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यूपी में कैसे बदलेगा विधायक निधि‍ का पूरा ‘खेल’?

योगी सरकार विधायक निधि से सोलर और स्ट्रीट लाइट व प्रवेश द्वार बनवाने पर खर्च की सीमा तय करने की तैयारी में है. वहीं गंभीर मरीजों के इलाज के लिए सहायता की सीमा 25 लाख से बढ़ाकर 50 लाख करने पर विचार हो रहा है

CM Yogi Adityanath
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रवेश द्वारों पर विधायक निधि से खर्च को लेकर सवाल उठाए हैं
अपडेटेड 11 अगस्त , 2026

उत्तर प्रदेश में विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को मिलने वाली विधायक निधि के इस्तेमाल का तरीका आने वाले दिनों में बदल सकता है. योगी आदित्यनाथ सरकार एक तरफ विधायक निधि से सोलर और स्ट्रीट लाइट तथा प्रवेश द्वार बनवाने पर खर्च की सीमा तय करने की तैयारी कर रही है तो दूसरी तरफ गंभीर बीमारियों से जूझ रहे गरीब मरीजों के इलाज के लिए इसी निधि से दी जाने वाली सहायता सीमा बढ़ाने पर विचार कर रही है. 

यानी सरकार विधायक निधि के इस्तेमाल पर एक ओर जहां कुछ मदों में अंकुश लगाने की तैयारी में है, वहीं दूसरी ओर जरूरतमंद मरीजों के लिए इस फंड को अधिक लचीला बनाने का रास्ता तलाश रही है.

मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रदेश में प्रत्येक विधायक को हर साल पांच करोड़ रुपए विधायक निधि के रूप में मिलते हैं. 

यह राशि अपने विधानसभा क्षेत्र की स्थानीय जरूरतों और विकास कार्यों पर खर्च की जाती है. विधायकों को अपने क्षेत्र की प्राथमिकताओं के हिसाब से सड़क, नाली, खड़ंजा, सामुदायिक भवन, पेयजल, प्रकाश व्यवस्था सहित कई तरह के कामों की संस्तुति करने का अधिकार है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में विधायक निधि के खर्च का पैटर्न तेजी से बदला है. 

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में विधायक अपनी निधि का बड़ा हिस्सा सोलर लाइट, स्ट्रीट लाइट और हाईमास्ट लाइट जैसे कामों पर खर्च करने की सिफारिश कर रहे हैं. यही पैटर्न अब सरकार की चिंता का कारण बना है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी सोलर लाइट और प्रवेश द्वारों पर विधायक निधि के अत्यधिक इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं. 

इसके बाद ग्राम विकास विभाग को यह देखने के निर्देश दिए गए कि क्या इन मदों में विधायक निधि से होने वाले खर्च की अधिकतम सीमा तय की जा सकती है. ग्रामीण विकास आयुक्त कार्यालय ने इस मामले की समीक्षा के बाद खर्च की सीमा तय करने की सिफारिश सरकार को भेजी है. अब अंतिम फैसला सरकार को लेना है.

सोलर हाईमास्ट पर अटका ध्यान

विधायक निधि से होने वाले खर्च का जो आंकड़ा सामने आया है उसने सरकार की चिंता को आधार दिया है. ग्राम विकास आयुक्त कार्यालय के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2024-25 में विधायकों ने कुल 32,224 कार्यों और परियोजनाओं की संस्तुति की. इनमें से 19,645 परियोजनाओं को मंजूरी मिली. 

खास बात यह रही कि स्ट्रीट और सोलर लाइट से जुड़े कामों की संख्या कुल संस्तुत कार्यों में 43 प्रतिशत से अधिक रही, जबकि स्वीकृत परियोजनाओं में इनकी हिस्सेदारी 71 प्रतिशत से अधिक थी. हाईमास्ट लाइटें भी विधायक निधि से कराए जाने वाले कामों में सबसे ऊपर रहीं. विधायकों की ओर से संस्तुत कुल कार्यों में करीब 30 प्रतिशत हिस्सेदारी हाईमास्ट लाइटों की थी. 

इसका सीधा मतलब यह है कि विधायक निधि का एक बड़ा हिस्सा प्रकाश व्यवस्था से जुड़े कार्यों में जा रहा है. सरकार की चिंता यही है कि जब विधायक निधि का उद्देश्य स्थानीय क्षेत्र के व्यापक विकास से जुड़ी जरूरतों को पूरा करना है, तब अगर इसका बड़ा हिस्सा एक-दो तरह के कार्यों पर ही खर्च हो जाए तो दूसरे जरूरी विकास कार्यों के लिए उपलब्ध धन सीमित हो जाता है. 

जानकारी के अनुसार सरकारी स्तर पर यह भी देखा गया है कि कई गांवों, कस्बों और शहरी कॉलोनियों में एक के बाद एक सोलर लाइट या प्रवेश द्वार लगाने की संस्तुतियां की जा रही हैं. इन कामों की उपयोगिता से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा रहा है. 

ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में प्रकाश व्यवस्था निश्चित रूप से जरूरी है. लेकिन सरकार अब यह देखना चाहती है कि कहीं विधायक निधि के इस्तेमाल में प्राथमिकता का संतुलन तो नहीं बिगड़ रहा. 

प्रवेश द्वारों को लेकर भी यही सवाल उठे हैं. किसी गांव, कस्बे या क्षेत्र के प्रवेश पर भव्य गेट बनाना स्थानीय स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक रूप से आकर्षक काम हो सकता है लेकिन सरकार यह तय करना चाहती है कि विधायक निधि का कितना हिस्सा ऐसे कामों पर खर्च किया जाना उचित है. 

जानकारी के  मुताबिक कुछ मामलों में विकास प्राथमिकताओं के बजाय दूसरे कारणों से इन कार्यों को प्राथमिकता दिए जाने की शिकायतें भी सरकार तक पहुंची हैं. यही वजह है कि सरकार अब विधायक निधि में खर्च की स्वतंत्रता को पूरी तरह खत्म करने के बजाय कुछ मदों पर सीमा तय करने के विकल्प पर विचार कर रही है. इसका उद्देश्य यह है कि विधायक अपनी निधि का इस्तेमाल क्षेत्र की दूसरी बुनियादी जरूरतों के लिए भी कर सकें.

इलाज के लिए ज्यादा पैसा

विधायक निधि में संभावित बदलाव का दूसरा पहलू बिल्कुल अलग है. सरकार गंभीर और जानलेवा बीमारियों से जूझ रहे गरीब मरीजों के इलाज के लिए विधायक निधि से मिलने वाली सहायता को आसान और अधिक प्रभावी बनाने पर विचार कर रही है. 

इस संबंध में चार अहम प्रस्तावों पर विचार चल रहा है. सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव चिकित्सा सहायता की वार्षिक सीमा को बढ़ाने से जुड़ा है. फिलहाल कोई विधायक या एमएलसी अपनी निधि से गरीब मरीजों के इलाज के लिए सालाना अधिकतम 25 लाख रुपए तक खर्च कर सकता है. इसे बढ़ाकर 50 लाख रुपए करने का प्रस्ताव विचाराधीन है. 

विधायकों की ओर से लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि गंभीर बीमारियों के इलाज की बढ़ती लागत को देखते हुए 25 लाख रुपए की सीमा पर्याप्त नहीं है. इसका असर सिर्फ एक विधायक की कुल निधि पर नहीं बल्कि उन मरीजों पर भी पड़ता है जिनके इलाज में बड़ी रकम की जरूरत होती है. 

गंभीर बीमारी के मामलों में कई बार ऑपरेशन, कैंसर उपचार, कार्डियक सर्जरी या दूसरे महंगे इलाज के लिए लाखों रुपए की आवश्यकता होती है. ऐसे में विधायक अपनी निधि से निर्धारित सीमा तक ही मदद कर पाते हैं. 

दूसरा बड़ा बदलाव बीमारियों की सूची से जुड़ा है. मौजूदा व्यवस्था में विधायक निधि से चिकित्सा सहायता कुछ निर्धारित बीमारियों के लिए ही दी जाती है. इनमें हृदय संबंधी बीमारी और कार्डियक सर्जरी, कैंसर, यूरिनरी रोग, ऑर्थोपेडिक बीमारी और थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारियां शामिल हैं.

सरकार अब बीमारी के आधार पर लगी इस पाबंदी को हटाने पर विचार कर रही है. यदि यह प्रस्ताव मंजूर होता है तो विधायक निधि से सहायता देने का दायरा व्यापक हो जाएगा और सिर्फ सूची में शामिल बीमारी होने की बाध्यता खत्म हो सकती है. 

तीसरा प्रस्ताव जिला स्तर पर होने वाली जांच व्यवस्था से जुड़ा है; फिलहाल गरीब मरीजों की ओर से मिलने वाले चिकित्सा सहायता के आवेदन की जांच के लिए सीएमओ और दूसरे अधिकारियों को शामिल करते हुए जिला स्तरीय पैनल बनाया जाता है. 

यह पैनल मरीज की स्थिति और सहायता की जरूरत का आकलन करता है. लेकिन इस प्रक्रिया में अक्सर काफी समय लग जाता है. गंभीर बीमारी के मामलों में जहां इलाज में एक दिन की देरी भी महंगी पड़ सकती है, वहां महीनों तक प्रशासनिक प्रक्रिया चलना समस्या बन जाता है. इसीलिए जिला स्तरीय पैनल की व्यवस्था को हटाकर प्रक्रिया को सरल बनाने का प्रस्ताव भी सामने आया है. 

सरकार का उद्देश्य यह है कि वास्तविक जरूरतमंद मरीजों को सहायता जल्द मिल सके और विधायक निधि की राशि तक पहुंचने में अनावश्यक प्रशासनिक देरी न हो.

विधायक निधि और मुख्यमंत्री कोष दोनों से मदद 

चौथा प्रस्ताव मुख्यमंत्री के विवेकाधीन कोष और विधायक निधि से एक साथ सहायता लेने की मौजूदा रोक से संबंधित है. अभी किसी मरीज को इन दोनों माध्यमों से एक साथ सहायता मिलने पर प्रतिबंध है. सरकार अब इस व्यवस्था में बदलाव पर विचार कर रही है. 

प्रस्ताव के मुताबिक अगर किसी गरीब मरीज को इलाज के लिए विधायक निधि से मिली राशि पर्याप्त नहीं है तो जरूरत के मुताबिक मुख्यमंत्री के विवेकाधीन कोष से भी अतिरिक्त सहायता मिल सके. यह बदलाव उन मरीजों के लिए खासा महत्वपूर्ण हो सकता है जिनके इलाज की लागत कई लाख रुपए से अधिक है. 

मौजूदा नियमों के तहत पात्र गरीब मरीज को विधायक अपनी निधि से पांच लाख रुपए तक की सहायता दे सकता है. लेकिन विधायक की कुल चिकित्सा सहायता सीमा सालाना 25 लाख रुपए है. इस सीमा को बढ़ाकर 50 लाख रुपए करने की मांग अब विधायक निधि से जुड़े व्यापक बदलावों का हिस्सा बन गई है. 

इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है हालांकि इसमें दलगत टकराव की संभावना कम दिखाई देती है. यूपी विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना की अध्यक्षता में 11 सदस्यीय समिति विधायक निधि के इस्तेमाल से जुड़ी विभिन्न मांगों पर विचार कर रही है. एक अगस्त को हुई समिति की पहली बैठक में भी चिकित्सा सहायता की सीमा बढ़ाने की मांग प्रमुखता से उठी. 

विधायकों की दलील है कि उन्हें अपने क्षेत्र के लोगों की तत्काल मदद करनी पड़ती है और गंभीर बीमारी के मामलों में मौजूदा नियम कई बार उनके हाथ बांध देते हैं. यहां दिलचस्प बात यह है कि विधायक निधि में सरकार जिस तरह का संतुलन तलाश रही है, वह दो अलग-अलग जरूरतों के बीच है. 

एक ओर सरकार चाहती है कि पांच करोड़ रुपए की सालाना निधि का इस्तेमाल व्यापक स्थानीय विकास में हो. दूसरी ओर विधायक चाहते हैं कि उन्हें अपने क्षेत्र के लोगों की तत्काल और व्यक्तिगत जरूरतों में मदद करने के लिए ज्यादा स्वतंत्रता मिले.

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विधायक निधि सीधे जनता और विधायकों के बीच दिखाई देने वाली कड़ी है. सरकार अब यह तय करने की कोशिश कर रही है कि इस निधि का इस्तेमाल राजनीतिक दृश्यता से ज्यादा स्थानीय विकास की वास्तविक जरूरतों के आधार पर हो.

आने वाले महीनों में तय होने वाले नियम यह स्पष्ट करेंगे कि विधायक निधि पहले की तरह जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं से चलेगी या सरकार इसके इस्तेमाल के लिए एक नया संतुलित ढांचा तैयार कर पाएगी. 

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