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यूपी में सरकारी नौकरी की नई शर्तों पर क्यों हो रहा विवाद?

उत्तर प्रदेश में नई नीति से पुलिस सत्यापन से पहले सशर्त नियुक्ति का रास्ता खुला है लेकिन राजनीतिक संगठनों से जुड़ाव और आपराधिक मामलों में पात्रता तय करने के प्रावधानों पर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं

कम समय में भी पास हो सकती है सरकारी नौकरी.
28 अक्टूबर को नई नीति जारी की गई है (सांकेतिक तस्वीर)
अपडेटेड 30 अक्टूबर , 2026

उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी पाने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए योगी आदित्यनाथ सरकार ने चरित्र एवं पूर्ववृत्त सत्यापन (कैरेक्टर एंड एंटीसिडेंट वेरिफिकेशन) की व्यवस्था में बदलाव किया है. अब चयनित अभ्यर्थियों को पुलिस सत्यापन पूरा होने से पहले भी स्वघोषणा पत्र के आधार पर सशर्त नियुक्ति पत्र दिया जा सकेगा. 

सरकार का तर्क है कि इससे नियुक्तियों में अनावश्यक देरी नहीं होगी और अभ्यर्थियों को पुलिस सत्यापन के नाम पर परेशान नहीं होना पड़ेगा. लेकिन इस नई व्यवस्था में राजनीतिक विचारधारा, सामाजिक संगठनों से जुड़ाव और आपराधिक मामलों के आधार पर पात्रता तय करने के प्रावधानों ने राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है. 

विपक्षी दल इसे केवल प्रशासनिक सुधार के रूप में देखने के बजाय सरकारी नौकरियों की सेवा शर्तों, अभ्यर्थियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सरकार की जवाबदेही से जोड़कर सवाल उठा रहे हैं. खासकर किसी संगठन की विचारधारा और उसके उद्देश्य के आधार पर नौकरी के लिए अयोग्यता तय करने का प्रावधान राजनीतिक विवाद का विषय बन सकता है.

28 अक्टूबर को प्रमुख सचिव नियुक्ति एवं कार्मिक एम. देवराज की ओर से जारी नई नीति राज्य सरकार के विभागों के अलावा निगमों, परिषदों, शैक्षणिक संस्थानों, स्वायत्त निकायों, उपक्रमों, पंचायतों और स्थानीय निकायों की सीधी भर्तियों पर भी लागू होगी. पहले से लंबित सत्यापन के मामलों का निस्तारण भी इसी नीति के आधार पर किया जाएगा. 

नई व्यवस्था में एक ओर अभ्यर्थियों को राहत दी गई है तो दूसरी ओर कुछ अपराधों और गतिविधियों को सरकारी सेवा के लिए अयोग्यता का आधार बनाया गया है. विपक्ष की आपत्ति इसी दोहरे पहलू पर केंद्रित है. सवाल है कि क्या चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के पर्याप्त उपाय किए गए हैं और क्या किसी व्यक्ति की राजनीतिक या वैचारिक संबद्धता को लेकर सरकारी नौकरी की पात्रता तय करने में मनमानी की गुंजाइश नहीं बचेगी.

सरकार के मुताबिक अभ्यर्थियों को पुलिस वैरिफिकेशन के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा (सांकेतिक तस्वीर)
सरकार के मुताबिक अभ्यर्थियों को पुलिस वैरिफिकेशन के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा (सांकेतिक तस्वीर)

विचारधारा बनी विवाद की वजह

नई नीति का सबसे संवेदनशील पहलू राजनीतिक विचारधारा और हिंसक गतिविधियों के बीच अंतर करते हुए संगठन की सदस्यता को अयोग्यता का आधार बनाना है. इसमें कहा गया है कि किसी अभ्यर्थी को केवल उसकी राजनीतिक विचारधारा के कारण नौकरी के लिए अनुपयुक्त नहीं माना जाएगा. लेकिन ऐसे संगठन का सदस्य होना, जिसका घोषित उद्देश्य हिंसक तरीके से समाज की मौजूदा व्यवस्था को बदलना है, सरकारी सेवा के लिए अयोग्यता का आधार बनेगा. 

इसमें 21 वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद और सत्यापन की तारीख से पिछले तीन वर्षों के भीतर ऐसी गतिविधियों में भागीदारी को सक्रिय जुड़ाव का प्रमाण माना जाएगा. हालांकि इस अवधि में व्यक्ति के आचरण में सकारात्मक बदलाव के ठोस प्रमाण मिलने पर राहत भी दी जा सकती है.

विपक्ष इसी प्रावधान की व्याख्या और उसके संभावित इस्तेमाल को लेकर सवाल उठा रहा है. सपा नेता और लोहिया वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अभ‍िषेक यादव कहते हैं, “सरकार को युवाओं को डराने के बजाय रोजगार के अवसर बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए.” 

कांग्रेस ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा है. पार्टी प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने कहा कि युवाओं का शांतिपूर्ण प्रदर्शन और धरना हिंसा नहीं है. पेपर लीक जैसी समस्याओं के खिलाफ आवाज उठाने वाले युवाओं को हिंसक गतिविधियों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. उन्होंने चेतावनी दी कि युवाओं के आंदोलनों को इस नजरिये से देखने का विरोध होगा.

कांग्रेस की आपत्ति का एक अहम पक्ष यह है कि सरकारी नौकरी की पात्रता तय करने में शांतिपूर्ण असहमति और हिंसक गतिविधियों के बीच स्पष्ट और व्यावहारिक अंतर बनाए रखना जरूरी है. 

विपक्ष का कहना है कि विरोध प्रदर्शन और हिंसक गतिविधियों में स्पष्ट अंतर करना जरूरी है (सांकेतिक तस्वीर)
विपक्ष के मुताबिक विरोध प्रदर्शन और हिंसक गतिविधियों में स्पष्ट अंतर करना जरूरी है (सांकेतिक तस्वीर)

वहीं BJP इस प्रावधान को हिंसा और अराजकता के खिलाफ जरूरी कदम बता रही है. पार्टी नेता आलोक अवस्थी कहते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव के जरिए सत्ता बदली जा सकती है लेकिन हिंसा के जरिए सरकार बदलने की कोशिश करने वालों को सरकारी नौकरी से दूर रखना योगी आदित्यनाथ का अभूतपूर्व कदम है. 

इस विवाद के बीच नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग ने 29 अक्टूबर को स्पष्टीकरण जारी कर कहा कि नई नीति का उद्देश्य किसी की राजनीतिक विचारधारा, सरकार से वैचारिक असहमति या शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक गतिविधियों के आधार पर नौकरी से वंचित करना नहीं है. विभाग के मुताबिक 1958, 1978, 1985, 2013 और 2021 में जारी निर्देशों के प्रावधानों को हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में एक जगह संकलित कर अधिक स्पष्ट बनाया गया है. 

सरकार का कहना है कि हिंसा के जरिए सामाजिक व्यवस्था बदलने के उद्देश्य वाले संगठनों की सदस्यता और उनसे जुड़ी गतिविधियों को ही निर्धारित नियमों के तहत देखा जाएगा. 

जानकारी छिपाने पर नियुक्ति रद्द

नई नीति में गंभीर आपराधिक मामलों को सरकारी नौकरी की पात्रता से जोड़ने के प्रावधान भी विपक्षी सवालों के दायरे में हैं. हत्या, दुष्कर्म, दहेज हत्या, फिरौती के लिए अपहरण, मानव तस्करी, आतंकवादी गतिविधियों, पॉक्सो, गैंगस्टर एक्ट, भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग, अवैध हथियार और विस्फोटक की तस्करी जैसे अपराधों में निर्धारित कानूनी स्थिति के आधार पर अभ्यर्थी को अयोग्य ठहराया जा सकता है. पेपर लीक, नकल कराने वाले गिरोह, सॉल्वर गैंग, दूसरे की जगह परीक्षा देने और फर्जी प्रमाणपत्र हासिल करने वाले भी सरकारी नौकरी के लिए अपात्र होंगे. 

डिजिटल अरेस्ट और यूपीआई के जरिये साइबर ठगी जैसे अपराध भी इस दायरे में रखे गए हैं. हालांकि नीति में हर एफआईआर या लंबित विवेचना को स्वतः अयोग्यता का आधार नहीं बनाया गया है. अपराध की प्रकृति, आरोप तय होने और मुकदमे की स्थिति के आधार पर फैसला होगा. कुछ गंभीर अपराधों में आरोप तय होना ही अयोग्यता का आधार बन सकता है जबकि सार्वजनिक व्यवस्था और आर्थिक अपराधों की कुछ श्रेणियों में दोषसिद्धि जरूरी होगी. 

दो या अधिक अलग-अलग मामलों में आरोपपत्र दाखिल होने और निर्धारित अवधि में बार-बार आपराधिक मामलों में संलिप्तता को भी अयोग्यता की कसौटी बनाया गया है. दूसरी ओर अंतिम रूप से दोषमुक्त होने, अदालत द्वारा मामला निरस्त किए जाने, कानूनी समझौते से निस्तारित होने और मामूली अपराधों के मामलों में राहत के प्रावधान हैं. 

अभ्यर्थियों को आवेदन और स्वघोषणा पत्र में गिरफ्तारी, अभियोजन, दोषसिद्धि, लंबित मुकदमों, पिछली सरकारी सेवा से बर्खास्तगी और भर्ती आयोग या बोर्ड द्वारा अनुचित साधनों के इस्तेमाल के कारण प्रतिबंधित किए जाने की जानकारी देनी होगी. गलत जानकारी देने या तथ्य छिपाने पर नियुक्ति रद्द की जा सकती है.

हालांकि यदि अभ्यर्थी आवेदन में जानकारी देना भूल गया हो लेकिन बाद में चिकित्सा परीक्षण, प्रमाणन, सत्यापन या स्वघोषणा के दौरान लिखित रूप में इसका खुलासा कर देता है तो केवल इस आधार पर उसकी उम्मीदवारी रद्द नहीं होगी.

विपक्ष की चिंता यह है कि आपराधिक मामलों की स्थिति और उनकी गंभीरता का आकलन करने में अधिकारियों को कितना विवेकाधिकार मिलेगा. खासकर उन मामलों में जहां किसी अभ्यर्थी के खिलाफ मुकदमा दर्ज है लेकिन अभी अदालत में दोष साबित नहीं हुआ है. सरकार ने ऐसे मामलों में स्वतः अयोग्यता से बचने का प्रावधान किया है, लेकिन गंभीर अपराधों में आरोप तय होने पर नियुक्ति प्रभावित हो सकती है. ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अलग-अलग विभागों और जिलों में इन नियमों का इस्तेमाल एक समान तरीके से होता है या नहीं.

सत्यापन में जवाबदेही का सवाल

सरकार ने नई नीति में चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया को सरल बनाने के भी कई प्रावधान किए हैं. अब पुलिस और स्थानीय अभिसूचना इकाई (एलआईयू) के कर्मचारी अभ्यर्थी के घर जाकर पूछताछ नहीं करेंगे और न ही उसे थाने बुलाया जाएगा. उपलब्ध सरकारी अभिलेखों के आधार पर सत्यापन किया जाएगा. पुलिस और संबंधित अधिकारियों को 30 दिनों के भीतर रिपोर्ट देनी होगी. 

नियुक्ति प्राधिकारी अभ्यर्थी का विवरण पुलिस महानिदेशक (अभिसूचना), गृह जिले के जिलाधिकारी और उन जिलों के जिलाधिकारियों को भेजेंगे, जहां वह पिछले पांच वर्षों में एक साल या उससे अधिक समय तक रहा हो. दूसरे राज्यों में निर्धारित अवधि तक रहने वाले अभ्यर्थियों की जानकारी वहां की पुलिस से भी ली जाएगी.

सबसे बड़ी राहत यह है कि सामान्य पदों के लिए चयनित अभ्यर्थियों को पुलिस सत्यापन पूरा होने से पहले स्वघोषणा पत्र के आधार पर सशर्त नियुक्ति पत्र दिया जा सकेगा. सत्यापन रिपोर्ट अनुकूल आने पर नियुक्ति की पुष्टि होगी. प्रतिकूल रिपोर्ट आने पर जिलाधिकारी नियुक्ति प्राधिकारी को अंतिम रिपोर्ट भेजने से पहले अभ्यर्थी को अपना पक्ष रखने का अवसर देंगे.

विशेष परिस्थितियों में नियुक्ति प्राधिकारी के अनुरोध पर जिलाधिकारी मौके पर जांच भी करा सकेंगे. पहले से सरकारी सेवा में कार्यरत कर्मचारियों का दोबारा चरित्र सत्यापन नहीं कराया जाएगा.

हालांकि सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील पदों पर विस्तृत सत्यापन पूरा होने के बाद ही नियुक्ति दी जाएगी. ऐसे मामलों में मुख्यमंत्री की पूर्व अनुमति की व्यवस्था भी रखी गई है. विपक्ष के सामने अब इस नीति के क्रियान्वयन की निगरानी और अभ्यर्थियों के अधिकारों की सुरक्षा का सवाल है.

नई व्यवस्था में नियुक्ति प्रक्रिया तेज करने के साथ सरकार ने पात्रता की कसौटियां भी स्पष्ट की हैं. लेकिन राजनीतिक विचारधारा, संगठन की सदस्यता और आपराधिक मामलों की जांच में निष्पक्षता सुनिश्चित करना प्रशासन के लिए चुनौती होगी. 

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