
शाम ढलते ही चित्रकूट जिले के खोह गांव में आटा चक्की का पहिया रुक जाता है. कुछ देर पहले तक मशीन की आवाज से गुलजार रहने वाली दुकान में सन्नाटा पसर जाता है.
संजय पटेल के लिए यह सिर्फ बिजली जाने का मामला नहीं है, क्योंकि आटा चक्की और स्पेलर ही उनकी आमदनी का मुख्य जरिया हैं. बिजली नहीं तो मशीन नहीं चलेगी और मशीन नहीं चलेगी तो कमाई भी नहीं होगी.
यही कहानी प्रदेश के कई ग्रामीण इलाकों की है जहां इन दिनों छह से आठ घंटे की बिजली आपूर्ति से घरेलू उपभोक्ताओं के साथ छोटे कारोबार भी प्रभावित हैं.
सरकार और बिजली प्रबंधन ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धारित रोस्टर के मुताबिक बिजली देने का दावा कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर (UPSLDC) की 14 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों में 18.03 घंटे और शहरों में 24 घंटे बिजली आपूर्ति की गई. लेकिन जमीनी शिकायतें इससे अलग हैं. जौनपुर के मनोज यादव, विजय सिंह और असफाक खां बताते हैं कि उनके इलाके में आठ घंटे भी बिजली नहीं मिल रही.
सीतापुर के बिसौली निवासी दयाशंकर सिंह के मुताबिक छह से आठ घंटे की आपूर्ति से लघु एवं कुटीर उद्योगों का काम प्रभावित हो रहा है. रात में कटौती की वजह से घरेलू उपभोक्ताओं की परेशानी भी बढ़ी है. सवाल यह है कि जब इस बार सितंबर में बिजली की मांग पिछले साल के मुकाबले करीब पांच हजार मेगावॉट कम है, तब प्रदेश के गांवों में बिजली संकट क्यों है?
उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि समस्या केवल बढ़ती मांग की नहीं है. उत्पादन इकाइयों का बंद होना, कोयले की आपूर्ति में बाधा, तकनीकी खराबियां और बिजली प्रबंधन की तैयारियां भी इस संकट की तस्वीर का हिस्सा हैं.
3650 मेगावॉट का अंतर
UPSLDC के मुताबिक 13 सितंबर को प्रदेश में बिजली की मांग 28,834 मेगावॉट रही, जबकि उपलब्धता 25,184 मेगावॉट थी. यानी मांग और उपलब्धता के बीच 3650 मेगावॉट का अंतर रहा. इस कमी की भरपाई के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में आपात कटौती करनी पड़ी.

ऊर्जा प्रबंधन की उच्च स्तरीय बैठक में भी यह सामने आया कि रात के समय करीब 1500 से 2000 मेगावॉट की कटौती की जा रही है. इसका सबसे ज्यादा असर ग्रामीण क्षेत्रों, बुंदेलखंड, तहसील और नगर पंचायत क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है.
राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने UPSLDC के 16.41 घंटे आपूर्ति के दावे पर सवाल उठाया है. उनका कहना है कि लगातार ब्रेकडाउन और कटौती के कारण कई उपभोक्ताओं को करीब आठ घंटे ही बिजली मिल रही है.
अवधेश के मुताबिक 3650 मेगावॉट की आपात कटौती अपने आप में बिजली व्यवस्था की स्थिति को बताती है. उनका सवाल है कि जब ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 18 घंटे का रोस्टर निर्धारित है तो इतनी कम आपूर्ति क्यों हो रही है.
मौजूदा संकट को समझने के लिए सितंबर के पिछले वर्षों के आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं. 2024 में 3 सितंबर को प्रदेश में अधिकतम बिजली मांग 29,347 मेगावॉट थी. 2025 में 25 सितंबर को यह बढ़कर 30,255 मेगावॉट तक पहुंच गई.
इस साल सितंबर में अधिकतम मांग 14 तारीख को 25,153 मेगावॉट दर्ज हुई. यानी पिछले वर्ष सितंबर की अधिकतम मांग की तुलना में इस बार आंकड़ा करीब पांच हजार मेगावॉट कम है. इसके बावजूद बिजली कटौती हो रही है. यही वह बिंदु है जहां बिजली प्रबंधन की तैयारी पर सवाल उठते हैं.
उपभोक्ता परिषद का तर्क है कि पिछले साल की मांग को आधार बनाकर इस वर्ष के लिए उत्पादन और उपलब्धता की पहले से रणनीति तैयार होनी चाहिए थी. जब मांग अपेक्षाकृत कम है तो उत्पादन क्षमता की उपलब्धता में कमी का असर उपभोक्ताओं तक क्यों पहुंच रहा है यह सवाल अब बिजली संकट की पड़ताल का अहम हिस्सा बन गया है.
10 इकाइयां बंद, बिजली उत्पादन प्रभावित
प्रदेश की मौजूदा बिजली समस्या में बंद पड़ी उत्पादन इकाइयों की भूमिका सबसे अहम है. अलग-अलग तकनीकी कारणों से 10 उत्पादन इकाइयां बंद हैं. उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम की अनपरा यूनिट सात, घाटमपुर यूनिट एक और दो, हरदुआगंज विस्तार यूनिट एक और जवाहरपुर यूनिट दो बंद हैं.
इसके अलावा रोजा, मेगा, हरदुआगंज और ओबरा की अलग-अलग इकाइयां भी उत्पादन से बाहर हैं. इन इकाइयों के बंद होने से करीब 5340 मेगावॉट उत्पादन प्रभावित है. ऊर्जा प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों के अनुसार इनमें चार इकाइयों के 17 सितंबर से पहले शुरू होने की संभावना है, जबकि छह इकाइयों को 30 सितंबर तक चालू करने का लक्ष्य है.

अगर ये इकाइयां तय समय पर उत्पादन में लौटती हैं तो उपलब्धता पर दबाव कम होगा. लेकिन फिलहाल इनके बंद रहने से मांग और उपलब्धता के बीच अंतर को भरने के लिए दूसरे स्रोतों पर निर्भरता बढ़ गई है.
इसका एक उदाहरण ओबरा तापीय परियोजना है जहां हालात और गंभीर हो गए हैं. परियोजना की तीन इकाइयां करीब 14 घंटे के भीतर एक-एक कर बंद हो गईं. इससे करीब 600 मेगावॉट उत्पादन और प्रभावित हुआ. ओबरा 'सी' ताप विद्युत गृह की 660-660 मेगावॉट क्षमता वाली दोनों इकाइयां पहले से बंद हैं. इस तरह अकेले ओबरा परियोजना से करीब 1920 मेगावॉट उत्पादन प्रभावित हो गया.
एक साथ इतनी क्षमता के सिस्टम से बाहर होने का सीधा असर प्रदेश के ग्रिड पर पड़ता है और मांग पूरी करने के लिए महंगी बिजली खरीदने की जरूरत बढ़ जाती है.
बारिश और प्रबंधन की तैयारी पर सवाल
बिजली संकट के पीछे कोयले की आपूर्ति में आई बाधा को भी प्रमुख वजह बताया जा रहा है. पावर कॉरपोरेशन के प्रवक्ता के अनुसार भारी बारिश और जलभराव के कारण पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात समेत कई राज्यों में कोयले की कमी हुई है.
उत्तर प्रदेश में भी गीले कोयले के कारण उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है. कोयला खदान क्षेत्रों में बारिश के कारण आपूर्ति प्रभावित होने से प्रदेश के बिजली उत्पादन में करीब 1500 से 2000 मेगावॉट की कमी आई है. नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) क्षेत्र की जयंत कोल माइंस में कोल साइलो गिरने से भी कोयला आपूर्ति बाधित हुई है.
ऊर्जा प्रबंधन कोल इंडिया लिमिटेड समेत संबंधित एजेंसियों के साथ लगातार समन्वय कर रहा है. लेकिन यहां भी प्रबंधन पर सवाल उठ रहे हैं. सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के फ्यूल मैनेजमेंट की रिपोर्ट के अनुसार अनपरा और एनटीपीसी की सिंगरौली परियोजना में करीब 10 दिन का कोयला उपलब्ध है. हरदुआगंज, जवाहरपुर, ओबरा, पनकी, पारीछा, घाटमपुर और खुर्जा समेत अन्य इकाइयों में करीब 20 दिन का कोयला स्टॉक है. पिट हेड इकाइयों में न्यूनतम 10 दिन और नॉन-पिट हेड इकाइयों में करीब 20 दिन का कोयला रखने की व्यवस्था होती है.
यानी बिजलीघरों में कोयले का स्टॉक मौजूद होने के बावजूद अगर गीले कोयले के कारण उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है तो कोयला प्रबंधन और भंडारण की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है. जानकारों का कहना है कि यदि यूनिट में मौजूद कोयला बारिश से भीगने के कारण उपयोग में नहीं आ पा रहा है तो इसे केवल आपूर्ति की समस्या मानने के बजाय प्रबंधन के स्तर पर भी देखना होगा.
ऊर्जा प्रबंधन ने संकट से निपटने के लिए बिजली एक्सचेंज का सहारा लिया है. पीक समय में 10 रुपए प्रति यूनिट तक की दर पर बिजली खरीदी जा रही है. 14 सितंबर को अपर मुख्य सचिव ऊर्जा डॉ. आशीष कुमार गोयल की अध्यक्षता में हुई बैठक में आपूर्ति बहाली की रणनीति पर चर्चा हुई.
प्रबंधन के अनुसार अगले दो-तीन दिन में अनपरा डी, हरदुआगंज-ई और जवाहरपुर की इकाइयां शुरू होने से करीब 1500 मेगावॉट अतिरिक्त बिजली मिलने की उम्मीद है.
पुरानी इकाइयों की उपलब्धता बड़ी चुनौती
मौजूदा संकट को केवल सितंबर की कटौती तक सीमित करके देखना आने वाली चुनौती को नजरअंदाज करना होगा. प्रदेश में बिजली की कुल खपत लगातार बढ़ रही है. चालू वित्तीय वर्ष के शुरुआती पांच महीनों में 10 सितंबर तक ही बिजली की कुल खपत 9,115.1 करोड़ यूनिट से अधिक पहुंच गई है.
पिछले पूरे वित्तीय वर्ष में 16,285.8 मिलियन यूनिट बिजली की खपत दर्ज हुई थी. यानी इस वित्तीय वर्ष के शुरुआती महीनों में ही पिछले पूरे साल की खपत के आधे से ज्यादा बिजली खर्च हो चुकी है.
औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियों में बढ़ोतरी, तेजी से हुए विद्युतीकरण, उपभोक्ताओं की बढ़ती संख्या और बिजली आधारित सुविधाओं के विस्तार से खपत बढ़ रही है. इस वर्ष जून में पीक आवर के दौरान बिजली की अधिकतम मांग 32,673 मेगावॉट तक पहुंच गई थी. यह पिछले वर्ष की अधिकतम मांग का रिकॉर्ड तोड़कर नया स्तर था.
बढ़ती मांग को देखते हुए प्रदेश सरकार नई तापीय परियोजनाओं, नवीकरणीय ऊर्जा और मौजूदा बिजलीघरों की क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रही है. ओबरा-सी की 1320 मेगावॉट क्षमता वाली दो इकाइयां और घाटमपुर तापीय परियोजना जैसी नई उत्पादन परियोजनाएं इसी रणनीति का हिस्सा हैं. लेकिन नई क्षमता जोड़ने के साथ पुरानी और मौजूदा इकाइयों की उपलब्धता बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

