
उत्तर प्रदेश पुलिस ने अपराधों की जांच को तकनीक आधारित और संवेदनशील बनाने के लिए दो अहम पहल की हैं. एक ओर पुलिस साइबर क्राइम, जबरन वसूली, फिरौती के लिए अपहरण और दूसरे गंभीर अपराधों के आरोपियों की आवाज के सैंपल का डेटाबेस तैयार कर रही है.
इसके साथ ही पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण ने यौन अपराधों की जांच में महिला के कपड़ों, पुराने रिश्तों, शादीशुदा होने या सोशल मीडिया पर उसकी गतिविधियों के आधार पर उसके चरित्र पर सवाल उठाने से रोकने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं.
पहली पहल के हवाले से पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण ने 30 सितंबर को जारी सर्कुलर में साइबर पुलिस स्टेशनों और जिला पुलिस स्टेशनों को इस काम को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया है. इसके तहत 'यक्ष' ऐप में किसी खास मामले से जुड़े आरोपी की आवाज का सैंपल अपलोड किया जा सकेगा.
इस व्यवस्था का उद्देश्य जांच अधिकारियों को ऐसी सुविधा देना है जिसके जरिए किसी संदिग्ध कॉल या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग की तुलना पहले से सुरक्षित आवाज के सैंपल से की जा सके. मसलन किसी व्यक्ति को धमकी देकर पैसे मांगने, फिरौती के लिए फोन करने या साइबर धोखाधड़ी के दौरान बातचीत करने के मामले में जांच अधिकारी संबंधित रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल कर सकते हैं.
यदि संदिग्ध की आवाज का सैंपल डेटाबेस में मौजूद है तो उससे तुलना करके जांच को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है. नई सुविधा के तहत आवाज के सैंपल अपलोड करने की जिम्मेदारी अपराध की प्रकृति के अनुसार तय की गई है.
साइबर पुलिस स्टेशन साइबर अपराध से संबंधित रिकॉर्डिंग अपलोड करेंगे जबकि जिला पुलिस स्टेशन साइबर अपराध के अलावा जबरन वसूली, फिरौती के लिए अपहरण और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े सैंपल सुरक्षित कर सकेंगे. साइबर अपराध से संबंधित रिकॉर्डिंग को संबंधित एफआईआर या नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) पर दर्ज शिकायत के नंबर से जोड़ा जा सकता है.

रिकॉर्डिंग अपलोड करने से पहले एफआईआर की तारीख, जिला और संबंधित पुलिस स्टेशन जैसी जानकारियां दर्ज करनी होंगी. जबरन वसूली, फिरौती के लिए अपहरण और दूसरे गंभीर अपराधों के मामलों में अधिकारी संबंधित अपराध की श्रेणी चुनकर आवाज का सैंपल अपलोड कर सकते हैं. इस विकल्प में एफआईआर नंबर देना अनिवार्य नहीं बताया गया है.
इस व्यवस्था में रिकॉर्डिंग की गुणवत्ता और उसकी पहचान की शुद्धता पर विशेष जोर दिया गया है. सर्कुलर के मुताबिक, आवाज का सैंपल सुरक्षित करने के लिए कम से कम 30 सेकंड की स्पष्ट रिकॉर्डिंग होनी चाहिए. साथ ही, उसके साथ संबंधित मामले की जरूरी जानकारी भी दर्ज की जानी चाहिए. जांच अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि अपलोड की गई रिकॉर्डिंग वास्तव में संबंधित आरोपी की ही हो.
डीजीपी ने शिकायतकर्ता की आवाज को गलती से आरोपी की आवाज के रूप में अपलोड करने के प्रति भी अधिकारियों को आगाह किया है. यदि किसी रिकॉर्डिंग में शिकायतकर्ता और आरोपी, दोनों की आवाजें हैं तो जांच अधिकारी को आरोपी की आवाज वाला हिस्सा अलग करना होगा. इसके बाद कम से कम 30 सेकंड की स्पष्ट क्लिप तैयार करके उसे ऐप पर अपलोड करना होगा. रिकॉर्डिंग की गुणवत्ता की जांच करने और आवाज की सही पहचान सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी संबंधित अधिकारियों की होगी.
AI आधारित वॉयस एनालिसिस
'यक्ष' ऐप पर आवाज के सैंपल का डेटाबेस तैयार करने के पीछे मुख्य उद्देश्य जांच अधिकारियों के लिए उपलब्ध रिकॉर्डिंग को व्यवस्थित करना और संदिग्ध आवाजों की तुलना आसान बनाना है. नई सुविधा से विभिन्न मामलों से जुड़े आवाज के सैंपल एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराए जा सकेंगे. इससे जांच के दौरान जरूरत पड़ने पर संबंधित रिकॉर्डिंग तक पहुंचना आसान हो सकता है.
पुलिस की इस पहल का महत्व उन अपराधों के संदर्भ में बढ़ जाता है जिनमें आरोपी अपनी पहचान छिपाकर फोन कॉल या डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं. फिरौती के लिए अपहरण, जबरन वसूली और धमकी भरे फोन कॉल के मामलों में आवाज जांच के लिए उपयोगी सुराग हो सकती है. इसी तरह, साइबर धोखाधड़ी के कुछ मामलों में फोन या ऑनलाइन बातचीत की रिकॉर्डिंग जांच का हिस्सा बन सकती है.
ऐसी रिकॉर्डिंग का डेटाबेस में उपलब्ध सैंपल से मिलान करने की सुविधा जांच अधिकारियों को संभावित कड़ियां तलाशने में मदद दे सकती है. सर्कुलर में रिकॉर्डिंग का विश्लेषण करने और अपराध का पता लगाने में सुधार के लिए AI आधारित तकनीक के इस्तेमाल का भी उल्लेख है. हालांकि किसी आवाज का मिलान हो जाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि रिकॉर्डिंग में मौजूद व्यक्ति ने ही अपराध किया है.
आवाज की समानता जांच का एक सुराग हो सकती है लेकिन उसे दूसरे उपलब्ध साक्ष्यों के साथ परखना जरूरी होगा. इस पहल से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पहलू तकनीकी पारदर्शिता का भी है. 30 सितंबर के सर्कुलर में आवाज के सैंपल अपलोड करने की प्रक्रिया, रिकॉर्डिंग की न्यूनतम अवधि और अधिकारियों की जिम्मेदारियों के बारे में निर्देश दिए गए हैं.
हालांकि इसमें AI आधारित वॉयस मैचिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले तकनीकी तरीके, उसकी सटीकता की दर या स्वतंत्र सत्यापन की प्रक्रिया का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है. इसलिए, डेटाबेस में मौजूद रिकॉर्डिंग से किसी संदिग्ध आवाज का संभावित मिलान मिलने पर जांच अधिकारियों को उसकी पुष्टि के लिए अन्य साक्ष्यों और आवश्यक तकनीकी जांच का सहारा लेना होगा.
रिकॉर्डिंग की गुणवत्ता, आवाज के सैंपल की प्रामाणिकता और उसे सही आरोपी से जोड़ने की प्रक्रिया इस व्यवस्था की उपयोगिता के लिए महत्वपूर्ण होगी. डीजीपी ने इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी की जिम्मेदारी भी तय की है. थाना प्रभारी, साइबर पुलिस स्टेशन के प्रभारी और जिला स्तर के जांच अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि रिकॉर्डिंग निर्धारित मानकों के अनुसार अपलोड हों. पुलिस कमिश्नर, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और पुलिस अधीक्षक को भी अपने अधीनस्थ अधिकारियों को निर्देशों की जानकारी देने और काम को प्राथमिकता के आधार पर पूरा कराने के लिए कहा गया है.
यौन अपराधों की जांच में संवेदनशीलता
उत्तर प्रदेश पुलिस ने यौन अपराधों की जांच में इस्तेमाल होने वाली भाषा और जांच अधिकारियों की सोच से जुड़े पूर्वाग्रहों को दूर करने के लिए भी विस्तृत निर्देश जारी किए हैं. डीजीपी राजीव कृष्ण के 30 सितंबर के 20 बिंदुओं वाले सर्कुलर में स्पष्ट किया गया है कि किसी महिला के कपड़ों, पुराने रिश्तों, शादीशुदा होने, मोबाइल फोन के इस्तेमाल या सोशल मीडिया पर उसकी गतिविधियों को कथित यौन अपराध के लिए उसे जिम्मेदार ठहराने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए.

निर्देश के मुताबिक आरोपी से महिला का पहले से परिचित होना, उसके साथ कहीं जाना, घटना के समय चुप रहना या शारीरिक रूप से विरोध नहीं करना अपने आप में सहमति का प्रमाण नहीं है. इसी तरह, महिला के पिछले यौन इतिहास को भी किसी कथित यौन कृत्य के लिए उसकी सहमति का सबूत नहीं माना जा सकता.
पुलिस अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे केवल इस आधार पर शिकायतकर्ता की विश्वसनीयता पर सवाल न उठाएं कि उसने घटना के दौरान शोर नहीं मचाया, घटना के बाद शांत दिखाई दी या उसके बयान में छोटी-मोटी विसंगतियां थीं. सर्कुलर में कहा गया है कि शारीरिक चोट के निशान नहीं होना या विरोध के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलना भी अपने आप में सहमति साबित नहीं करता.
एफआईआर दर्ज कराने में देरी को लेकर भी यही दृष्टिकोण अपनाने के निर्देश दिए गए हैं. किसी शिकायत में देरी होने पर उसे अपने आप झूठी शिकायत का प्रमाण नहीं माना जा सकता. जहां देरी के कारण मौजूद हों वहां जांच अधिकारी को पीड़िता या सूचना देने वाले व्यक्ति के बयान के आधार पर उन्हें सही-सही दर्ज करना चाहिए. बिना पर्याप्त आधार के देरी से जुड़े निष्कर्ष निकालने से बचने को कहा गया है.
यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यौन अपराधों की जांच में दर्ज किए गए बयान, केस डायरी और पुलिस रिपोर्ट आगे की कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं. यदि इन दस्तावेजों में पूर्वाग्रहपूर्ण भाषा या पीड़िता को दोषी ठहराने वाली टिप्पणियां शामिल होती हैं तो इससे जांच की निष्पक्षता और पीड़ित के न्याय व्यवस्था पर भरोसे पर असर पड़ सकता है.
डीजीपी के सर्कुलर में अधिकारियों को अपमानजनक, रूढ़िवादी और पीड़िता को नीचा दिखाने वाली भाषा से बचने का निर्देश दिया गया है. महिला के सम्मान, पवित्रता या चरित्र पर अनावश्यक टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए. इसी तरह, बिना आधार के किसी महिला को अस्थिर, हिस्टीरिकल या ड्रामा करने वाली बताने जैसे शब्दों का इस्तेमाल भी नहीं किया जाना चाहिए.
अधिकारियों को शिकायतकर्ता या पीड़िता के बयान का अर्थ बदले बिना उसे दर्ज करना होगा. आरोपों को कम करके दिखाने, बयान को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने या पीड़िता को आरोपी से समझौता करने के लिए प्रेरित करने वाली भाषा का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.
सर्कुलर में यौन या घरेलू हिंसा के मामलों का समाधान आरोपी से शादी कराने, समझौता करने या परिवार की इज्जत बचाने जैसे सुझावों के जरिए निकालने की सोच को भी खारिज किया गया है. इन निर्देशों के पीछे उद्देश्य जांच के दौरान पीड़िता की गरिमा की रक्षा करना और यह सुनिश्चित करना है कि किसी मामले के तथ्यों का आकलन सामाजिक रूढ़ियों के बजाय उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हो.
पुलिस अधिकारियों को एफआईआर से लेकर केस डायरी, जांच फॉर्म, पुलिस रिपोर्ट और चार्जशीट तक में इन मानकों का पालन करना होगा.
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप बदलाव
यौन अपराधों की जांच में संवेदनशील भाषा को लेकर यूपी पुलिस का सर्कुलर सुप्रीम कोर्ट के 14 जुलाई, 2026 के आदेश के बाद आया है. यह आदेश यौन और अन्य संवेदनशील अपराधों के मामलों में कानूनी प्रक्रिया के दौरान इस्तेमाल होने वाली भाषा से संबंधित स्वतः संज्ञान वाली कार्यवाही के संदर्भ में दिया गया था.
सुप्रीम कोर्ट की 'जेंडर स्टीरियोटाइप्स से निपटने के लिए हैंडबुक' में भी बताया गया है कि रूढ़िवादी धारणाओं पर आधारित भाषा न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है. यूपी पुलिस ने इन सिद्धांतों को पुलिस की जांच प्रक्रिया और आधिकारिक दस्तावेजों तक लागू करने पर जोर दिया है.
सर्कुलर में यौन अपराधों और बच्चों के यौन शोषण के मामलों में पीड़िता की पहचान सुरक्षित रखने को भी महत्वपूर्ण बताया गया है. लागू कानूनों के तहत एफआईआर की कॉपी, प्रेस नोट, चार्जशीट या अन्य सार्वजनिक दस्तावेजों में ऐसी गैर-जरूरी जानकारी शामिल नहीं होनी चाहिए, जिससे पीड़िता की पहचान उजागर हो सकती है.
18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से जुड़े मामलों में जांच अधिकारियों को ऐसी भाषा से बचने का निर्देश दिया गया है जिससे यह लगे कि बच्चा अपनी मर्जी से यौन गतिविधि में शामिल था, उसने किसी को उकसाया था, उसका चरित्र संदिग्ध था या उसे आरोप लगाने के लिए सिखाया-पढ़ाया गया था.
सर्कुलर में बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (POCSO) का उल्लेख करते हुए दोहराया गया है कि इस कानून के तहत बच्चे की सहमति को कानूनी मान्यता नहीं है. इस व्यवस्था को लागू करने के लिए केवल जांच अधिकारी ही नहीं, बल्कि उनके वरिष्ठ अधिकारियों को भी निगरानी करनी होगी. पुलिस अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि केस डायरी, चार्जशीट और अंतिम रिपोर्ट में तय दिशा-निर्देशों का पालन हो.
सर्कुलर में अनुचित शब्दों के उदाहरण और उनके स्थान पर इस्तेमाल किए जा सकने वाले उपयुक्त विकल्प भी बताए गए हैं ताकि अधिकारियों को दस्तावेज तैयार करते समय स्पष्ट मार्गदर्शन मिल सके. इस तरह उत्तर प्रदेश पुलिस के ये दोनों इनिशिएटिव जांच प्रक्रिया के दो अलग-अलग पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं.
'यक्ष' ऐप के जरिए आवाज के सैंपल का डिजिटल डेटाबेस तैयार करना अपराधों की जांच में तकनीकी सहायता बढ़ाने की कोशिश है, जबकि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में संवेदनशील भाषा के निर्देश जांच को पूर्वाग्रहों से मुक्त और पीड़ितों के प्रति सम्मानजनक बनाने की पहल हैं.
इनका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि पुलिसकर्मी इन निर्देशों का कितना नियमित पालन करते हैं, रिकॉर्डिंग की प्रामाणिकता कैसे सुनिश्चित की जाती है और जांच में तकनीकी निष्कर्षों को दूसरे साक्ष्यों के साथ किस तरह परखा जाता है.

