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यूपी में कैसे पकड़ा गया मिलावटी पेट्रोल का हाईटेक सिंडिकेट?

लखनऊ में हुई कार्रवाई में सामने आया कि जीपीएस से छेड़छाड़ इलेक्ट्रॉनिक लॉक को निष्क्रिय करने और रसायनों की मिलावट के जरिए ईंधन की सप्लाई चेन में सेंध लगाई जा रही थी

Diesel Petrol, Ethanol
आरोपियों के पास से मिला भारी मात्रा में खतरनाक साल्वेंट (Photo: ITG)
अपडेटेड 16 जुलाई , 2026

जुलाई की 12 तारीख को लखनऊ पुलिस, क्राइम ब्रांच, आपूर्ति विभाग और आबकारी विभाग की संयुक्त कार्रवाई ने केवल एक मिलावटी पेट्रोल के ठिकाने का भंडाफोड़ नहीं किया बल्कि उत्तर प्रदेश में लंबे समय से चल रहे एक संगठित ईंधन सिंडिकेट की कार्यप्रणाली को भी उजागर कर दिया.

मलिहाबाद के संन्यासी बाग में संचालित इस गिरोह के पास से 7,750 लीटर पेट्रोल, 4,000 लीटर डीजल, 1,150 लीटर मिलावटी पेट्रोल, 3,200 लीटर सॉल्वेंट, इथेनॉल, मास्टर-की और बड़ी मात्रा में अन्य उपकरण बरामद हुए. जांच में सामने आया कि हिंदुस्तान पेट्रोलियम के अमौसी टर्मिनल से शुभम फिलिंग स्टेशन के लिए निकला टैंकर रास्ते में रोककर उससे पेट्रोल निकाल लिया जाता था और उसकी जगह इथेनॉल व अन्य रसायन भर दिए जाते थे.

गिरफ्तार आरोपियों में टैंकर ड्राइवर रामतीर्थ, मलिहाबाद निवासी अनिल कुमार, काकोरी निवासी अभिषेक राजपूत और उन्नाव निवासी धीरज सिंह शामिल हैं. पूछताछ में टैंकर चालक ने स्वीकार किया कि वह चोरी किया गया पेट्रोल करीब 75 रुपए प्रति लीटर की दर से गिरोह को बेचता था. गिरोह का सरगना विभिन्न टैंकर चालकों से सांठगांठ कर ईंधन खरीदता और उसमें सॉल्वेंट तथा अन्य केमिकल मिलाकर स्थानीय बाजार में बेच देता था. पुलिस का दावा है कि यह नेटवर्क कम से कम छह वर्षों से चल रहा था और अब इसकी कड़ियां अमौसी डिपो से लेकर अन्य जिलों तक खंगाली जा रही हैं.

जीपीएस से छेड़छाड़, मास्टर-की और तापमान का वैज्ञानिक खेल

इस मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू गिरोह की तकनीकी कार्यप्रणाली है. सामान्य धारणा होती है कि जीपीएस और इलेक्ट्रॉनिक लॉक लगे टैंकरों से चोरी लगभग असंभव है, लेकिन आरोपियों ने इन्हीं सुरक्षा व्यवस्थाओं की कमजोरियों का फायदा उठाया. क्राइम ब्रांच के अनुसार गिरोह रात 11 बजे से सुबह पांच बजे के बीच सक्रिय रहता था. पहले टैंकर को तय स्थान पर रोका जाता, फिर जीपीएस का पावर सोर्स अस्थाई रूप से हटाकर कंट्रोल रूम में वाहन को उसी स्थान पर खड़ा दिखाया जाता. इसके बाद टैंकर को चोरी के ठिकाने तक ले जाकर पेट्रोल निकाला जाता था.

टैंकरों में लगे लगभग 70 हजार रुपए कीमत वाले सेंसर आधारित हाई सिक्योरिटी लॉक को खोलने के लिए अधिकृत इलेक्ट्रॉनिक चाबी की जरूरत होती है और लॉक खुलते ही संबंधित पेट्रोल पंप को ओटीपी प्राप्त होता है. लेकिन गिरोह ने विशेष प्रकार की मास्टर-की तैयार कर रखी थी. इस मास्टर-की और पतले धातु के तार की मदद से सेंसर को अस्थाई रूप से निष्क्रिय कर दिया जाता था. फिर न तो ओटीपी जनरेट होती थी और न ही किसी अनधिकृत तरीके से लॉक खुलने का रिकॉर्ड दर्ज होता था.

चोरी के बाद लॉक दोबारा सामान्य स्थिति में बंद कर दिया जाता था. इतना ही नहीं, आरोपी तापमान के वैज्ञानिक प्रभाव का भी फायदा उठाते थे. पेट्रोल और डीजल गर्मी में फैलते तथा ठंड में सिकुड़ते हैं. गिरोह रात में सीमित मात्रा में करीब 50 लीटर तक ईंधन निकाल लेता था. दिन में तापमान बढ़ने के कारण आयतन में होने वाले स्वाभाविक बदलाव से डिलीवरी के समय यह कमी आसानी से पकड़ में नहीं आती थी. यानी चोरी को प्राकृतिक विस्तार-संकुचन के पीछे छिपा दिया जाता था.

ग्रामीण बाजार बना सबसे बड़ा निशाना

जांच में यह भी सामने आया कि गिरोह का सबसे बड़ा ग्राहक वर्ग ग्रामीण इलाकों में था. जहां पेट्रोल पंपों के बीच लंबी दूरी होती है और सस्ता ईंधन मिलने पर लोग बिना गुणवत्ता जांचे खरीद लेते हैं. ट्रैक्टर, ट्यूबवेल, कृषि उपकरण, जनरेटर और दोपहिया वाहन चलाने वाले उपभोक्ता इस नेटवर्क का मुख्य लक्ष्य थे. गिरोह चोरी किए गए पेट्रोल में इथेनॉल, सॉल्वेंट और अन्य रसायन मिलाकर उसे बाजार भाव से कम कीमत पर बेचता था. सस्ता ईंधन मिलने के कारण खरीदार आकर्षित होते थे लेकिन कुछ ही समय बाद वाहनों में इंजन मिसफायर, पंप खराब होना, इंजेक्टर जाम होना, माइलेज कम होना और इंजन के स्थाई नुकसान जैसी समस्याएं सामने आने लगती थीं.

पिछले कुछ महीनों में बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आए, जिनमें वाहन चलते-चलते बंद हो गए और मालिकों को महंगे मरम्मत खर्च का सामना करना पड़ा. पेट्रोल पंप संचालकों का कहना है कि इस तरह के मामलों में सबसे अधिक बदनामी वैध डीलरों को झेलनी पड़ती है. लखनऊ पेट्रोल पंप डीलर्स एसोसिएशन के पदाधिकारियों के अनुसार डिपो से निकलने के बाद अगर रास्ते में टैंकर से छेड़छाड़ होती है तो पंप संचालकों के पास उसे पहचानने के सीमित साधन होते हैं. वे केवल डेंसिटी की जांच कर सकते हैं.

अगर डेंसिटी इनवॉइस से मेल खाती है तो टैंकर अनलोड कर लिया जाता है. जबकि सॉल्वेंट या अन्य रसायनों की पहचान केवल प्रयोगशाला परीक्षण में ही संभव होती है. यही कारण है कि कई बार उपभोक्ता सीधे पेट्रोल पंप को दोषी मान लेते हैं जबकि वास्तविक मिलावट रास्ते में की गई होती है. इस खुलासे के बाद डीलर्स एसोसिएशन ने पुलिस कार्रवाई का स्वागत करते हुए ट्रांसपोर्टरों और दलालों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच की मांग की है.

वर्षों से सामने आते रहे हैं ऐसे मामले

उत्तर प्रदेश में ईंधन मिलावट का इतिहास नया नहीं है. पिछले एक दशक में कई बार बड़े पैमाने पर कार्रवाई हुई है, लेकिन हर बार कुछ समय बाद नया नेटवर्क सामने आ गया. अप्रैल 2017 में लखनऊ के सीतापुर रोड और गोमतीनगर क्षेत्र के आठ पेट्रोल पंपों पर घटतौली और अनियमितताओं के मामले सामने आए थे. इसके बाद सरकार ने निगरानी और जांच को और सख्त किया. मई 2022 में मोहनलालगंज के मानखेड़ा क्षेत्र में मिलावटी पेट्रोल-डीजल का मामला पकड़ा गया. मई 2025 में सरोजनीनगर में करीब 20 हजार लीटर मिलावटी पेट्रोल के साथ पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया. अगस्त 2025 में सैरपुर क्षेत्र में भी मिलावटी पेट्रोल का बड़ा नेटवर्क उजागर हुआ.

इन मामलों का अध्ययन बताता है कि ईंधन मिलावट का तरीका समय के साथ बदलता रहा है. पहले सीधे पेट्रोल पंपों या स्थानीय भंडारण केंद्रों पर मिलावट होती थी लेकिन अब अपराधियों ने सप्लाई चेन के सबसे कमजोर हिस्से यानी टैंकर परिवहन को निशाना बना लिया है. इससे वैध वितरण प्रणाली भी प्रभावित हो रही है और जांच एजेंसियों के लिए अपराध का पता लगाना अधिक कठिन हो गया है.

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सप्लाई चेन के प्रत्येक चरण पर डिजिटल निगरानी, रियल टाइम फ्यूल क्वालिटी मॉनिटरिंग और स्वतंत्र ऑडिट की व्यवस्था नहीं हुई तो ऐसे नेटवर्क बार-बार नए रूप में सामने आते रहेंगे.

'ऑपरेशन इथेनॉल शील्ड' और आगे की चुनौती

लखनऊ पुलिस ने इस कार्रवाई के बाद 'ऑपरेशन इथेनॉल शील्ड' शुरू किया है. एडीसीपी क्राइम किरन यादव के अनुसार विशेष टीमें लगातार ऐसे गिरोहों की पहचान कर रही हैं. पुलिस अब केवल गिरफ्तार चार आरोपियों तक जांच सीमित नहीं रखना चाहती बल्कि यह पता लगाया जा रहा है कि अमौसी डिपो से निकलने वाले कितने टैंकर चालक इस नेटवर्क से जुड़े थे और क्या चोरी किया गया मिलावटी ईंधन किसी पेट्रोल पंप तक भी पहुंचा. पुलिस ने टैंकरों के रिकॉर्ड, जीपीएस डेटा, डिलीवरी लॉग और इलेक्ट्रॉनिक लॉक सिस्टम की जांच शुरू कर दी है. मास्टर-की किसने बनाई, किस तकनीक से सेंसर को निष्क्रिय किया गया और इसमें ट्रांसपोर्ट नेटवर्क के कितने लोग शामिल थे, इसकी भी जांच चल रही है.

सरकार की ओर से भी ईंधन वितरण प्रणाली को अधिक सुरक्षित बनाने पर जोर दिया जा रहा है. पेट्रोलियम कंपनियां पहले से जीपीएस ट्रैकिंग, हाई सिक्योरिटी इलेक्ट्रॉनिक लॉक, डेंसिटी परीक्षण और नियमित सैंपलिंग जैसी व्यवस्थाएं लागू कर चुकी हैं. अब जांच एजेंसियां इन प्रणालियों की कमजोरियों को दूर करने के उपाय तलाश रही हैं.

आपूर्ति विभाग और आबकारी विभाग को भी संयुक्त अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं ताकि संदिग्ध गोदामों, अवैध भंडारण स्थलों और सॉल्वेंट कारोबार की नियमित निगरानी हो सके. ऑटो विशेषज्ञ जितेंद्र पुंडीर का कहना है कि केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी. ट्रांसपोर्टरों की जवाबदेही तय करना, टैंकरों में टैंपर-प्रूफ तकनीक लागू करना, रियल टाइम अलर्ट सिस्टम विकसित करना, पेट्रोल पंपों को गुणवत्ता जांच के आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराना और उपभोक्ताओं को संदिग्ध रूप से सस्ता ईंधन खरीदने से बचने के लिए जागरूक करना भी उतना ही जरूरी है. 
 

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