scorecardresearch
डार्क मोड

उत्तर प्रदेश : निषाद पार्टी की नाराजगी यानी बीजेपी के लिए एक तरफ कुआं, एक तरफ खाई!

हाल में अपना दल (एस) के एनडीए से नाराजगी की खबरें आई थीं. अब यूपी में बीजेपी का एक और सहयोगी दल निषाद पार्टी अपनी एक मांग को लेकर ताकत दिखाने लगा है

निषाद पार्टी के मुखिया संजय निषाद (फाइल फोटो)
निषाद पार्टी के मुखिया संजय निषाद (फाइल फोटो)
अपडेटेड 10 जुलाई , 2025

हाल ही में अपना दल (एस) के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए से नाराजगी की खबरें सामने आई थीं, जिससे उसके गठबंधन में बने रहने को लेकर अटकलें शुरू हो गई थीं. अभी यह मामला पूरी तरह शांत भी नहीं हुआ कि अब उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की एक और सहयोगी दल अपनी ताकत दिखाने लगा है.

यह दल है - निषाद पार्टी (निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल). इसके प्रमुख और योगी आदित्यनाथ सरकार में मत्स्य पालन मंत्री संजय निषाद ने आगाह किया है कि अगर बीजेपी सरकार मछुआरा समुदाय को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा देने का अपना वादा पूरा नहीं करती, तो उनकी पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव में एनडीए को समर्थन देने पर दोबारा सोच-विचार कर सकती है.

मछुआरा समुदाय को फिलहाल अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में शामिल किया गया है. निषाद पार्टी ने यूपी की राजधानी लखनऊ में संजय निषाद के सरकारी आवास के सामने एक होर्डिंग लगाकर मछुआरा समुदाय के लिए SC आरक्षण की खुली मांग कर अपने इरादे साफ कर दिए हैं.

संजय निषाद का कहना है कि विरोधी पार्टियां इस मुद्दे पर पहले से ही अपनी पकड़ बनाना शुरू कर चुकी हैं. उनका कहना है कि समाजवादी पार्टी (सपा) ने मछुआरा समुदाय में बढ़ती नाराजगी को जल्दी भांप लिया है और इन इलाकों में अपनी पहुंच बढ़ाने में जुट गई है. यहां तक कि सपा को 2024 के लोकसभा चुनावों में इन क्षेत्रों से अच्छा समर्थन भी मिला. उन्होंने यह भी बताया कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने मछुआरा बहुल गांवों में कैडर मीटिंग शुरू कर दी हैं.

बीजेपी के लिए, यूपी में सहयोगी दलों के बीच यह बढ़ती नाराजगी सिर्फ सीटों के बंटवारे की बात नहीं है. यह राज्य में भगवा दल की प्रमुख सोशल इंजीनियरिंग की रणनीति पर असर डाल सकती है और 2027 के चुनावी रणनीतियों को मुश्किल बना सकती है.

पिछले साल निषाद पार्टी ने एक यात्रा निकाली, जो यूपी की 200 से ज्यादा विधानसभा सीटों से होकर गुजरी. इसका मकसद 17 उप-जातियों - जैसे मांझी, कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, रकवार, धीवर, बिंद, धीमर, बथम, तुरहा, गोडिया, मांझी, मछुआ, मुजाबिर, गोंड और राजगोंड - को अनुसूचित जाति का दर्जा दिलाने की मांग उठाना था. इस प्रयास को पार्टी की उस पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पकड़ बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा गया, जहां वो पहले से कमजोर रही है.

पिछले ही साल मझवां उपचुनाव में निषाद पार्टी को टिकट न देने के फैसले के बाद से ही दोनों सहयोगी दलों के बीच तनाव की अटकलें लगाई जा रही हैं. यह सीट 2022 में निषाद पार्टी ने जीती थी, लेकिन विधायक विनोद कुमार बिंद ने भदोही से बीजेपी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए यह सीट खाली कर दी. जब उपचुनाव हुआ, तो बीजेपी ने अपनी उम्मीदवार सुचिस्मिता मौर्य को मैदान में उतारा, जो चुनाव जीत गईं.

निषाद पार्टी ने कटेहरी सीट के लिए भी जोर लगाया था, क्योंकि वहां निषाद वोटरों की संख्या काफी ज्यादा है. लेकिन बीजेपी ने वहां से अपने उम्मीदवार धर्मराज निषाद को चुनाव में उतार दिया. निषाद पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, इन घटनाओं के चलते ही पार्टी ने अपनी ताकत दिखाने और 2027 के चुनावों में बेहतर सौदेबाजी की स्थिति बनाने के लिए यह यात्रा निकालने का फैसला किया.

2022 के विधानसभा चुनावों में निषाद पार्टी ने 10 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 6 ने जीत हासिल की. पार्टी के 6 और उम्मीदवार बीजेपी के चुनाव चिन्ह पर लड़े, जिनमें से 5 जीत गए. इस गठबंधन से एनडीए को मछुआरा समुदाय और अन्य ओबीसी वर्गों में अपनी पकड़ मजबूत करने में मदद मिली.

संजय निषाद ने 2016 में निषाद पार्टी की स्थापना की थी, जो समय के साथ यूपी की नदी किनारे बसी ओबीसी जातियों की एक मजबूत राजनीतिक आवाज बनती गई है. इसका सबसे मजबूत आधार मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश में है, खासकर गोरखपुर, बस्ती, अयोध्या, आजमगढ़, प्रयागराज और वाराणसी जैसे इलाकों में.

निषाद समुदाय में करीब 22 उप-जातियां शामिल हैं. ये सभी मिलकर यूपी की ओबीसी आबादी का लगभग 12 से 18 फीसद हिस्सा हैं. चूंकि पूरे राज्य में ओबीसी की आबादी 50 फीसद से ज्यादा है, इसलिए निषाद समुदाय की राजनीति में अहम भूमिका है. इनकी मौजूदगी खासतौर पर गंगा और यमुना नदी के किनारे वाले क्षेत्रों में बहुत मजबूत है, जिससे ये करीब 80 में से 37 लोकसभा सीटों और 403 में से 160 विधानसभा सीटों पर असर रखते हैं.

पारंपरिक रूप से ये समुदाय मछली पकड़ने, नाव चलाने, बालू खनन और नदी किनारे खेती करने पर निर्भर रहते हैं. इनकी बड़ी जनसंख्या और आर्थिक परेशानियों के चलते ये उन राजनीतिक दलों के लिए एक मजबूत वोट बैंक बन गए हैं, जो प्रभावशाली यादव ओबीसी वर्ग से आगे अपना दायरा बढ़ाना चाहते हैं.

निषाद पार्टी 2019 में हुए लोकसभा चुनाव से ठीक पहले औपचारिक रूप से एनडीए में शामिल हुई थी, जब बीजेपी ने उनकी मांगों को पूरा करने का वादा किया था. 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इस साझेदारी की फिर से पुष्टि की. तब से लेकर अब तक निषाद पार्टी गठबंधन में बनी हुई है, और संजय निषाद ने तो बीजेपी को "बड़ा भाई" तक कह दिया था.

हालांकि अब बीजेपी के सामने मछुआरा समुदाय को SC का दर्जा देने की निषाद पार्टी की मांग को पूरा करना एक मुश्किल चुनौती बन गई है. कानूनी अड़चनें, राजनीतिक जोखिम और सामाजिक जटिलताएं इस मांग को पूरा करना मुश्किल बना देती हैं.

हालांकि सूत्रों का कहना है कि बीजेपी निषाद समुदाय के भीतर से अपना खुद का नेतृत्व तैयार करने पर विचार कर रही है, लेकिन सहयोगियों और विरोधियों दोनों का दबाव बढ़ने के कारण फिलहाल बीजेपी निषाद पार्टी को खोने का खतरा नहीं उठाएगी. साथ ही, बीजेपी संजय निषाद और उनके वोट बैंक को कैसे संतुष्ट रखती है, यही उसके लिए एक बड़ी परीक्षा होगी.

ADVERTISEMENT
Advertisement