनुभव भी इसी ओर इशारा करते हैं.
मुंबई में बड़ी संख्या में बनाए गए स्काईवॉक में रखरखाव, सुरक्षा, रोशनी और एस्केलेटर जैसी समस्याओं के कारण कई जगह उपयोग कम होने की रिपोर्ट सामने आई है. कुछ जगह लोग सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद सड़क से ही चलना पसंद करते हैं.
गुरुग्राम में भी एक स्काईवॉक के इस्तेमाल को लेकर यही सवाल उठे. वहां सीढ़ियों की संख्या, लिफ्ट की कमी और पैदल यात्रियों के लिए असुविधाजनक डिजाइन के कारण बड़ी संख्या में लोग सड़क पार करते पाए गए. यानी स्काईवॉक बना देना अपने आप में पैदल यातायात की समस्या का समाधान नहीं है. डिजाइन ऐसा होना चाहिए जो लोगों के मौजूदा रास्ते और व्यवहार को ध्यान में रखे.
उद्घाटन के इंतजार में कई प्रोजेक्ट
चित्रकूट का तुलसी जलप्रपात स्काईवॉक यूपी में पर्यटन आधारित परियोजनाओं की दूसरी तस्वीर सामने रखता है. भगवान राम के धनुष-बाण की आकृति में करीब 3.70 करोड़ रुपए की लागत से बनाया गया यह प्रदेश का पहला ग्लास स्काईवॉक है.
वन विभाग और पर्यटन विभाग की संयुक्त परियोजना का उद्देश्य तुलसी जलप्रपात को नया पर्यटन आकर्षण देना था. इसकी भार क्षमता प्रति वर्ग मीटर 500 किलोग्राम और एक समय में करीब 25 पर्यटकों के आवागमन की क्षमता बताई गई थी. निर्माण पूरा होने के बाद भी यह लंबे समय से आम पर्यटकों के लिए बंद है.
जुलाई में मुख्यमंत्री के चित्रकूट दौरे के दौरान इसके उद्घाटन की उम्मीद थी लेकिन वह भी पूरी नहीं हुई. बरसात में तुलसी जलप्रपात देखने आने वाले पर्यटक स्काईवॉक के प्रवेश द्वार तक पहुंचते हैं, लेकिन अंदर जाने की अनुमति नहीं मिलती.
यह परियोजना पहले भी सवालों में रही है. निर्माण के दौरान बारिश के बाद अप्रोच प्लेटफॉर्म में दरारों की खबरें सामने आई थीं, जिससे निर्माण गुणवत्ता को लेकर सवाल उठे. परियोजना की पूरी राशि निर्माण पूरा होने से पहले काम करने वाली एजेंसी को भुगतान किए जाने की रिपोर्ट भी सामने आई थी.
ऐसे में पर्यटन परियोजनाओं के सामने दोहरी चुनौती है. एक तरफ उद्घाटन से पहले सुरक्षा और गुणवत्ता सुनिश्चित करनी होती है, दूसरी तरफ लंबे समय तक बंद रहने पर परियोजना का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है. पर्यटन स्थल पर बनी ऐसी सुविधा तभी सफल है जब वह सुरक्षित होने के साथ पर्यटकों के लिए समय पर उपलब्ध भी हो.
समस्या और सबक
यूपी में स्काईवॉक परियोजनाएं समस्याओं से जूझती तस्वीर की ओर संकेत करती है. अजय मिश्र बताते हैं, “योजना बनाते समय निर्माण पर सबसे ज्यादा जोर रहता है लेकिन उसके बाद की पूरी जीवन-चक्र योजना उतनी स्पष्ट नहीं होती. किस जगह स्काईवॉक वास्तव में जरूरी है, उसका इस्तेमाल कितने लोग करेंगे, उसका रखरखाव कौन करेगा, आपात स्थिति में निकासी कैसे होगी और दूसरी परिवहन व्यवस्थाओं से उसका जुड़ाव कितना सहज होगा, इन सवालों का जवाब डीपीआर में पहले से होना चाहिए.”
नोएडा में परियोजना को अब यात्रियों के लिए सुरक्षित बनाने के लिए DMRC और NMRC की सहमति का इंतजार है. प्राधिकरण के सीईओ कृष्ण करुणेश के मुताबिक फिलहाल प्राथमिकता स्काईवॉक को यात्रियों के लिए खुलवाने की है लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि जल्द खोलने की कोशिश में सुरक्षा से समझौता न हो.
नोएडा, बरेली और चित्रकूट की तीन परियोजनाएं तीन अलग-अलग समस्याएं दिखाती हैं. नोएडा में योजना और निर्माण के बीच तालमेल का सवाल है, बरेली में संचालन और व्यावसायिक मॉडल का और चित्रकूट में उद्घाटन से पहले गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रशासनिक प्रक्रिया का. इन तीनों को जोड़ने वाली कड़ी यही है कि स्काईवॉक को केवल एक निर्माण परियोजना की तरह देखा गया. अब जरूरत इसे 'इंफ्रास्ट्रक्चर' के बजाय 'पैदल यात्री सेवा' के रूप में देखने की है.

